संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

स्पंदित गुजरात - अल्पसंख्यकों के लिए जगह ?

? सुभाष गाताडे

              होटल मालिक मुस्तफा पटेल - इन दिनों बेहद दुखी हैं। अहमदाबाद से बमुश्किल नब्बे मिनट वाहन की दूरी पर विरमगाम हाईवे पर स्थित ज्योति होटलउन्हें अन्ततः बन्द करना पड़ा है। कोई भी शख्स जिसने कभी उस सड़क से यात्रा की हो, इस होटल के खाने की तारीफ करने से नहीं चूकेगा। लेकिन अब महज यादें बची हैं। कई दशकों से उनके साथ काम कर रहे कर्मचारियों ने भी अब दूसरी नौकरी की तलाश शुरू की है। निःस्सन्देह जनाब मुस्तफा पटेल के लिए यह बेहद दर्दनाक निर्णय रहा है,मगर उनके सामने कोई चारा भी नहीं रहा था। उन्हें असामाजिक तत्वों से धमकियां मिल रही थीं -जिनके हिन्दुत्ववादी संगठनों के साथ कथित तौर पर नजदीकी रिश्ते थे - और कोर्ट के आदेश के बावजूद पुलिस ने उन्हें सुरक्षा देने से इन्कार किया था। उनके सामने एक ही विकल्प था या तो वह गोलियां झेलने के लिए तैयार रहते या उनकी मांग को मानते। उन्होंने उनकी मांग को ही भारी मन से कूबूल किया,शायद यही सोचते हुए कि कमसे कम इससे चन्द मासूमों की जिन्दगियां बच सकती हैं। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सामने उन्होंने भेजी याचिका में इस समूचे प्रसंग का विस्तृत वर्णन है।

                         सूबा गुजरात में मुस्तफा पटेल का मामला अकेला नहीं है। पिछले एक माह में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिन्हें अपने व्यापार से हाथ धोना पड़ा है। इसमें शामिल हैं: कासिम अहमद (कबाड़ी व्यापारी), अहमद आरिफ (मिनरल्स/खनिजं), फारूक भाई (पॉवर प्रोडक्शन यूनिट), याकूब मोहम्मद (खनिज निर्माण), सैफुद्दीन अली (बिजली उत्पादन), अहमद खोखा (ऊर्जा), शाबिर भाई (खनिज निर्माण), माजिद खान (ऊर्जा) और हारून अब्दुल मालाझेर (खदान) (http://www.maeeshat.in/2014/09/gujarati-muslims-are-not-allowed-in-vibrant-gujarat-program/) ख़बर आयी है कि हाल में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने गुजरात सरकार को इस सम्बन्ध में लिखा है कि किस तरह उनके सूबे में अल्पसंख्यक समुदाय के व्यापारी/बिजनेसवालों को अपना काम बन्द करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, धमकाया जा रहा है और राज्य की एजेंसियां खामोश बैठी हैं। और राज्य सरकार की इसे लेकर प्रतिक्रिया रूटिन किस्म की थी। सुश्री आनन्दीबेन पटेल के मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ सदस्य ने इन आरोपों से इन्कार किया तथा याचिकाकर्ताओं पर ही आरोप जड़ दिए। उन्होंने यह भी कहा कि जिन्हें शंका है वह अहमदाबाद की यात्रा कर देख सकते हैं।

                  वैसे, यह कोई पहली दफा नहीं है कि अल्पसंख्यक आयोग के सामने गुजरात के अल्पमत समुदाय की तरफ से शिकायतें पहुंची हों। कुछ समय पहले गुजरात के छोटा उदेपुर इलाके के नौ व्यापारियों ने उसे लिखा था और बताया था कि किस तरह ग्रासरूट स्तर पर साम्प्रदायिक तत्वों और प्रशासन के बीच अपवित्र गठबन्धन बना हुआ है। इस सम्बन्ध में इरफान अब्दुल गनी का मामला काफी गौरतलब है जिनका इस इलाके में लक्जरी ट्रान्स्पोर्ट का बिजनेस था। उनका प्रतिद्वंदी - जो गांव का सरपंच भी था, उसने कथित तौर पर गांव में दंगे जैसी स्थिति बनायी और वह उनके बिजनेस पर नियंत्रण करने में सफल हुआ। उसी इलाके में किसी मामूली विवाद में आदिवासियों और मुसलमानों के बीच एक साम्प्रदायिक किस्म का झगड़ा भी हुआ, जब अल्पसंख्यकों के उद्योगों पर सुनियोजित ढंग से हमला किया गया, पुलिस वहां पहुंची, प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गयी मगर आज तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई।

                   गौरतलब है कि वे सभी जो सूबा गुजरात के घटनाक्रम पर बारीकी से निगाह रखते हैं, उन्हें इस बात के संकेत मिल रहे थे कि ऐसी चीजें संगठित रूप में सामने आएंगी, जब कुछ समय पहले राज्य सरकार ने पलिटाना नगर को - जो जैन लोगों के लिए पवित्र समझा जाता है - शाकाहारी इलाका घोषित करने की जैन साधुओं द्वारा पेश की गयी मांग के प्रति सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन दिया था।जैन साधुओं ने इलाके में लम्बे समय से कायम 260 कसाई की दुकानें बन्द करवाने की भी मांग रखी थी। जैन साधुओं द्वारा सरकार पर दबाव डालने के तहत की गयी भूख हड़ताल के चौथे दिन गुजरात सरकार के काटेज उद्योग के राज्यमंत्री ताराचन्द छेड़ा खुद वहां पहुंचे थे। मंत्री महोदय ने ऐलान किया था कि पलिटाना नगर को, शाकाहारी इलाका घोषित करने का निर्णय लिया गया है। इसके बाद ही उन्होंने हड़ताल वापस ली थी। मालूम हो कि एक लाख आबादी वाले इस नगर की 25 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इतनाही नहीं स्थानीय सरकारी अधिकारी बताते हैं कि नगर की चालीस फीसदी आबादी मांसाहारी है। सिर्फ मुस्लिम ही नहीं कोली जैसे हिन्दू समुदाय भी मांसाहारी हैं। इसके कुछ समय पहले पलीटाना म्युनिसिपल कमेटी ने जैन धार्मिक नेताओं के दबाव में आकर अपनी आम सभा में यह प्रस्ताव पारित किया था कि म्युनिसिपालिटी की सीमा के भीतर मांस और अन्य गैरशाकाहारी भोजन - जिनमें अंडे भी शामिल किए गए हैं - के विक्रय पर रोक लगायी जाएगी। जानकारों के मुताबिक यह निर्णय जैनियों के राजनीतिक दबाव के तहत लिया गया था जो राज्य में काफी प्रभावशाली माने जाते हैं और सत्ताधारी पार्टी को भरपूर चन्दा देते है। इस मसले को लेकर अल्पसंख्यकों का डर वाजिब रहा है कि उन्हें बकरीद जैसे त्यौहार पर भी जानवर को जबह करने की अनुमति नहीं होगी, जो उनका धार्मिक कर्तव्य है। अल्पसंख्यक समुदाय के व्यापारियों पर यह जो दबाव डाला जा रहा है उसके बारे में चर्चा करते हुए अब्दुल हफीज लखानी लिखते हैं कि किस तरह मुसलमानों को पलिटाना में मीट तथा अंडे का व्यापार करने नहीं दिया जा रहा है...जबकि पश्चिमी राजनयिक और निवेशक गुजरात सरकार से रियायतें हासिल करने के लिए लाइन लगा रहे हैं। ; (http://muslimmirror.com/eng/muslim-traders-being-forced-to-close-down-their-business-in-vibarant-gujarat/)  वे सभी जो नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध से गुजरात में तेज हुई हिन्दुत्ववादी संगठनों की सरगर्मियों से वाकीफ है आप को बता सकते हैं कि इस मुहिम का एक प्रमुख जोर अल्पसंख्यकों के आर्थिक बहिष्कार पर भी होता था ताकि शेष लोग उनसे सामान खरेदी न करे और वह बन्द हो जाए। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि देश के पैमाने पर जो वातावरण बना है, उसमें इन संगठनों को यह सपना साकार होता दिख रहा है कि वह गुजरात में इस प्रयोग को एक और मुकाम तक ले जाना चाहते हैं ताकि शेष मुल्क में भी उसकी नज़ीर बने। यह सवाल अभी भविष्य के गर्भ में छिपा है कि क्या मुस्तफा पटेल अपनी होटल फिर खोल सकेंगे? क्या सत्ता में बैठे लोग अल्पसंख्यक आयोग के पास पड़ी इन याचिकाओं पर गौर करेंगे और पुलिस अफसरों को आदेश देगे कि वह मामले के दोषियों को सलाखों के पीछे भेजें ? 15 अगस्त की अपनी तकरीर में जनाब मोदी ने लाल किले से बोलते हुए दस साल तक साम्प्रदायिक और जातीय हिंसा पर रोक की बात कही थी। अगर हम अपने आप को गुजरात पर ही केन्द्रित करें तो बता सकते हैं कि वह जो कहते हैं और हिन्दुत्ववादी संगठनों के पैदलवीर जमीनी स्तर पर जो कुछ करते हैं, उसमें किस तरह जमीन आसमान का अन्तराल रहता है। ध्यान रहे कि गुजरात के मुख्यमंत्री पद से जनाब मोदी के हटने के बाद उनके राज्य में परिवारी संगठनों की हरकतें अचानक बढ़ गयी हैं। नए सिरे से बात बात पर दंगे भड़कने या दंगे जैसी स्थिति बनने के भी समाचार हैं। मगर जनाब मोदी शायद यह तय कर चुके हैं कि ऐसे सभी संवेदनशील मसलों पर वह मौनेन्द्र ही बने रहेंगे।

? सुभाष गाताडे