संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

धर्म परिवर्तन की राजनीति और अम्बेडकर

? वीरेन्द्र जैन

                प्रेम विवाह भी अंततः विवाह ही होता है और उसमें भी परम्परागत विवाह की तरह कभी कभी टूटन पैदा हो जाती है। जब ऐसी टूटन अंतर्धार्मिक विवाहों के बीच आती है तो धर्म के आधार पर राजनीति करने वाले इसे धर्म परिवर्तन से जोड़ने लगते हैं ताकि एक सम्प्रदाय की भावनाओं को भड़का कर उसका राजनीतिक लाभ ले सकें। लव जेहाद शब्द भी एक धर्म विशेष से जुड़े शब्द से मिला कर एक षड़यंत्र की रचना है। धर्म परिवर्तन के नाम पर किये जा रहे साम्प्रदायिक धृवीकरण के परिप्रेक्ष्य में इस बात को विस्तार से समझने की जरूरत है कि भारत रत्न डा.भीमराव अंबेडकर ने कई लाख दलितों के साथ नागपुर में जोर शोर से धर्म परिवर्तन किया था। उन्होंने सवर्णों द्वारा दलितों के साथ किये जा रहे शोषण और दमन के विरुद्ध अपना प्रतिरोध दर्ज कराने के लिए यह अहिंसक कदम उठाया था और बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। डा. अम्बेडकर के जीवन प्रसंगों में हिन्दू सवर्ण समाज द्वारा किये गये दुर्व्यवहार की जितनी चर्चा आती है उतनी बौद्ध धर्म के प्रभाव की नहीं आती। स्मरणीय है कि उन्होंने कहा था कि मैं हिन्दू धर्म में पैदा जरूर हुआ हूं, पर हिन्दू की तरह मरूंगा नहीं।

                             हिन्दू साम्प्रदायिक दल वैसे तो यह कहते रहे थे कि मनुस्मृति ही हमारा संविधान है, और संविधान के गठन के समय भी उन्होंने कहा था कि जब हमारे यहाँ मनुस्मृति मौजूद है तो अलग से संविधान की क्या जरूरत पर प्रकारांतर में वे जब इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इस लोकतंत्र में दलितों के लिए भगवान का दर्जा पा चुके, अम्बेडकर के विचारों और कार्यों की उपेक्षा का मतलब पूरे दलित समाज से दूर हो जाना है, तब ही उन्होंने उन्हें स्वीकारा और अपनाने की कोशिश की। उल्लेखनीय है कि इस बात को बहुत दिन नहीं हुये जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में उन अरुण शौरी जी को महत्वपूर्ण मंत्री बनाया गया था जिन्होंने अम्बेडकर के खिलाफ इलेस्ट्रेटिड वीकली में एक श्रंखला लिखी थी और जो बाद में पुस्तकाकार रूप में भी वर्शिपिंग फाल्स गाड के रूप में सामने आयी थी। हाल ही में यह भी चर्चा रही कि मोदी मंत्रिमण्डल में उन्हें मंत्री बनाया जाने वाला था जिसे बाद में अगले मंत्रिमण्डल विस्तार तक के लिए स्थगित कर दिया गया है, जो सम्भवतः महाराष्ट्र समेत कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव हो जाने के बाद किया जायेगा। अम्बेडकर समर्थकों को लुभाने के लिए भाजपा समर्थक यह कह कर उनकी प्रशंसा करने लगे थे कि अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करते समय इस बात का ध्यान रखा कि उन्होंने अपने समर्थकों को मुसलमान या ईसाई बनाने की जगह बौद्ध धर्म अपनाने को प्रेरित किया। विडम्बना यह है कि उक्त बात करते समय वे खुद को एक हिन्दूवादी दल होने की सच्चाई बयान कर रहे थे जिसे गाहे-बगाहे वे छुपाने की असफल कोशिशें भी करते रहते हैं।

              इतिहास बताता है कि जब धर्म शोषण का हथियार बनता है तब वह अधिक से अधिक समर्थन जुटाना चाहता है, और दूसरे धर्मों को किसी भी तरह परास्त करना चाहता है। हिन्दुओं के लिए जब देश में इस्लाम चुनौती नहीं था तब बौद्ध धर्म चुनौती के रूप में सामने आया था जिसने समाज की जाति प्रथा के विरुद्ध भी आवाज बुलन्द की थी। बाद में देश और विदेश में तेजी से विस्तार करते हुये बौद्ध धर्म से उनके हिंसक संघर्ष हुये थे और पुष्यमित्र काल में बौद्ध धर्म के हजारों मठ व ग्रंथ नष्ट कर दिये गये थे व लाखों बौद्धों को मौत के घाट उतार दिया गया था। जो बौद्ध धर्म चीन, तिब्बत, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बर्मा, जापान आदि पूरे पूर्व एशिया में फैला वह सम्राट अशोक के काल में राज्याश्रित होकर इस भूखण्ड में भी बहुत अधिक प्रभाव रखता था। जब इस हिंसक विरोध से भी बौद्ध धर्म भारत से पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ तब उसका विकृत्तीकरण किया गया। उल्लेखनीय है कि जिस बुद्ध शब्द का अर्थ मूर्ख माना गया है वह निन्दा की तरह बौद्धों के लिए ही तत्कालीन हिन्दुओं द्वारा प्रयुक्त किया गया था। इस तरह के विकृतीकरण से भी निष्प्रभावी होने के बाद बुद्ध को अवतार मानने की नीति बनायी गयी थी। लगभग इसी तरह गाँधीजी की हत्या के बाद मिठाई बाँटने वालों ने बाद में उनके नाम को प्रातः स्मरणीयों में सम्मलित कर लिया था।

                         हमारे देश में धर्म परिवर्तन का लम्बा इतिहास रहा है और अलग अलग दर्शनों वाले शैव, शाक्त व वैष्णवों के एक साथ आने के साथ जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाज, आदि भिन्न दर्शनों और पूजा पद्धतियों के लोग उसी में से निकलते भी रहे हैं। हर युग में लाखों की संख्या में लोग अपनी आस्थाएं बदलते  रहे हैं। अहिंसक आन्दोलन से स्वतंत्र हुये देश में अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन को अपने राजनीतिक दर्शन का आधार बनाया था ताकि दलितों के साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार के खिलाफ सवर्णों पर दबाव बनाया जा सके, और एक जातिविहीन समाज की स्थापना का वातावरण तैयार किया जा सके।

             डा. अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को दीक्षा भूमि, नागपुर में लगभग आठ लाख हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराते हुये अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं थीं जिससे उनकी नीति के संकेत मिलते हैं। उन्होंने इन शपथों को इस तरह निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके। ये प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं। ये प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं।

                        1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा

                       2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैंउनकी पूजा करूँगा

                       3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा

                      4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ

                      5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ

                      6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा

                      7.मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा

                      8. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ

                      9. . मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा

                     10.  मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा

                     11. मैं चोरी नहीं करूँगा

                     12. मैं झूठ नहीं बोलूँगा

                     13.मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा

           14. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा

                      15. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा

                      16. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ

                      17. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है

                      18. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा)

                       19. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा

                       20. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा

                        21. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा

                        22. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा

                       साम्प्रयादिकता और जातिवाद के आधार पर धृवीकृत समाज में इन बुराइयों का रणनीतिक विरोध भी चलता रहता है। गत दिनों मध्यप्रदेश के शिवपुरी में एक दलित परिवार ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस्लाम धर्म अपनाने और धर्म परिवर्तन को हथियार बनाया जिससे मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार में तेज हलचल हुयी, और उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया। यदि अम्बेडकर द्वारा प्रयुक्त यह हथियार दलित जनता के हाथ लग गया तो वह हर तरह की साम्प्रदायिक सरकारों पर दबाव बनाने के लिए इसका प्रयोग कर सकती है। स्मरणीय है कि आज से लगभग आठ साल पूर्व कुछ अध्यापक संगठन अपनी माँगें मनवाने के लिए इस धमकी का प्रयोग कर चुके हैं। यदि दलित और आर्थिक रूप से पिछड़े समाज ने इसे हथियार की तरह उपयोग करना शुरू कर दिया तो भविष्य में धर्म के आधार पर राजनीति करने वालों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।

? वीरेन्द्र जैन