संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

अमीरों, उद्योगपतियों के नाम रहा सौ दिन

? सुनील अमर

                 केन्द्र की मौजूदा मोदी सरकार ( शुरु से ही इसे भाजपा सरकार नहीं कहा जा रहा है ) के 100 दिन पूरे हो गए हैं और परम्परानुसार इसे सरकार ने जश्नपूर्वक मनाया है। समाचार माध्यमों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर सरकार ने अपनी उपलब्धियों को गिनाया तो सरकार का यशोगान करने में लगे तमाम अखबारों-चैनलों ने इस अवसर पर विशेष प्रशंसात्मक सामग्री दी है। इसका अध्ययन करने पर पता चलता है कि इस सौ दिन में हासिल सारी उपलब्ध्यिॉं महज अमीर वर्ग और उद्योगपतियों के लिए ही हैं। संतुलन स्थापित करने के नाम पर भी इसमें कहीं से आम आदमी या देश की तीन चौथाई जनता के लिए कुछ नहीं है। इनके हिस्से में सिर्फ बदइन्तजामी और वह हाहाकारी मॅंहगाई आई है जिसे शपथ ग्रहण के दिन भी मोदी सरकार ने 100 दिन में दूर कर देने को कहा था! इसके उलट, उद्योगपतियों से सम्बन्धित मामलों में तो मोदी सरकार ने गज़ब की तत्परता दिखाई और कई ऐसे फैसले पलक झपकते कर दिए जिन्हें करने में पूर्ववर्ती सरकारें झिझकती रही थीं।

                 देश के आम आदमी के लिए सबसे त्रासद समस्या आज भी मॅंहगाई ही है। अपने चुनावी भाषणों में और शपथ ग्रहण पश्चात भी नरेन्द्र भाई मोदी ने आश्वासन दिया था कि यह उनकी प्राथमिकता में होगा और आने वाले 100 दिनों में उनकी सरकार मॅहगाई पर नियंत्रण कर लेगी। बाजारी ताकतों पर नियन्त्रण पाना तो खैर समय साध्य होता है और इतनी जल्दी सरकार अगर उन पर नियन्त्रण नहीं कर पाई तो यह सामान्य बात ही है लेकिन जिन फैसलों के बारे में पता था कि इससे मॅंहगाई बढ़ना तय है उसे भी सरकार ने लागू किया और रातोें-रात उसका असर बाजार और आम आदमी की जेब पर आ गया, जैसे चीनी! चीनी मिल मालिकों को लाभ पहॅुचाने के लिहाज से सरकार ने ताबड़तोड़ तीन काम किया - एक, विदेशों से मॅंगायी जाने वाली चीनी पर लगा हुआ आयात शुल्क दुगने से भी ज्यादा बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया और और दूसरा, देशी चीनी के दाम बढ़ाने की अनुमति दे दी।

                विदेशी चीनी की आवक कम होते ही देशी चीनी के दामों में उछाल आ गया और जाहिर है कि शेयर बाजार में भी और तीसरा यह कि इसके साथ ही किसानों का पैसा दबाए बैठे मिल मालिकों को 66,00 करोड़ रुपये का पॉच साल के लिए ब्याजमुक्त कर्ज भी सरकार ने मंजूर कर लिया! इसे तब भी ठीक माना जा सकता था अगर ऐसा होने से चीनी मिल मालिक गन्ना किसानों का कई वर्षों से हड़पे हुए 11000 करोड़ रुपये का भुगतान कर देते। अभी तक मिल मालिकों ने एक पैसे का भी भुगतान नहीं किया है और उनकी सरकार के साथ सॉंठ-गॉठ देखिए कि उच्च न्यायालय के सख्त आदेश के बावजूद सरकार उनसे पैसा वसूलने की असरदार कोशिश नहीं कर रही है।

               मॅहगाई दूर करने का दिवास्वप्न दिखाकर सत्ता में आई सरकार की इस बाबत प्रतिबद्धताऐं देखिए तो सच्चाई का आभास होता है। इस सरकार ने घोषित किया है कि उसे कुछ कठोर फैसले करने हैं। विपक्ष में रहकर डीजल की कीमत बढ़ोत्तरी का हल्ला मचाने वाली भाजपा ने सत्तारुढ़ होने पर भी यह बढ़ोत्तरी जारी रखी है और साथ ही घरेलू गैस, केरोसिन ऑयल, उर्वरक और सरकारी राशन पर से छूट कम करने की राय जाहिर की है। अब यह तो इस सरकार के नीति नियन्ता ही बता सकते हैं कि इससे मॅंहगाई कम होगी या बढ़ेगी। खुदरा बाजार क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश का विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने मुखर विरोध किया था और कहा था कि इससे न सिर्फ करोड़ों खुदरा व्यापारियों के परिवार पर भुखमरी का संकट आ जाएगा बल्कि यह हमारे देश के आर्थिक तानेबाने और सामाजिक समरसता के लिए भी बुरा होगा लेकिन अब सत्ता में मोदी हैं तो यह सब राग अलापने की मनाही कर दी गई है और ऐसे आसार हैं कि इसे लागू किया जाएगा। विशालकाय बजट वाली विदेशी कम्पनियों और इनके देशी हिस्सेदारों के आगे नतमस्तक होते हुए मोदी सरकार ने अत्यन्त अफरातफरी में दुनिया भर में विवादित जैव संवर्धित बीजों को देश में लाए जाने की अनुमति प्रदान कर दी। पिछली कॉग्रेसनीत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस मसले की जॉंच और सुझाव के लिए एक संसदीय समिति का गठन कर दिया था जिसने अपने अध्ययन के बाद इस तरह के बीजों के भारत में परीक्षण न करने की सलाह दी थी लेकिन केन्द्र में सत्तारुढ़ भाजपा की सरकार ने बीती 18 जुलाई को ऐसे 15 बीजों के देश में परीक्षण किए जाने की चुपचाप अनुमति प्रदान कर दी है। तथाकथित ज्यादा उत्पादन का दावा करने वाले इन अत्यन्त खतरनाक बीजों का हमारे देश में क्या काम है जहॉं हमारी परम्परागत खेती से ही बीते एक दशक में पॉंच गुना से अधिक उत्पादन बढ़ गया है तथा सरकार के पास अनाज रखने की जगह तक नहीं है। देश की आबादी के लिए और ज्यादा खाद्यान्न चाहिए, यह तर्क इस सच्चाई के सामने झूठा साबित हो जाता है कि हमारे यहॉं हर साल 58,000 करोड़ रुपयों का अनाज रखरखाव के अभाव में सड़ जाता है, लेकिन मामला बड़ी पूॅंजी वालों का है जिनके सामने सरकार नतमस्तक हो गई लगती है। जैव सम्वर्द्धित बीज बनाने का काम जिन चुनिन्दा बड़ी कम्पनियों के हाथ में है वे दुनिया के किसी भी देश के राजनेताओं, कृषि वैज्ञानिकों और नौकरशाहों को आर्थिक लाभ पहॅुंचा कर अपने पक्ष मंे करने के लिए कुख्यात हैं। मोदी सरकार के खाते में जो अभूतपूर्व उपलब्धियॉं बताई जा रही हैं उनमें रेलवे का फास्ट ट्रैक, बुलेट ट्रेन और कई गुना ज्यादा पैसा लेकर रेलगाड़ी में हवाई जहाज जैसी सुविधाओं को शीघ्र देने की बात की जा रही है। इसकी चर्चा तक नहीं है कि ट्रेनों में गरीब यात्रियों के लिए बिना आरक्षण वाले डिब्बों की संख्या और बढ़ाई जाएगी या कुछ ट्रेन ऐसी भी चला दी जॉंय जिनमंे आरक्षण की व्यवस्था ही न हो और सारे डिब्बे सामान्य हों। कोई चीज स्किल इंडिया है जिसकी सरकार कोशिश कर रही है! इस सरकार ने 100 दिन में ही सिंगल विन्डो क्लीयरेन्स व ऑन लाइन सिस्टम में बड़ी सफलता प्राप्त कर ली है, ऐसा बताया जा रहा है! इस सरकार के स्वास्थ्य मंत्री बता रहे हैं कि उन्होंने पोलियो से देश को मुक्ति दिला दी है। प्रसिद्ध गुजराती उद्योगपति अम्बानी भाई की गैस कम्पनी को भी उपकृत करने की पूरी तैयारी हो चुकी है। उचित समय आते ही उनके द्वारा निकाली जा रही सरकारी गैस का दाम सीधे दोगुना कर दिया जाएगा। इसी श्रेणी की उपलब्धियॉ इस सरकार के खाते में हैं। गरीब बच्चों को सस्ती उच्च शिक्षा कैसे मिले, बीमार पड़ने पर गरीबों का इलाज कैसे हो सके, जिनके सिर पर छत मयस्सर नहीं है वे जाड़ा-गरमी-बरसात से कैसे बचें, इन सबका कोई जिक्र नहीं है। दुष्यन्त ठीक ही कहते हैं -...लहू-लुहान नजारों का जिक्र आया तो, शरीफ लोग उठे, दूर जाके बैठ गए! मोदी सरकार की नीयत इसी से समझी जा सकती है कि वाराणसी से अपनी सीट निकालने के लिए उन्होने भाव विह्वल होकर वहॉं घोषण की थी कि मुझे मॉं गंगा ने बुलाया है और मैं गंगा का जीर्णोद्धार (सफाई) करूंगा। अब मोदी सरकार ने गंगा सफाई का जो तौर-तरीका अपनाया है, उस पर देश के सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी है कि इस तरह तो 200 साल में भी गंगा की सफाई नहीं हो पाएगी। सरकार के राजकाज का ऑकलन इस टिप्पणी की रोशनी में किया जा सकता है।

? सुनील अमर