संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

सांप्रदायिक मत बनाइए मुकद्दर के सिकंदर को

? राजीव यादव

              क्या देश में चुनाव आचार संहिता के दौरान ही नेता विवादास्पद बोलते हैं या फिर अक्सराहां बोलते रहते हैं? अगर बोलते रहते हैं तो उस दरम्यान कौन उनको नोटिस भेजता है जैसे चुनाव आयोग, चुनाव के दौरान भेजता है? भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ को नोटिस भेजते हुए आयोग ने 17 सितंबर तक जवाब देने का समय दिया। इस तरह किसी धर्म और समुदाय को लेकर शत्रुता के भाव को बढ़ावा देने और नफरत फैलाने के लिए योगी आदित्यनाथ को भेजा गया नोटिस चुनाव अयोग की आचार संहिता के प्रति उसकी गंभीरता और जिम्मेदारी का बेमिसाल उदाहरण है कि वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनाव के प्रति कितना (अ)गंभीर है। उसे बहुत चिंता है कि चुनाव सकुशल सम्पन्न हो जाए, इसीलिए जवाब देने का समय 13 सितंबर के मतदान की तिथि के 4 दिन बाद की रखी।

                        खैर, योगी आदित्यनाथ द्वारा एक के बदले सौ मुस्लिम लड़कियों को हिंदू बनाने और एक के बदले दस को मारकर शांति स्थापित करने के आह्वान पर यूपी राज्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा मानते हैं कि आयोग किसी से भेदभाव नहीं कर सकता। जिसका साफ मतलब है कि ऐसा करने की योगी को पूर्ण स्वतंत्रता चुनाव आयोग देता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या देश में इस तरह से एक के बदले दस को मारने और मुस्लिम लड़कियों को जबरन हिंदू बनाने का कोई प्रावधान है, जिसकी आयोग इजाजत दे रहा है? ठीक ऐसे ही 2014 लोकसभा चुनावों में आजमगढ़ को अमित शाह द्वारा आतंकवाद का केन्द्र कहने पर भी उन्हें चुनाव आयोग क्लीन चिट दे चुका है। ऐसे में अगर ठीक इसी तरह कल कोई किसी जिले, प्रदेश या फिर देश के बारे में भी कह देगा तो क्या उसे भी क्लीन चिट नहीं दे दी जाएगी?

             ऐसे बहुतेरे सवाल भारतीय जनमानस के मन-मस्तिष्क में चल रहे हैं। चुनाव आयोग तो एक चुनावी संस्था है और लोकतंत्र को भी कितने दिन हुए महज 67 साल यानी एक प्रौढ़ उम्र के आदमी के जीवन से भी कम आयु। भारतीय संस्कृत के हजारों वर्षो के इतिहास में बहुत आए और गए पर यह इतना बलवती थी कि कायम रही। बस थोड़ा बहुत परिवर्तनों के साथ जैसे अब दलित जिनके सौ वर् भी नहीं हुए हिंदू धर्म के आए हुए, उन्हें अब कहीं-कहीं ही मंदिरों में प्रवेश से रोका जाता है। वे रविदास के मंदिर जिन्हें दलितों ने इस भेद-भाव के विरोध में स्थापित किया था वो अब मुस्लिम धर्म के विरोध के केन्द्र बन गए हैं। पश्चिमी यूपी में कांठ, कुटबा-कुटबी इसके हालिया उदाहरण हैं।

                        पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अब कोई जोधा अकबर के साथ नहीं जाएगी। अब दु्ट सिकंदर अपनी पुत्री चन्द्रगुप्त को देगा। योगी के छद्म इतिहासबोध की यह पूरी राजनीति उस गोरखनाथ पीठ की मूल विचारधारा के विरुद्ध है जिसका वे अपने को उत्तराधिकारी कहते हैं। गोरखनाथ मठ मनुष्य से मनुष्य को भेद करने वाली वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध हिदू श्रमिक जातियों के सांस्कृतिक व वर्गीय एकता का केन्द्र रहा। जिस पीठ की बुनियादी विचार धारा थी कि जोगी को वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहिए वहां सिर्फ जोगी, योगी ही नहीं हुआ बल्कि एक संप्रदाय विशेष का हो गया। 20वीं सदी के शुरुआत तक पीठ हिंदू-मुस्लिम जोगियों की परंपरा का केन्द्र था। योगी आदित्यनाथ जो मुस्लिम शासकों को आक्रांता के रुप में स्थापित करते हैं उन्हें यह बताना चाहिए कि गोरखनाथ पीठ को जमीन किसने दी? सच्चाई यह है कि 18वीं शताब्दी के करीब आसफुद्दौला जिसके बारे में कहा जाता था जिसको न दे मौला उसको दे आसफुद्दौला ने हजारों एकड़ जमीन गोरखनाथ पीठ को दी।

                    वहीं अकबर को लव जिहादी कहकर जोधा-अकबर की जो बहस खड़ी की जा रही है, यह तथ्य ऐतिहासिकता से परे है। रही बात सिकंदर की तो जिस तरह सिकंदर कभी तक्षशिला नहीं आया था, उसी तरह चन्द्रगुप्त के शासन काल में उसके भारत आने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। सिकन्दर और इस्लाम के प्रार्दुभाव में तकरीबन आठ सौ सालों का अंतर है। सिकंदर धर्म की सीमाओं से परे हर गांव-गिरांव में हिन्दू-मुस्लिम-सिख सभी में ही इस नाम के लोग मिलते हैं, को किस आधार पर मुस्लिम करार दिया जा रहा है? कितनी भी कोशिश की जाए, किसी अकबर का दीन-ए-इलाही सावरकर के हिंदू राष्ट्र से ज्यादा अपील करेगा, क्योंकि वह दिलों को जोड़ता है न की तोड़ता है। सिर्फ उर्दू भाषा का शब्द होने के एहसास से सिकंदर हमसे दूर नहीं होगा क्योंकि वह हरफन मौला मुकद्दर का सिकंदर है जिसकी प्यार से दुनिया जीतने की हिरोइक छवि युवाओं में ऊर्जा भर देती है। खैर, बहस इतिहास पढ़ने-पढ़ाने की नहीं हैं बल्कि उसके राजनीति की है। आखिर हमारे समाज में जोधा-अकबर की किस्सा गोईयां जिसके सहारे समाज को जोड़ने की बात की जाती थी, उससे समाज कैसे टूटने लगा? आखिर जिस वक्त भी समाज में जोधा-अकबर के बिंब को गढ़ा गया होगा उसकी उस दौर में क्या जरुरत थी, जिसकी जरुरत पूरी हो गई, जो जोधा हिंदू हो गई और अकबर मुसलमान हो गया। जिस गोरखनाथ पीठ को आसफुद्दौला द्वारा जमीन देने को उसकी धार्मिक सहृदयता के रुप देखा जाता था, जिस अयोध्या के मंदिरों और मठों के निर्माण में अवध के नवाबों की भूमिका से मेल-मिलाप की संस्कृति गौरवान्वित होती थी, आखिर वह कैसे अपमानित होने लगी? दरअसल, हिन्दुत्वादी राजनीति भारतीय समाज में व्याप्त इस तरह के इतिहास और लोककथाओं जो कि उसके सांप्रदायिक एजेण्डे को रोकती हैं, को मिटा देना चाहती है। दीनानाथ बत्रा जैसे संघी (अ)शिक्षाविद् विज्ञान और इतिहास से ही छेड़-छाड़ कर रहे हैं तो वहीं इसके राजनीतिक एजेण्डे को योगी जैसे लोग पूरा कर रहे हैं। हिंदू धर्म को सर्वोपरि और ज्ञान-विज्ञान का उद्गम स्थल के रुप में स्थापित करने की यह अतार्किक जद्दोजहद है। चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं जब सांप्रदायिकता के खिलाफ कार्यवाई न करने को भेदभाव न करना बताती हैं तो यह स्थापित हो जाता है कि राज्य रणनीतिक तौर पर अतार्किक समाज का निर्माण कर रहा है या फिर उसकी तर्क क्षमता का ह्यश हो चुका है। एक तरफ विकास की आंधी चलाई जा रही है, दूसरी तरफ अज्ञान बवंडर। ऐसे में समाज को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा, नहीं तो आने वाली हमारी पीढि़यों का जो ज्ञान विकसित करने की कोशिश की जा रही है उससे वह विश्व गुरु तो बन जाएगा, जिसके एक हाथ में माला तो दूसरे में भाला होगा, जैसा योगी आदित्यनाथ कहते हैं, पर इससे उसकी रोजी-रोटी नहीं चलेगी। हमारा बच्चा किसी प्रतियोगिता में अगर लिख दिया कि टेलीवीजन का आविष्कार स्काटलेण्ड के पादरी जान लोगी बाइर्ड ने 1926 में नहीं किया बल्कि महाभारत काल में हो गया था और मोटरकार वैदिक काल में अस्तित्व में आ चुकी थी, जिसका जिक्र ऋगवेद में भी है, तो ऐसे में दीनानाथ बत्रा जैसों के भरोसे ही उसका भविष्य होगा।

? राजीव यादव