संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

अब खामोशी नहीं रहेगी

प्रशासन की निष्क्रियता पर भारी पड़ती छात्राएं

?  अंजलि सिन्हा

                राजस्थान के टोंक जिले में स्थित वनस्थली विद्यापीठ देशभर में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय माना जाता है। हाल में यहाँ के दो छात्राओं केसाथ सामूहिक बलात्कार की घटना नें परिसर के छात्राओं को उद्वेलित कर दिया है। बताया गया है कि इसमें एक छात्रा कि घटना के बाद मौत हो गयी। विश्वविद्यालय प्रशासन घटना को दबाने में लगा है जबकि राज्य महिला आयोग तथा राष्ट्रीय महिला आयोग ने प्रथमदृश्य में घटना को सही माना है। वास्तविकता का खुलासा बाद में होगा लेकिन यह तो तय है कि कोई न कोई घटना घटी है जिसने हजारों छात्राओं को संघर्ष के लिए सड़क पर उतारा है। यह भी सर्वविदित है कि ऐसी कोई भी घटना घटने पर आम तौर पर संस्थानों का प्रशासन घटना से इन्कार करने या घटना को हल्का करने की कोशिश करते है बजाय इसके कि तहकीकात की जाए और दोषियों पर पर कार्रवाई को सुनिश्चित करे।

               पिछले दिनों ऐसा ही उदाहरण सोनीपत के बीपीएस विश्वविद्यालय की छात्राओं ने पेश किया था। सोनीपत की बीपीएस विश्वविद्यालय की छात्राओं ने अपने एक सहपाठी के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के विरोध में तथा दोषियों को सज़ा दिलाने की मांग को लेकर जबरदस्त संघर्ष किया। वे साठ घण्टे तक विश्वविद्यालय गेट पर धरने पर बैठी रहीं और कमिशनर तथा राजनीतिक दलों के आश्वासन पर ही उन्होंने अपना यह धरना खत्म किया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने धरना समाप्त करने तथा आन्दोलन को तोड़ने का हर सम्भव प्रयास किया, मगर छात्राएं डटी रहीं।

               सवाल उठता है कि चाहे वनस्थली की छात्राएं हों या सोनीपत की छात्राएं हो, उनका गुस्सा इस कदर कैसे फूट पड़ा?दोनों ही मामलों में यह समानता दिखती है कि घटना उजागर होने के बाद मामले को रफा दफा करने की प्रशासन द्वारा कोशिश की गयी उसके चलते छात्राएं क्षुब्ध हुईं। सोनीपत के मामले में पीड़िता को दिनदहाडे विश्वविद्यालय के गेट से जबरन उठा कर होस्टल मेस संचालक तथा उसके दो साथी पास के खेत में ले गए,जहां उन्होंने उसके साथ यौन अत्याचार को अंजाम दिया। अत्याचार की घटना के बाद छात्राओं ने इस मामले की शिकायत करनी चाही तो वार्डेन ने जहां लड़की की छवि खराब हो जाने की बात बता कर मामले को रफा दफा करने की सलाह दी कुलपति महोदय को विश्वविद्यालय की छवि खराब हो जाने की चिन्ता थी।

                वनस्थली मामले में तो चूंकि लड़कियों को मोबाइल रखने की मनाही है और समूचे परिसर में मोबाइल जामर लगे हुए है, इस वजह से लड़कियों को बाहर सूचना भेजने में भी काफी दिक्कत हुई। और जब लड़कियों का गुस्सा भड़का तब विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस आवासीय विश्वविद्यालय के दरवाजें बन्द कर लड़कियों का दमन करना चाहा। यह अलग बात है कि विश्वविद्यालय की दस हजार से अधिक छात्राएं डरी नहीं और उन्होंने उग्र होकर प्रदर्शन किया, तभी प्रशासन के हाथ पांव फूले।

               इस मामले में निश्चित ही ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सभी अपराधी के वकील बने हों और पीड़िताओं का मुंह बन्द करने पर आमादा हो। लाजिम था कि प्रशासन द्वारा अत्याचारियों को बचाने की इन शर्मनाक कोशिशों से क्षुब्ध छात्राओं ने आन्दोलन का रास्ता चुना तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। अगर अपराधियों पर कार्रवाई को लेकर लड़कियां सड़क पर नहीं उतरती तब तो यह मामला दबा ही रहता। अच्छी बात यह है कि हजारों लड़कियां अत्याचारियों पर कार्रवाई की मांग के साथ डटी रही तभी कुछ हरकत हो सकी।

               जहां वनस्थली की छात्राओं ने अपने संघर्ष से मिसाल कायम की, वहीं यहभी देखने में आ रहा है कि देश के अलग अलग हिस्सों में भी लड़कियां, महिलाएं या जनतांत्रिक संगठन यौन हिंसा जैसी घटनाओं के खिलाफ संड़कों पर उतरते दिख रहे हैं। पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में भी सैकड़ों महिलाओं ने 'सिटिजन्स कलेक्टिव' नामक साझे मोर्चे के बैनरतले एक मार्च का आयोजन किया था,जिसमें विभिन्न महिला संगठनों के सदस्यों के अलावा कई सरोकार रखनेवाले लोग भी शामिल थे। उन्होंने तय किया है कि आनेवाले दिनों में वह दिल्ली की विभिन्न बस्तियों, इलाकों में जाकर इस मामले में अलख जगाएंगी और फिर एक बड़ी रैली का आयोजन किया जाएगा।

                 यह बात भी देखनेलायक है कि न सिर्फ बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ बल्कि छेडछाड जैसी घटना के खिलाफ भी लडकियां मुखर प्रतिरोध कर रही हैं।3यह प्रतिरोध शासन -प्रशासन को मजबूर करेगा हरकत में आने के लिए वरना उनका वश चले तो वे हाथ में हाथ रखकर सोये ही रहेंगे।

               ध्यान देनेवाली बात है कि लडकियाँ और महिलाओं का घर से बाहर पढने-लिखने तथा काम करने के लिए निकलने की तादाद बढी है लेकिन समाज में पुरुषों की सोच ओर मानसिकता में बदलाव नही आया है। घटनाये पहले भी घटती थी लेकिन उनकी संख्या आज से बहुत कम थी। आज के समय में औरत के खिलाफ इस प्रकार के यौन हिंसा की घटनाओं को अतिगम्भीरता से लेते हुए सार्वजनिक दायरे को सुरक्षित बनाने का काम प्रथम एजेण्डा पर लेने की जरूरत है। ऐसा सिर्फ इसलिए नही कि उन सभी पीडितों को न्याय और दोषियों को सजा मिले बल्कि जिनके साथ अबतक कुछ नहीं हुआ उन्हे भी सुरक्षा का भरोसा चाहिए। ऐसी हिंसक घटनाएं सभी महिलाओं को भयभीत करती है तथा असुरक्षित वातावरण का निर्माण करती है,इस प्रकार जो प्रत्यक्ष पीडित नही है वह भी अप्रत्यक्ष पीडित हो जाता है।

                खासतौर पर जरूरत है शिक्षण संस्थानों के प्रशासन को संवेदनशीलता का पाठ ठीक से सीखने की ताकि वे किसी घटना कें सामने आने पर अपनी तरफ से आगे बढकर हर सम्भव प्रयास करे दोषी को पकडने और पुलिस पर दबाव बनाने का कि शीघ्र कार्रवाई हो। दूसरी बात पहले से ही बचाव के  उपाय पुख्ता हो तथा संस्थान के अन्दर का वातावरण सुरक्षित बनाने के लिए कई स्तरों पर जागरूकता तथा अन्य उपायों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हर संस्थान के पास इनसे बचाव की अपनी नीति होनी चाहिए। अब तो सभी कार्यस्थलों को, जिसमें शिक्षण संस्थाए भी है उनको सुरक्षित करने सम्बन्धी बिल भी संसद में पास हो चुका है।हांलाकि इस बिल के पहले भी सुप्रीम कोर्ट का गाइडलाइन मौजूद था। यदि कुछ नियम कानून नही होता तो भी शिक्षण संस्थानों को सुरक्षित बनाना प्रशासन तथा मॅनेजमेण्ट की जिम्मेदारी थी। हमेशा माँग तो उन दोषियों के साथ सजा की होती है जो घटना को अंजाम देते है लेकिन साथ-साथ उन्हे भी सजा मिलनी चाहिएं जिनकी जिम्मेदारी थी सुरक्षित वातावरण देने की।


? अंजलि सिन्हा