संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

श्रम कानून संशोधनों के निहितार्थ क्या है ?

? शैलेन्द्र चौहान

         केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने फैक्टरी कानून, एप्रेंटिस कानून और श्रम कानून (कुछ प्रतिष्ठानों को रिटर्न भरने और रजिस्टर रखने से छूट) कानून में संशोधन को मंजूरी दी। सरकार ने संसद में बताया कि वर्तमान श्रम कानूनों में संशोधन की जरूरत है। श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री विष्णु देव साय ने बताया कि बाल श्रम प्रतिषेध एवं विनियमन अधिनियम 1986, कारखाना अधिनियम 1948, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, प्रशिक्षु अधिनियम 1961 तथा श्रम विधि विवरणी देने तथा रजिस्टर रखने से कुछ संस्थानों को छूटरू अधिनियम 1988 में संशोधन किया है। विष्णुदेव साय ने कहा कि फैक्टरी कानून में प्रस्तावित संशोधन का ध्येय औद्योगिक क्षेत्र में मौजूदा परिदृश्य की जरूरतों के अनुरूप इसे ढालना था। क्या ये जरूरतें सिर्फ नियोक्ता के लिए ही हैं या श्रमिकों की भी हैं यह विचारणीय है। केंद्र सरकार ने श्रम सुधारों के तहत तीन श्रम कानूनों में संशोधन किया है। यह कहा जा रहा है कि इन संशोधनों के प्रभावी होने के बाद ओवरटाइम घंटे बढ़ाकर दोगुने किए जा सकेंगे तथा महिलाएं रात्रि पाली में काम कर सकेंगी। असल में यह मामला श्रम कार्यावधि आठ घंटे से बढ़ाकर बारह घंटे कर देने का है जो श्रमिकों के स्वास्थ्य और उनके पारिवारिक सामाजिक दायित्यों की अनदेखी का है। श्रमिक संगठनों ने विकास के नाम पर जल्दबाजी में किए गए इन नियोक्ता अनुकूल संशोधनों की कड़ी आलोचना की है।

                  औद्योगिक संबंध शब्द में नियोजक और कर्मचारियों के बीचय कर्मचारियों के बीच तथा नियोजकों के बीच परस्प र संवाद के कई पहलू जुड़े हुए हैं। ऐसे संबंधों में जब भी हितों को लेकर कोई विरोध होता है तो इससे जुड़े किसी एक पक्ष में असंतोष पैदा हो जाता है और इस प्रकार औद्योगिक विवाद अथवा संघर्ष हो जाता है, यह विवाद कई रूप ले लेता है जैसे कि विरोध, हड़ताल, धरना, तालाबंदी, छंटनी, कर्मचारियों की बर्खास्तजगी, आदि। औद्योगिक विवाद  वे विवाद हैं जो औद्योगिक संबंधों में कोई असहमति हो जाने के कारण उत्पन्न होते हैं। भारत में, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 सभी औद्योगिक विवादों की जांच पड़ताल एवं निपटान करने के लिए एक प्रमुख विधान है। इस अधिनियम में उन संभावनाओं की हड़ताल अथवा तालाबंदी की जा सकती है, उन्हें अवैध अथवा गैर-कानूनी घोषित किया जा सकता है, कर्मचारी की जबरदस्तीस कामबंदी, छंटनी, उसे सेवामुक्ती करना अथवा बर्खास्त, करने की दशाओं, उन परिस्थितियों जिनमें औद्योगिक इकाई को बंद किया जा सकता है और औद्योगिक कर्मचारियों तथा नियोजकों से जुड़े अन्य  कई मामलों का उल्लेख किया गया है। यह अधिनियम श्रम मंत्रालय द्वारा उसके औद्योगिक संबंध प्रभाग के माध्यम से प्रशासित किया जाता है। यह प्रभाग विवादों का निपटान करने के लिए संस्थोगत ढांचों में सुधार करने और औद्योगिक संबंधों से जुड़े श्रमिक कानूनों में संशोधन करने से संबंधित है। यह सुनिश्चित करने के प्रयास से कि देश को एक स्थायी, प्रतिष्ठित और कुशल कार्यबल प्राप्त हो, जिसका शोषण न किया जा सके और उत्पादन के उच्च स्तर स्थापपित करने में सक्षम हो, यह केन्द्रीय औद्योगिक संबंध मशीनरी (सीआईआरएम) के साथ अच्छेत तालमेल से कार्य करता है। सीआईआरएम जो कि श्रम मंत्रालय का एक संगठन कार्यालय है को मुख्यर श्रम आयुक्त (केन्द्रीय) सीएलसी (सी), संगठन के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी किसी भी स्थिति में नियोक्ता द्वारा सरकार की अनुमति अनिवार्य थी। अब नियोक्ता ये सभी प्रावधान बिना किसी अनुमति के  सकता है। यह किसके पक्ष में है? इससे न केवल श्रमिकों का शोषण बढ़ेगा अपितु वे अधिक संख्या में बेरोजगार भी होंगे। अधिनियम के अनुसार, औद्योगिक विवाद शब्दे का अर्थ है नियोजकों और नियोजकों के बीच, अथवा नियोजकों और कर्मचारियों के बीच, अथवा कर्मचारियों और कर्मचारियों के बीच किसी तरह का विवाद अथवा मतभेद जिसका संबंध नियोजन अथवा नियोजन भिन्नं मामले अथवा नियोजन की शर्तों अथवा किसी व्यक्ति के श्रम की दशाओं से है। अधिनियम के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं - औद्योगिक विवादों का न्यायसंगत, उचित और शांतिपूर्ण ढंग से निपटारा करने के लिए एक उपयुक्ता मशीनरी प्रदान करना। नियोजक और कर्मचारियों के बीच मित्रता एवं अच्छे  संबंध स्थापित करने और उन्हें  कायम रखने के उपायों को बढ़ावा देना। गैर-कानूनी हड़तालों और तालाबंदी को रोकना, कर्मचारियों को जबरदस्ती कामबंदी, छंटनी, गलत तरीके से बर्खास्तंगी और उत्पीड़न से राहत प्रदान करना, सामूहिक सौदाकारी को बढ़ावा देना। कर्मचारियों की दशा सुधारना, अनुचित श्रम प्रणालियों को रोकना। जो अब संभव नहीं होगा। इसके पीछे आखिर सरकार की क्या मंशा है ? निम्नतम मजदूरी अधिनियम में स्थानीय सतह के स्तर की  निम्नतम मजदूरी दिए जाने का मतलब जहां यह सीमा चार सौ रुपये थी वहां भी अब सौ ही रह जाएगी। रजिस्टर न रखने का निर्णय तो और भी श्रमिक विरोधी है यह इसलिए ताकि नियोक्ता के विरुद्ध कोई भी सबूत न मिल सके और श्रमिक के पक्ष में कोई न्याय न हो सके। एटक सचिवालय ने 30 जुलाई को केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर किये गये श्रम कानून संशोधनों के कुछ प्रावधानों का विरोध किया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि लघु एवं मध्यम उपक्रमों से संबंधित फैक्टरी कानून, एप्रेंटिस कानून और श्रम कानून में संशोधनों को मंजूर करते वक्त केन्द्रीय ट्रेड यूनियन संगठनों से संपर्क नहीं किया गया। गौरतलब है कि राजस्थान सरकार ने अपने मंत्रिमंडल में तीनों कानूनों में प्रस्तावित संशोधनों को मंजूरी दे दी है। कई ट्रेड यूनियनें संशोधनों का विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि श्रम एवं औद्योगिक कानूनों में उनसे परामर्श के बिना संशोधन किया गया है। आखिर सरकार को श्रम कानूनों के संशोधन की ऐसी हड़बड़ी क्या थी और इसके पीछे क्या मंतव्य है यह जानना आवश्यक है।

? शैलेन्द्र चौहान