संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

बच्चों के बहाने वोट पर नजर

? विवेकानंद

                देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिन 14 नवंबर को बाल दिवस मनाया जाता है। पंडित नेहरू को बच्चों से बहुत प्रेम था बच्चे उन्हें चाचा पुकारते थे इसलिए यह विशेष दिन बच्चों के लिए उत्सव के रूप में आरक्षित किया गया। वर्षों बीत गए इस दिन बच्चे सज-धज कर स्कूल जाते हैं और अपनी बनाई हुई वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाते हैं। इसमें बच्चे अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। नृत्य, गान, नाटक आदि प्रस्तुत किए जाते हैं। नुक्कड़ नाटकों के द्वारा आम लोगों को शिक्षा का महत्व बताया जाता है। यानि बच्चे इस दिन अपना हुनर दिखाते हैं। कोई राजनीति नहीं होती, बच्चे अपना हुनर दिखाते हैं। इसी तरह पांच सितंबर भारत के पहले उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जो बाद में देश के दूसरे राष्ट्रपति भी बने, एक शिक्षक थे और उन्होंने शिक्षकों को सम्मान देने के उद्देश्य से अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया था। इसी दिन केंद्र सरकार द्वारा देश भर के श्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता है। स्कूलों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं बच्चे अपने शिक्षकों सम्मान करते हैं। विशुद्ध रूप से शिक्षा और शिक्षक का सम्मान। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ जब शिक्षक दिवस प्रधानमंत्री दिवस बनकर रह गया। इतिहास में पहली बार गुरु शिष्य के बीच राजनीति ने दखल देने की कोशिश की है। किसी प्रधानमंत्री ने  पहली बार शिक्षक दिवस के दिन बच्चों को सीधे संबोधित किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस पहल की तमाम मीडिया चैनल्स पर भूरि-भूरि प्रसंशा हो रही है। तमाम पूर्वाग्रहों को नकारते हुए यह मान लेने में कोई संकोच नहीं है कि यह सही भी हो सकता है। लेकिन एक सवाल मन में बार-बार उठता है कि शिक्षक दिवस पर बच्चों को संबोधन क्यों शिक्षकों को क्या नहीं? यह शिक्षकों का दिन है, शिक्षकों की गरिमा का दिन है, इसलिए प्रधानमंत्री शिक्षकों की बजाए बच्चों के बीच अपनी मौजूदगी क्यों चाहते हैं? दूसरी बात सरकार ने जिस तरह से मोदी के भाषण को बच्चों को सुनाने के लिए हिटलरी आदेश जारी किए वह भी संदेह पैदा करते हैं कि इसके पीछे का उद्देश्य बच्चों से मिलना जुलना नहीं बल्कि कुछ और ही है। हालांकि मानव संसाधन मंत्रालय ने कहा था कि यह अनिवार्य नहीं एच्छिक है, लेकिन जिस तरह से स्कूलों को आदेश जारी किए गए और फिर स्कूलों ने जिस तरह से बच्चों को मौखिक आदेश दिए वे बताते हैं कि यह एच्छिक नहीं बल्कि जबरदस्ती थी। देश के हजारों स्कूलों में जहां बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, वहां पर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने टीवी सेट और केबल कनेक्शन की ही नहीं, बिजली जाने की स्थिति में जेनरेटर और इनवर्टर का प्रबंध भी करने के निर्देश दिए और अगले ही दिन रिपोर्ट भी मांगी कि कितने छात्र-छात्राओं ने प्रधानमंत्री के भाषण को सुना। क्या यह अपने आप में साबित नहीं करता यह बच्चों और स्कूलों पर जबदरस्ती थोपा गया आदेश था। इन सबकी आवश्यकता क्या थी? और फिर असल बात कि मोदी ने इस दिन बच्चों को ऐसा क्या गुरु मंत्र दिया जो शिक्षक या उनके माता-पिता उन्हें रोज नहीं देते? मोदी ने अपनी शरारतें बांटीं, बिजली बचाने की बात कही, स्कूल साफ करने की बात कही, इसमें ऐसा नया क्या है जो बच्चों के लिए अद्वितीय हो, सिवाए इसके कि पहली बार वे तीन घंटे तक टीवी के सामने बैठे रहे और अनेकों तो इसमें से वोर भी होते रहे। 

                दरअसल इसकी नींव में है राजनीति। वास्तव में यह काम आरएसएस ने अपने स्कूलों के जरिए शुरू किया था। आरएसएस की सोच रही होगी कि जितने बच्चे उनके स्कूलों में पढ़ेंगे वे भविष्य में संघ से जुड़ेंगे इससे उसका जनाधार बढ़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो किया वह भी इसी कड़ी का अगला हिस्सा है। देश में करोड़ों बच्चे हैं जिनमें से लाखों अगले लोकसभा चुनाव में वोटर भी होंगे। मोदी और बीजेपी की नजर यहीं पर है। उन्होंने यह कह कहकर अपने मंसूबे साफ भी कर दिए कि अगले 10 साल तक वे ही प्रधानमंत्री रहेंगे, उन्हें कोई खतरा नहीं है। मतलब साफ है नरेंद्र मोदी अगले चुनाव के लिए तैयारी अभी से कर रहे हैं। और अपनी इस सियासी कवायद में उन्होंने शिक्षक दिवस के रूवरूप को ही बदल दिया। शिक्षक दिवस को प्रधानमंत्री दिवस बना डाला।

             

इस दिन से जुड़ा एक और विवादास्पद पहलू है। मानव संसाधन मंत्रालय इस दिन को गुरु उत्सव के रूप में मनाना चाहता था। हालांकि विवाद होने के भय से इस विचार को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। लेकिन सवाल फिर भी लाजमी है कि क्या दुनियाभर में भारतीय दर्शन के व्याख्याता के रूप में विख्यात सर्वपल्ली राधाकृष्णन को गुरु की महिमा और उसके जीवन में महत्व के बारे में नहीं पता था जो उन्होंने अपने जन्मदिन को गुरु दिवस या गुरु उत्सव न कहकर केवल शिक्षक दिवस कहना बेहतर समझा? बहरहाल शिक्षक दिवस पर पीएम का भाषण और इस दिन को गरु उत्सव बनाने के पीछे लक्ष्य चाहे जो भी हों, लेकिन यह बात साफ है कि बीजेपी राजनीतिक लाभ के लिए जिस तरह की परंपराएं डाल रही है वह भविष्य में कलहकारी होंगी। शिक्षक दिवस पर भी पीएम के भाषण का जहां बीजेपी शासित राज्यों में उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया वहीं गैर बीजेपी शासित राज्यों में जमकर विरोध किया गया। कई शिक्षकों और गणमान्य लोगों ने भी इसका विरोध किया। भविष्य में मोदी की नकल करते हुई कोई और सरकार इस तरह के कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाएगी इससे इंकार नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश से इसकी बानगी सामने आ गई है। प्रधानमंत्री का भाषण बच्चों को सुनाने की व्यवस्था का फरमान आते ही उत्तरप्रदेश सरकार ने इसका विरोध तो नहीं किया लेकिन यह भी साफ कर दिया था कि हम भी बच्चों को बताएंगे कि अखिलेश सरकार ने सत्ता में आने के बाद जनहित के लिए क्या किया। यूपी के माध्यमिक शिक्षा मंत्री महबूब अली ने कहा था कि सभी जिला विद्यालय निरीक्षकों को प्रधानमंत्री का संबोधन प्रसारण और अखिलेश सरकार की उपलब्धियों का दिखाने के निर्देश दिए गए हैं। यह सिलसिला आगे चलता रहा तो पारंपरिक दिवसों और कार्यक्रमों को सियासी आखाड़ेबाजी में बदलने वाला साबित होगा।

   

? विवेकानंद