संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

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भागवत दर्शन और भाजपा

           राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों कहा कि उनके लिए भाजपा खास नहीं है, हर पार्टी में संघ के स्वयं सेवक हैं। दूसरी बात जो उन्होंने कही थी वह थी कि राजनीति समाज को तोड़कर की जाती है इसलिए संघ राजनीति से दूर रहता है। मैं भागवत जी की हर बात को स्वीकार करता हूं, सिवाए इसके कि भाजपा संघ के लिए खास नहीं है। यह बात मेरे ही नहीं शायद किसी के भी गले नहीं उतरेगी। आजकल राजनीति खत्म हो गई है और चुनाव झूठ के आधार पर ही लड़े जा रहे हैं, इसीलिए भागवत जी का संदर्भ मैंने यहां ताकि यह साफ हो सके कि समाज को तोडने की राजनीति और झूठ का स्रोत वास्तव में कहां है।

? विवेकानंद


झूठ बोलने में हिटलर को भी मात करते हैं

आरएसएस से जुड़े नेता और अखबार

        झूठ बोलने में संघ परिवार से जुड़े व्यक्तियों को कोई हरा नहीं सकता है। संघ से जुड़े झूठ बोलने वालों की सूची में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम सबसे ऊपर है। न सिर्फ संघ से जुड़े लोग वरन् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े समाचार पत्रों को भी झूठ बोलने में भारी विशेषज्ञता हासिल है।

               अभी हाल में नरेन्द्र मोदी ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी की विदेश यात्राओं और विशेषकर उनके इलाज पर लगभग दो हजार करोड़ रूपये खर्च हुआ है। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि उन्होंने यह आंकड़ा एक समाचार पत्र में पढ़ा है।    

? एल.एस.हरदेनिया


संदर्भ : गोसीखुर्द बांध परियोजना घोटाला

सवाल, बीजेपी और नितिन गडकरी के रवैये पर भी हैं

   बीजेपी की कथनी और करनी में कितना फर्क है, यह सच कई बार देश के सामने आ चुका है। पार्टी और उसके नेता कहते कुछ हैं और करते कुछ। महाराष्ट्र की सिंचाई परियोजनाओं में भ्रष्टाचार को लेकर पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस को घेरने वाली बीजेपी,खुद राज्य में इस भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती रही है। पार्टी से जुड़े कई आला लीडर सिंचाई घोटाले में सीधे-सीधे मुब्तिला हैं। यह बात हाल ही में एक आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि दमानिया के सनसनीखेज खुलासे के बाद सामने आई। दमानिया ने अपने इस खुलासे में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर सिंचाई घोटाले को जानबूझकर दबाने के इल्जाम भी लगाए।

? जाहिद खान


2-जी पर नीतिगत दुविधा  

            2-जी पर मचा बवाल अब थम गया है। अब यह उस पर विचार करने का समय है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद क्या अब क्या आगे का रास्ता साफ हो गया है? सी.ए.जी की आधारहीन रिपोर्ट, कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले और मीडिया यह स्थिति पैदा करने के दोषी है। वे लोग, जो इस मामले में जमकर हंगामा कर रहे थे, क्या वे इस नवोदित क्षेत्र की जटिलताओं को पूरी तरह समझते है? हम एकदम नये एक ऐसे क्षेत्र से गुजर रहे थे, जिसमें सीखने के लिये कोई पूर्व उदाहरण हमारे पास नही थे। इसमें दूसरे देश भी अपनी ही गलतियों से सीख रहे थे।  

? कपिल सिब्बल

(लेखक केन्द्रीय मानव संसाधन विकास तथा संचार एवं सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री है।)


सशक्तीकरण कार्यक्रम और सरकारी मशीनरी का कार्य मूल्यांकन

         कालजयी व्यंग्य उपन्यास 'राग दरबारी' में श्रीलाल शुक्ल लिखते हैं कि ' हमारी शिक्षा व्यवस्था तो रास्ते में पड़ी हुई कुतिया की तरह है जिसे हर राह चलता हुआ आदमी ठोकर मारता जाता है। असल में यह हाल केवल शिक्षा नीति के प्रति ही नहीं है अपितु लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमें मिले अधिकारों का उपयोग करते हुए गैर राजनीतिक लोग भी किसी भी सरकार के सरकारी कामों और सरकारी मशीनरी की चाहे जब चाहे जैसी आलोचना करते ही रहते हैं। यह आलोचना इतनी अधिक विरल,मात्रा में अधिक और बेतुकी भी होने लगी है कि सरकारी मशीनरी ने भी मोटी बेशर्मी ओढ ली है जिससे उस पर इस आलोचना का कोई असर नहीं पड़ता।

 ?   वीरेन्द्र जैन


मप्र में भाजपा की वापसी पर प्रश्नचिन्ह

                  ध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी, खासकर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तीसरी पारी खेलने के लिए बेताब हैं और 'मिशन-2013'को कामयाब बनाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। सत्ता और संगठन मिल-जुल कर इस कोशिश को अंजाम देने में लगे हैं। उनकी यह कोशिश कितनी परवान चढ़ती हैं, यह तो भविष्य बताएगा, किंतु वर्तमान में जो कुछ भी चल रहा है, उससे सत्ता-संगठन की कोशिशों पर सवालिया निशान लग गए हैं। ऊपरी तौर पर दोनों एक-दूसरे को पूरक बताते नहीं अघाते हैं, पर अंदरूनी खिचड़ी कुछ और ही पक रही है। सच्चाई यह है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की कब्र खोदने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते हैं।

? महेश बाग़ी


कार्पोरेट सेक्टर की बैसाखियों के सहारे वंचित कल्याण

      सुना है 2014 के चुनावों की आहट के मददेनजर कांग्रेस के अगुआईवाली संप्रग गठबन्धन की सरकार ने दलित-आदिवासियों के कल्याण के लिए एक नयी योजना बनायी है, जिसके लिए उसने कार्पोरेट सेक्टर के कर्णधारों से मीटिंगों के कई दौर चलाए हैं। योजना का मकसद जहां वंचित तबकों में अपनी बेहतर छवि को प्रस्तुत करना है, वहीं एक दूसरा मकसद यहभी है कि इस मसले पर बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को बढ़त न लेने दी जाए। चुनावों के मददेनजर राजनीतिक पार्टियां इस मांग को बुलन्द करें और फिर सरकार कुछ करती दिखे, इन सम्भावनाओं से बचने के लिए सरकार पहल अपने हाथ में रखना चाहती है।

? सुभाष गाताड़े


अब खामोशी नहीं रहेगी

प्रशासन की निष्क्रियता पर भारी पड़ती छात्राएं

      राजस्थान के टोंक जिले में स्थित वनस्थली विद्यापीठ देशभर में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय माना जाता है। हाल में यहाँ के दो छात्राओं केसाथ सामूहिक बलात्कार की घटना नें परिसर के छात्राओं को उद्वेलित कर दिया है। बताया गया है कि इसमें एक छात्रा कि घटना के बाद मौत हो गयी। विश्वविद्यालय प्रशासन घटना को दबाने में लगा है जबकि राज्य महिला आयोग तथा राष्ट्रीय महिला आयोग ने प्रथमदृश्य में घटना को सही माना है। वास्तविकता का खुलासा बाद में होगा लेकिन यह तो तय है कि कोई न कोई घटना घटी है जिसने हजारों छात्राओं को संघर्ष के लिए सड़क पर उतारा है।

? अंजलि सिन्हा


जयराम रमेश ने कतई गलत नहीं कहा

        जिस तरह से घर में मंदिर आवश्यक है, ठीक उसी तरह से घर में शौचालय का होना भी अतिआवश्यक है। हम अपनी तमाम उपलब्धियों पर भले ही गर्व कर लें, सीना ठोंक लें, पर जब तक देश की आधी आबादी मुक्ताकाशी शौच के लिए विवश है,तब तक हमारी सारी उपलब्धियाँ किसी काम की नहीं। घर की महिलाएं शौच के लिए बाहर जाएं, इससे बड़ा कलंक तो हो ही नहीं सकता? जयराम रमेश ने कतई गलत नहीं कहा। शौचालय में हमारे ही शरीर की गंदगी जाती है, इसलिए वह किसी मंदिर से कम नहीं। आखिर मंदिर में भी हम अपनी बुराई दूर करने की कामना ही तो करते हैं। शौचालय तो हमारे शरीर की गंदगी ग्रहण करता है।

? डॉ. महेश परिमल


मध्यप्रदेश में कांग्रेस के जनाधार में हुआ इजाफा?

       सत्ता के खिलाफ मध्यप्रदेश में कांग्रेस के महाघेराव से एक बात तो उभरकर सामने आ गई है कि जिस कांग्रेस पार्टी की छवि धूमिल करने के लिए सत्तारूढ़ राजनैतिक पार्टी द्वारा जो भी हथकंडे शुरू किए गये उन हथकंडों, साजिशों और आरोपों का उसे मुंहतोड़ जवाब दे दिया गया है। इस महाघेराव से राजनैतिक विश्लेषणकर्ताओं के सामने यह मुद्दा साफ हो गया है जिसमें माना जा रहा था प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। मध्यप्रदेश कांग्रेस के बारे में यह एक आम राय बनाने की कोशिश कि,पार्टी का जनाधार कम होता जा रहा है,झूठा और बेबुनियाद सिध्द होता चला जा रहा है।

    

? राजेन्द्र जोशी


आर्थिक सुधारों पर हल्ला गैरवाजिब

        र्थिक सुधारों को लेकर सरकार जिस गंभभता और प्रतिबध्दता से आगे बढ़ रही है वो काबिले तारीफ है। सब्सिडी खर्च घटाना,डीजल के दाम में इजाफा,रिटेल और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी जैसे फैसले ऐसे वक्त पर लिए गए जब हर कहीं से विरोध के स्वर सुनाई दे रहे थे। इससे पहले तक सरकार ने जब भी इस दिशा में कदम बढ़ाने का प्रयास किया गठबंधन की मजबूरियों ने उसकी राह रोकी। सबसे यादा ममता बनर्जी के विरोध का उसे सामना करना पड़ा, मगर अब वो इस सब से आजाद है। हालांकि बाहरी तौर पर यानी विपक्ष का विरोध अब भी बरकरार है। वैसे देखा जाए तो विरोध करना विपक्ष की आदत बन गई है।

? नीरज नैयर


राष्ट्र-विकास में कृषि की घटती हिस्सेदारी

       देश के सकल विकास में कृषि की हिस्सेदारी साल दर साल घटती जा रही है। सरकार की अपनी ही रिपोर्ट बताती है कि यह छह वर्षों में 19 प्रतिशत से घटकर 14 प्रतिशत पर आ गई है। यह इस तथ्य के बावजूद है कि देश में अनाज का उत्पादन काफी बढ़ा है और सरकारी खरीद के कारण हमारे गोदाम न सिर्फ जरुरत से ज्यादा भरे हैं बल्कि तमाम अनाज बाहर खुले में भी रखना पड़ा है। कृषि की घटती हिस्सेदारी का एक दूसरा अर्थ यह भी है कि किसान खेती छोड़कर अन्य कार्यों में लग रहे हैं तथा कृषि योग्य जमीन घट रही व लागत बढ़ रही है।

? सुनील अमर


थोक व्यापारी भी रिटेल में

एफडीआई के पक्ष में?

        गिरिधर काबरा तुअर दाल का थोक कारोबार करते हैं। इनका कहना है कि बाजार में दालों के फुटकर और थोक दामों में भारी अंतर चलता है। खुदरा व्यापारी एक किलोग्राम दाल पर बीस रूपये तक का मार्जिन उपभोक्ता से वसूलते हैं।अगर दालों के दाम में गिरावट आती है तो थोक के दाम तो तुरन्त कम करने पड़ते हैं लेकिन खुदरा दाम काम नहीं होतें हैं इस तरह खुदरा व्यापारी आम आदमी की जेब काटते रहते हैं बदनाम होती है सरकार! काबरा का मानना है कि फुटकर यानि खुदरा बाजार में एफडीआई के आने से थोक और खुदरे के दामों में भारी अंतर की बात खत्म होगी और दाम घटने का तत्काल लाभ उपभोक्ता को मिलना तय है क्योंकि संगठित और बड़े आकार के बाजार खुली लूट नहीं कर सकते हैं।

? डॉ. सुनील शर्मा


महासंकट का रूप लेता डिप्रैशन

       मानसिक समस्याओं की वैश्विक बढ़ोतरी मैं डिप्रैशन सबसे अग्रणी है। पूंजीवादी समाजों के आधुनिकता और प्रगति  के भीमकाय दावों की पोल खोलती यह मानसिक समस्या इतनी तेजी से हमारे चारों ओर बढती जा रही है कि इसके सही स्तर का पता लगा पाना लगभग नामुमकिन सा है। हमारे जैसे विकासशील देशों मैं जहाँ की राजनैतिक व प्रशासनिक व्यवस्थाएं मानसिक समस्याओं की रोकथाम को ज्यादा तरजीह नहीं देतीं, जहाँ मानसिक समस्याओं के प्रति कई पूर्वग्रह हों व इन पर जागरूकता मैं कमी हो वहां  हालात लगभग बेकाबू हो जाते हैं।

? राहुल शर्मा


  15 अक्टूबर-2012

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