संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

लड़कियों को खुद जागरूक होना होगा

? वसीमा खान

         दुनिया भर में आए-दिन महिलाएं यौन हिंसा का शिकार होती हैं। यौन हिंसा भी कई तरह की। छेड़-छाड़, भद्दी टिप्पढि़यों से लेकर जबरन यौन संबंध और जघन्य सामूहिक बलात्कार। महिलाओं के खिलाफ होने वाली इस यौन हिंसा को रोकने के लिए हर देश अपनी-अपनी तरह से कोशिशें भी कर रहा है, बावजूद इसके इन यौन अपराधों में कोई कमी नहीं आ पा रही है। इस मामले में खास तौर से दक्षिण एशिया में स्थिति और भी ज्यादा खराब है, जहां महिलाएं कहीं भी महफूज नहीं। समाज के बाहर की बात यदि छोड़ दें, तो महिलाएं अपने परिवार में भी सुरक्षित नहीं। यहां भी उन्हें सबसे ज्यादा यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है। महिलाओं के साथ यह हिंसा कोई दूसरा नहीं, बल्कि उनका सबसे ज्यादा नजदीकी रि्तेदार करता है। महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराधों का चेहरा दिन-पे-दिन कितना बदनुमा हो गया है, यह बात यूनिसेफ की एक रिपोर्ट भी बतलाती है। हिडेन इन प्लेन साइट नाम से हाल ही में आई इस रिपोर्ट के मुताबिक 15 साल से 19 साल तक की उम्र वाली 77 फीसदी लड़कियां कम से कम एक बार अपने पति या साथी के द्वारा यौन संबंध बनाने या अन्य किसी यौन क्रिया में जबरदस्ती का शिकार हुई हैं। रिपोर्ट कहती है कि दक्षिण एशिया में साथी द्वारा की जाने वाली यह हिंसा व्यापक तौर पर फैली है। यहां शादीशुदा या किसी के साथ संबंध में चल रही पांच में से कम से कम एक लड़की अपने साथी द्वारा हिंसा की शिकार हुई है। महिलाओं के खिलाफ होने वाली इस तरह की यह हिंसा बांग्लादेश और भारत में सबसे ज्यादा है। यानी ये दोनों देश इस मामले में अव्वल नंबर पर हैं।

                 रिपोर्ट की यदि और भी गहराई में जाएं, तो इसमें यह भी निष्कर्ष निकाला गया है कि इस उम्र समूह की आधी से ज्यादा लड़कियों ने अपने माता-पिता के हाथों शारीरिक प्रताड़ना को भी झेला है। यानी यहां भी लड़कियों के प्रति नजरिए में जरा सा भी बदलाव नहीं। माता-पिता भी उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं करते। 190 देशों से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर तैयार की इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के लगभग दो तिहाई बच्चे या 2 साल से 14 साल के उम्रसमूह के लगभग एक अरब बच्चे उनकी देखभाल करने वाले लोगों के हाथों नियमित रूप से शारीरिक दंड पाते रहे हैं। जाहिर है इस तरह के रुझान सचमुच चौंकाने वाले हैं। एक लिहाज से देखें तो घर-परिवार में यह परिपाटी सी बन गई है कि बच्चों को यदि अच्छी तरह से समझाना है, तो उन्हें शारीरिक सजा देना जरूरी है। यह सोचे बिना कि इस तरह की सजा उनके मासूम दिलोदिमाग पर क्या असर करेगी ? यह सजा आगे चलकर उनके समूचे व्यक्तित्व पर किस तरह से असर डालेगी।

              अपने देश की यदि बात करें, तो रिपोर्ट कहती है कि भारत में 15 साल से 19 साल की उम्र वाली 34 फीसदी विवाहित लड़कियां ऐसी हैं, जिन्होंने अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा झेली है। यही नहीं 21 फीसदी लड़कियों ने 15 साल की उम्र से शारीरिक हिंसा झेली है। रिपोर्ट में विष्लेषण है कि यह हिंसा करने वाला व्यक्ति पीडि़ता की वैवाहिक स्थिति के अनुसार, अलग-अलग हो सकता है। इस बात में कोई हैरानी नहीं है कि कभी न कभी शादीशुदा रही जिन लड़कियों ने 15 साल की उम्र के बाद से शारीरिक हिंसा झेली है, इन मामलों में उनके साथ हिंसा करने वाले मौजूदा या पूर्व साथी ही थे। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई, उनके साथ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, दोस्त, जान पहचान के व्यक्ति और शिक्षक थे। यानी लड़कियों के खिलाफ यह हिंसा उनके अपने और खास लोग ही करते हैं। बहरहाल इस तरह के मामलों में अजरबेजान, कंबोडिया, हैती, भारत, लाइबेरिया, साओ टोम एंड प्रिंसिप और तिमोर लेस्ते में आधी से अधिक अविवाहित लड़कियों ने जिस शख्स पर इसका इल्जाम लगाया, वह पीडिता की मां या सौतेली मां थी। जाहिर है यहां भी यह कहावत चरितार्थ होती है कि औरत ही, औरत की सबसे बड़ी दु्मन है।

              यूनिसेफ की यह रिपोर्ट इसके अलावा और भी कई सनसनीखेज बातें बयान करती है, जिस पर कि समाज और सरकार दोनों को ध्यान देना बेहद जरूरी है। मसलन रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों के खिलाफ हिंसा का प्रचलन इतना अधिक है और यह समाज में इतनी गहराई तक समाई हुई है कि इसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। या एक सामान्य बात मानकर स्वीकार कर लिया जाता है। जाहिर है कि यह स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक है। जब समाज या परिवार को इस बात का जरा सा भी अहसास नहीं कि वे जो कुछ कर रहे हैं, वह गलत है, तब उसमें सुधार की गुंजाइश कैसे होगी ? इस स्थिति में सुधार तभी मुमकिन है, जब वे बच्चों के खिलाफ हिंसा को एक असामान्य बात मानें। समाज और परिवार को इस तरह से िक्षित किया जाए कि वे बच्चों, खास तौर पर लड़कियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनें। 

              बच्चों के खिलाफ हिंसा को सिर्फ समाज ही सामान्य बात नहीं मानता, बल्कि खुद लड़किया भी जिनके खिलाफ यह हिंसा सबसे ज्यादा होती है, वे भी कमोबेश ऐसी ही राय रखती हैं। 15 साल से 19 साल उम्र समूह की तकरीबन 41 से 60 फीसदी लड़कियां मानती हैं कि यदि पति या साथी कुछ स्थितियों में अपनी पत्नी या साथी को मारता-पीटता है, तो यह सही है। यानी समाज और परिवार में बचपन से ही लड़कियों की यह मानसिकता बना दी जाती है कि उसे अपने खिलाफ होने वाली यह हिंसा गलत नहीं लगती। उसके दिमाग का कुछ इस तरह से अनुकूलन किया जाता है कि वह इसे सामान्य बात मानती है। जाहिर है जब उसकी नजर में कोई बात गलत नहीं है, तो वह उसका प्रतिरोध कैसे करेगी। प्रतिरोध तभी मुमकिन है, जब लड़कियों को यह अहसास हो कि उसके साथ जो षारीरिक हिंसा हो रही है, वह गलत है। उसके माता-पिता हों या फिर पति/साथी, किसी को भी यह हक नहीं कि उसके साथ हिंसा करे। लड़कियों के खिलाफ होने वाली इस तरह की षारीरिक हिंसा के खिलाफ ऐसा नहीं कि देश में कोई कानून नहीं है। कानून कई हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल बहुत कम होता है। अव्वल तो अपने परिवार की इज्जत-मर्यादा का ख्याल कर, लड़कियां खुद ही सामने नहीं आतीं। यदि कुछ लड़कियां सामने आती भी हैं, तो उन्हें अपने परिवार और समाज से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता। यही वजह है कि उन पर होने वाले अत्याचारों में कोई कमी नहीं आती। लड़कियों के खिलाफ यह हिंसा तभी रुकेगी, जब वह खुद जागरूक होगी। अपने अधिकारों को अच्छी तरह से पहचानेगी। लड़कियां एक बार जागरूक हुईं, तो किसी में भी हिम्मत नहीं कि उसके खिलाफ हिंसा करे।

 

? वसीमा खान