संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

दिव्या और सभ्या बचाएंगी सिंधु घाटी सभ्यता को

? गुफरान सिद्दीकी

         मलेश वाजपेई और राकेश अवस्थी का परिवार अब अपने को अलगाव में महसूस करता है। उनके गांव के अधिकांश हिंदू उनसे किसी तरह का संबन्ध नहीं रखना चाहते और उन्हें मुसलमान कहकर तंज करते हैं। उनके परिवार की बच्चियां भी अब इसी वजह से बस से स्कूल नहीं जातीं, क्योंकि उनकी सहेलियां उन्हें मुसलमान कह कर चिढ़ाती हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से तीस किलोमीटर दूर स्थित भीतरगांव के इन बािंदों के प्रति व्यवहार में आए इस बदलाव का कारण यह है कि उन्होंने पिछले दिनों 24 अगस्त 2014 को हुई

                  सांप्रदायिक हिंसा में अपने मुसलमान पड़ोसियों की जान बचाई थी, जब उन पर हजारों की भीड़ ने अचानक हमला बोल दिया था। रिहाई मंच व अन्य संगठनों की स्वतंत्र जांच रिपोर्ट के मुताबिक यह हिंसा जिसमें दो मुसलमान जल कर मर गए, तब शुरु हुई जब गुड्डू तिवारी और गुड्डू पासी नाम के दो लोगों के घर से मुस्लिम परिवार के घर में हुई चोरी के सामान समेत अन्य जगहों पर हुई चोरी के सामान बरामद हुए। जिसपर पुलिस दोनों चोरों को थाने ले गई, लेकिन एक समझौते के बाद मुस्लिम परिवार ने ही उन्हें थाने से छुड़वा लिया क्योंकि उक्त दोनों चोर भी उसी गांव के थे जिनके परिवारों से मुस्लिम परिवार के बिरादराना संबन्ध थे। लेकिन अचानक दूसरे दिन हजारों की तादाद में हमलावरों ने तीस-बत्तीस घर वाले मुस्लिम समुदाय पर हमला कर दिया क्योंकि बीती रात कुछ अदृष्य शक्तियों ने इस अफवाह को फैलाने में सफलता पा ली थी कि मुसलमानों ने दोनों हिंदू युवकों की हत्या कर दी है।

                  इस विवरण और दिल्ली में नई सरकार बनने के बाद अचानक बढ़ गई सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के विवरणों में कोई खास फर्क नहीं है। शायद सिवाए इसके कि यहां पड़ोसियों की जान बचाने वाले लोग एक तरह से बहिश्कृत हो गए। लेकिन यह सभ्यतागत संकट अखबारों में खबर नहीं बन पाई, खबर बनी सांप्रदायिक हिंसा।

                   दरअसल, 26 मई से जो पार्टी सत्ता में आई है उसका मुख्य एजेंण्डा जैसा कि अक्सर समझा जाता है सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराना नहीं है, बल्कि सभ्यतागत स्तर पर समाज में अलगाव पैदा करना है। ताकि वह अपने घोषित हिंदू राष्ट्र के सपने को प्राप्त कर सके। जो सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने भर से संभव नहीं हो सकता क्योंकि सांप्रदायिक घटनाओं के कुछ समय बाद समाज फिर से एकजुट हो जाता है। इसीलिए हम पाते हैं कि कानपुर, अलीगढ़, भिवंडी, भागलपुर या अन्य जगहों पर जहां अतीत में भयानक सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हो चुकी हैं वहां भी भाजपा सिर्फ सांप्रदायिक हिंसा के तत्काल बाद ही लाभ उठा पाई और जैसे ही समाज फिर एकजुट हुआ वह हार गई। लेकिन वहीं गुजरात में ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को सभ्यतागत संकट के स्तर तक पहुंचाने में कामयाब रही। इसीलिए वहां गैर भाजपा पार्टियां बहुसंख्यक हिंदुओं में एक तरह से कमलेश वाजपेई और राकेश अवस्थी के परिवार की तरह ही मुस्लिम पार्टी घोषित करके अलगाव में डाल दी गई हैं। लिहाजा अब पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद भाजपा अपनी ध्रुवीकरण की राजनीति को सभ्यतागत स्तर पर ले जाना चाहती है, जिसके लिए उसने एक मुकम्मल खाका भी तैयार कर लिया है। यही गुजरात माडल है, जिसका मुख्य आधार समाजों के बीच इस हद तक संवादहीनता और अलगाव पैदा कर देना है कि पीढि़यों से साथ रह रहे लोग अचानक एक दूसरे से अपरिचित हो जाएं।

                 दरअसल पूरी दुनिया में साम्राज्यवादी-फासीवादी राजनीति हमेशा से संवादहीनता और बेगानेपन की बुनियाद पर ही टिकने की कोशिश करती रही है। मसलन, हिटलर ने जर्मनी में हजारों साल से रह रहे यहूदियों को अचानक गैर के रुप में प्रचारित करना शुरु कर दिया और ठीक भाजपा के लव जिहाद अभियान की तरह ही उन पर आरोप लगाया कि यहूदी युवक आर्य नस्ल की जर्मन लड़कियों को अपने प्रेम पाश में फंसाकर उन्हें दूषित कर रहे हैं। जिसे हिटलर के उस समय के आधुनिक संचार यंत्र रेडियो से इतना ज्यादा फैलाया गया कि अचानक हजारों साल की मिली-जुली सभ्यता ध्वस्त हो गई। यही हम अमरीका द्वारा इराक में षियाओं और सुन्नियों के बीच बेगानापन पैदा करके विश्व की सबसे पुरानी और महानतम मेसोपोटामिया सभ्यता को भी ध्वस्त किए जाने में देख सकते हैं।

                 बहरहाल, फासीवाद की इस प्रवृत्ति को भारत के संदर्भ में मोहम्मद बाकर के उदाहरण में भी देखा जा सकता है। जिन्हें अंग्रेजों ने दिल्ली में 1857 में इसलिए फांसी पर लटका दिया था क्योंकि वे अग्रेजों द्वारा दिल्ली की दीवारों पर रात में चोरी छुपे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बेगानेपन को बढ़ाने के लिए लगाए जा रहे पोस्टरों जिनमें यह लिखा होता था कि हिन्दुओं और मुसलमानों में क्या-क्या फर्क है, को फाड़ देते थे और अपने दिल्ली उर्दू अखबार में इस झूठे प्रचार के खिलाफ यह छापते थे कि हिन्दुओं और मुसलमानों में क्या-क्या समानताएं हैं। यानी बेगानेपन को फैलाने और उसे सभ्यतागत बनाने की कोषिश पुरानी है।

                 इसीलिए भीतरगांव में हुई सांप्रदायिक हिंसा में अजीज और जाकरा नाम के मुसलमानों का मारा जाना सिर्फ एक सांप्रदायिक घटना है, लेकिन वाजपेई और अवस्थी परिवार का बहिष्कार एक सभ्यतागत संकट है। जिससे निपटना अपनी सिंधु घाटी सभ्यता को मेसोपोटामिया के हश्र से बचाने की चुनौती है। जिसे हम इसलिए जीतेंगे कि वाजपेई परिवार की बच्चियों दिव्या और सभ्या अपनी सहेलियों के मुस्लिम हो जाने की फब्तियों से बेपरवाह हैं। उन्हें बस इस बात की खुषी है कि उन्होंने अपने मुस्लिम पड़ोसी की जान बचा ली।


? गुफरान सिद्दीकी