संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

किसानों का खेती से मोहभंग: बढाएगा जनसंघर्ष? 

? डॉ.  सुनील शर्मा

          निल कुमार खेती  को छोड़ किसी दूसरे काम की तलाश में हैं क्योंकि उनके लिए अब खेती के सहारे परिवार चलाना कठिन होता जा रहा है। अनिल के खेतों की सोयाबीन की फसल पिछले साल ज्यादा बारिस के कारण नष्ट हो गई,चने को ओलों ने बर्बाद कर दिया और इस सत्र में समय पर पानी न गिरने से सोयाबीन की फसल लगाई ही नहीं खेत खाली हैं। ऐसे हालात केवल पिछले सत्र से बन रहें हों ऐसा नहीं है बल्कि खेती के लिए ओला,पानी, अवर्षा और कीट प्रकोप लगभग हर साल की नियति बन चुका है। जिससे अब खेती किसानों के लिए मुनाफे का सौदा नहीं रह गई है बल्कि बर्बादी का कारण बनती जा रही है। और यह बात सर्वप्रथम वर्ष2003में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन(एनएसएसओ)के 59वें दौर में यह बात सामने आई कि खेती मुनाफे का सौदा नहीं रह गई और विकल्प मिलने की स्थिति में 40 फीसदी किसान तुरंत खेती छोड़ने के इच्छुक थे। वर्ष 2003 से 2013 एक दशक में किसानों के हालात और बिगड़े और सेंटर फॉर स्टडी आफ डेवलपिंग सोसाइटीज(सीएसडीएस) द्वारा एक गैर सरकारी संगठन से कराए सर्वे के अनुसार अब 61 फीसदी किसान नौकरी मिलने की स्थिति में खेती छोड़ने के लिए तैयार हैं,क्योंकि खेती से होने वाली आमदानी उनकी जरूरत पूरी नहीं कर पाती है और अपनी जरूरतें पूरी करने खेती से इतर काम करना पड़ते हैं। अधिकांश किसानों ने माना कि उनकी तुलना में चपरासी की नौकरी वाला व्यक्ति ज्यादा सुखी है। खेती के बिगड़ते हालात् से किसानों की संख्या में भी लगातार गिरावट आ रही है, जनगणना के उपलब्ध ऑकड़ों के मुताबिक जहॉ वर्ष1991 में देश में 11 करोड़ किसान थे, वहीं 2001 में उनकी संख्या घटकर 10.3 करोड़ रह गई जबकि 2011 में यह ऑकड़ा और घटकर 9.58 करोड़ रह गया। आंकड़ों से स्पष्ट है कि देश में रोजाना 2000 से ज्यादा किसान खेती छोड़ रहें है। किसान अपने बदतर हालात के चलते अपने बच्चों को भी खेती से दूर रखने का जतन कर रहें हैं और ग्रामीण युवाओं के हालात् तो ये हैं कि 76 फीसदी युवा खेती नहीं करना चाहते हैं बल्कि आजीविका के लिए नौकरी करना चाहते हैं।

             इन सर्वेक्षणों को किसी भी प्रकार के पुर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं माना जा सकता है बल्कि पूरा पूरा सच है। प्रश्नचिंन्ह ये कि अगर किसानों के हालात् नहीं सुधरे और उनकी खेती से मोहभंग की स्थिति बरकरार रही तो  बदले तो खेती का क्या होगा? निश्चित तौर पर खेती की जमीन किसानों के हाथ से कार्पोरेट के हाथों में चली जाएगी, इससे पहले  बड़े किसान का जन्म होगा जो गॉव के छोटे रकबे वाले किसानों की जमीने खरीद लेंगे, जो अंततः कार्पोरेट के लिए काम करेगें और फिर देश में कंपनियों खेती करेंगी, गॉव के किसान उनके फार्म पर वेतन भोगी कर्मचारी होगं, हो सकता है किसानों की नौकरी की ख्वाहिस पूरी कर दे कार्पोरेट खेती, मगर उनके सामाजिक और आर्थिक हालात् और भी ज्यादा बदतर होते जाएॅगें। जैसा म.प्र और यूपी के अनेक हिस्सों में देखा जा रहा है कि यहॉ या तो शहर के व्यापारी किसानों से जमीन खरीद रहें हैं या फिर बाहरी प्रदेशों के बड़े किसान और विक्रेता उनके मजदूर! कार्पोरेट खेती के हालात में देश की बड़ी आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा की स्थिति क्या होगी? निश्चित रूप से कंपनियॉ ही तय करेगीं ये सब बाते क्योंकि तब राज्य सत्ता भी कार्पोरेट के इशारों पर चलने वाली है। वास्तव में किसानों का खेती से मोहभंग एक भारी संकट की ओर इशारा करता है।

              किसानों को खेत से बेदखल होने से रोकना ही होगा। इसके लिए खेती को लाभ का धंधा बनाया जाए। जैसा कि किसान कहते हैं वो राजनेताओं के भाषणों में लगातार ये जुमला सुनते  आ रहें हैं मगर अभी तक पता नहीं कि ये कैसे होगा? क्योंकि खेती लगातार घाटे का सौदा बनता जा रहा है एक तो खेती की बढ़ती लागत और उत्पादन की अनिश्चितता, अब जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा भी खेती को तबाह करने वाला है। अगर खेती को लाभ का धंधा बनाना है तो किसानों को आजीविका की सुरक्षा दी जाए। किसानों को पेंशन की व्यवस्था बननी चाहिए जो कि एक कर्मचारी की तर्ज पर हो। इसके लिए एनपीएस का विस्तार एक कारगर और बेहतर विकल्प हो सकता है। न्यूनतम सर्मथन मूल्य तय करने में किसानों की लागत को देखा जाए और इस बात की पुख्ता गारंटी मिले कि किसान को  अपने उत्पाद इससे काम दाम पर बेचने मजबूर न होना पड़े। गेहू, चावल के भण्डारण के लिए किसानों को प्रोत्साहन मूल्य की व्यवस्था भी एक कारगर विकल्प हो सकता है इसके लिए  गेंहू को अक्टूबर के बाद बेचने पर किसानों को मई जून की तुलना में अधिक कीमत तथा रखने का खर्च देकर  उन्हें ज्यादा लाभ दिलाया जा सकता है जिसका फायदा से होगा कि मई जून में खरीदी और भण्डारण का पूरा बोझ ऐंजेंसियों पर नहीं पड़ेगा और गोंदामों में अनाज के सड़ने की समस्या से भी मुक्ति मिलेगी। किसानों की फसल बीमा और मुआवजे की स्थिति बदतर है इसमें भारी भ्रष्टाचार है इसका फायदा सिर्फ सरकारी कर्मचारियों और दलालों को मिल रहा है। इसमें तत्काल सुधार और परिवर्तन की जरूरत है।वास्तव में अगर किसान खेती से दूर होते हैं तो देश की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाएगी और देश में जनसंघर्ष की स्थिति बढ़ेगी।  

                
? डॉ.  सुनील शर्मा