संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

कार्पोरेट सेक्टर की बैसाखियों के सहारे वंचित कल्याण

?  सुभाष गाताड़े

                  सुना है 2014 के चुनावों की आहट के मददेनजर कांग्रेस के अगुआईवाली संप्रग गठबन्धन की सरकार ने दलित-आदिवासियों के कल्याण के लिए एक नयी योजना बनायी है, जिसके लिए उसने कार्पोरेट सेक्टर के कर्णधारों से मीटिंगों के कई दौर चलाए हैं। योजना का मकसद जहां वंचित तबकों में अपनी बेहतर छवि को प्रस्तुत करना है, वहीं एक दूसरा मकसद यहभी है कि इस मसले पर बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को बढ़त न लेने दी जाए। चुनावों के मददेनजर राजनीतिक पार्टियां इस मांग को बुलन्द करें और फिर सरकार कुछ करती दिखे, इन सम्भावनाओं से बचने के लिए सरकार पहल अपने हाथ में रखना चाहती है।

               मीडिया के एक हिस्से में छपे समाचारों के मुताबिक लक्ष्य यह रखा गया है कि अगले पांच सालों में पांच राज्यों - यू पी, बिहार, पंजाब, उड़िसा और छत्तीसगढ़ - जहां दलित आदिवासियों की कुल आबादी का 47 फीसदी रहता है, वहां के 27 जिलों में 10 लाख युवकों को टेनिंग दी जाए। कुशलता प्रशिक्षण के अलावा इन इलाकों में प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग को भी कार्पोरेटस बढ़ावा दे, सकारात्मक विकास से जुड़े कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए एक डाटाबेस तैयार हो, जिसे हर तीन माह पर सरकार को दिया जाए, जैसे कदम सरकार चाहती है।

                   यूं तो हुकूमत सम्भालनेवाले लोग भले यह सोचे कि कार्पोरेट सेक्टर की मदद से वह वंचितों के कल्याण के चन्द कदम बढ़ा सकती हैं, मगर वह इस बात को भूल रहे हैं कि इस योजना में सारत: नया कुछ भी नहीं है। लोगों को याद होगा कि यूपीए के प्रथम संस्करण में भी इस दिशा में कई मीटिंगे हुई थीं, उन दिनों समाज कल्याण मंत्रालय का महकमा सम्भाल रहीं सुश्री मीरा कुमार ने -जो इन दिनों लोकसभा की स्पीकर हैं -इस मामले में कार्पोरेट दिग्गजों से सम्पर्क किया था, उनके साथ मीटिंगों के कई दौर चले थे, उन्होंने भी सरकार के सुर में सुर मिलाते हुए वंचितों के कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबध्दता दोहरायी थी। मगर जाननेवाले बता सकते हैं कि नतीजा कुल मिला कर सिफर ही रहा था।

                 जाहिर है एक आकर्षक योजना बनाने की आपाधापी में न बीते अनुभव के सबकों पर गौर किया गया है और न इस कड़वी हकीकत पर धयान दिया जा रहा है कि भारत का कार्पोरेट सेक्टर बेहद असमावेशी है, बेहद विशिष्ट है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि उच्चनीचअनुक्रम पर टिकी भारतीय समाजरचना, जिसे न केवल दैवीय स्वीकृति प्राप्त है बल्कि सामाजिक वैधता भी हासिल है,उसका प्रतिबिम्बन हमें कार्पोरेट क्षेत्रा पर भी दिखता है। यह अकारण नहीं कि उसने दलितों आदिवासियों के लिए सकारात्मक कार्रवाई अर्थात एफर्मेटिव एक्शन जैसे प्रशसों से हमेशा अपना एतराज दर्ज कराया है,वह अधिक से अधिक कार्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के नाम पर कुछ प्रतीकात्मक कार्रवाई तक अपने आप को सीमित रखना चाहता है।

                    हम सभी जानते हैं कि आरक्षण की किसी भी योजना का या अमेरिका में कायम एफर्मेटिव एक्शन के किसी भी कार्यक्रम का बुनियादी तर्क क्या होता है । इसके मुताबिक जाति/जेण्डर/नस्ल जैसी asaasascriptive categories (जन्मगत श्रेणियों) के आधार पर बंटे समाज में अगर सभ्यतात्मक (civilizational)कारणों से पीछे छुटे समुदायों को समान अवसर हासिल करने की स्थिति में लाना है तो उनके लिये positive discrimination (सकारात्मक विभेद) की नीतियां लागू करनी ही होंगी। यह लोकतंत्र का तकाजा है कि हुकूमत में बैठे लोग ऐसे उत्पीड़ित तबकों के लिये खास योजना बनायें।

               दूसरी तरफ वंचितों के लिये विशेष अवसर उपलब्ध कराने को लेकर अक्सर यही छवि बनायी जाती है कि उससे अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा, गैरकाबिल लोग पदों पर बैठ जाएंगे आदि। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल विपरीतं है। आरक्षण से होने वाले आर्थिक फायदों के बारे में हिन्दोस्तां में हुए किसी अध्ययन का अन्दाजा नहीं है,लेकिन अगर हम अमेरिका के अनुभव पर नज़र डालें तो एक सकारात्मक चित्र दिखता है। मालूम हो कि नागरिक अधिकार आन्दोलन के व्यापक दबाव में वहां साठ के दशक की शुरूआत में एफर्मेटिव एक्शन कार्यक्रम लागू कर अश्वेतों और अन्य अल्पसंख्यकों को शिक्षा तथा रोजगार के स्थानों पर बढ़ावा देने की नीति बनी है, जिसकी हिमायत वहां की बड़ी बड़ी कम्पनियां तक करती है। अमेरिका के इतिहास में पिछले दिनों एक ऐतिहासिक मुकदमे की काफी चर्चा हुई, जिसके तहत शिक्षा संस्थानों में एफर्मेटिव एक्शन कार्यक्रम के औचित्य पर बहस चली। गौरतलब है कि फार्चुन 500 में शामिल अमेरिका की कई अग्रणी कम्पनियों ' माइक्रोसाफ्ट, इण्टेल, केलोग, कोडाक आदि ने - एफर्मेटिव एक्शन कार्यक्रम की हिमायत में अर्जी दी। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला भी सुनाया, विश्वविद्यालय छात्रों के चयन में नस्ल को एक कारक समझ सकते हैं ताकि 'उससे शैक्षिक लाभों में बढ़ोत्तारी होती है।'

                 भारत के कार्पोरेट सेक्टर की विशिष्टता को उजागर करते कई सारे अधययन हाल में सामने आए हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीता जब कनाडा के युनिवर्सिटी आफ नार्थ कोलम्बिया के विद्वतजनों - डी अजित, हान दोनकर एवं रवि सक्सेना - की टीम द्वारा भारत के कार्पोरेट बोर्डों की समाजशास्त्रीय विवेचना प्रकाशित हुई थी। अपने अध्ययन में उन्होंने भारत की अग्रणी एक हजार कम्पनियों के कार्पोरेट बोर्ड का अध्ययन किया जिनका देश के अग्रणी स्टॉक एक्सचेंज में दर्ज सभी कम्पनियों के मार्केट कैपिटलायजेशन अर्थात बाजार पूंजीकरण में हिस्सा 4/5था। बोर्ड की सामाजिक संरचना जानने के लिए उन्होंने ब्लाउ सूचकांक का प्रयोग किया, जिसके मुताबिक कार्पोरेट बोर्ड में विविधाता बिल्कुल नहीं है और भारत के ये कार्पोरेट बोर्ड आज भी ''ओल्ड बायज् क्लब''बने हुए हैं जो जातिगत जुड़ाव पर आधारित है न कि प्रतिभा या अनुभव जैसे पैमानों पर।

                 जिन एक हजार कम्पनियों का उन्होंने अध्ययन किया, उसमें निदेशक बोर्ड की औसत सदस्य संख्या नौ थी, जिनमें से 88 फीसदी इनसाइडर थे अर्थात कम्पनी से सम्बधित ही लोग थे और सिर्फ 12फीसदी स्वतंत्र निदेशक थे। जातिगत आधार पर देखें तो इनमें से 93फीसदी उच्च जातियों से जुडे थे तो अन्य पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जाति-जनजाति से 3.8 फीसदी और 3.5 फीसदी लोग थे। इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली जैसे प्रतिष्ठित जर्नल (11 अगस्त 2012) में इस अध्ययन का सारांश प्रकाशित हुआ है, जिसमें लेखकत्रायी सवाल उठाती है ' इस बात पर सहसा यकीन नहीं किया जा सकता कि अनुसूचित तबके का कम प्रतिनिधित्व प्रतिभा की कमी के चलते है। दरअसल यहां हम जाति को नेटवर्किंग के अहम कारक के तौर पर देख सकते हैं। कार्पोरेट भारत की छोटी दुनिया में जातिगत रिश्तों के तानेबाने में ही अन्तक्रिया चलती रहती है।'

               स्पष्ट है कि कार्पोरेट बोर्ड समाज में मौजूद विविधता की नुमाइन्दगी नहीं करते दिखते। यह सवाल उठना लाजिमी है कि निजी कार्पोरेट क्षेत्र में कार्यरत लोगों में क्या इसी किस्म का मंज़र सामने आता है या तस्वीर बदली हुई दिखती है। कुछ समय पहले कार्पोरेट क्षेत्रा में पहली दफा सम्पन्न मानवीय संसाधानों की जातीय गणना के बाद यह चित्र अधिक स्पष्ट हुआ है।

               भारतीय उद्योगपतियों के सबसे बड़े संगठन कहे जानेवाले 'कान्फेडरेशन आफ इण्डियन इण्डस्ट्रीज' (सी आई आई)ने दरअसल पिछले साल इस सर्वेक्षण को अंजाम दिया था। मालूम हो कि सीआईआई के सदस्य उद्योगों में लगभग 35 लाख लोग कार्यरत हैं। प्रस्तुत सर्वेक्षण के तहत 22 राज्यों एवम केन्द्र शासित प्रदेशों में फैले उसके सदस्यों का एक सैम्पल सर्वे किया गया, जिसके तहत 8,250 कर्मचारियों/कामगारों से जानकारी हासिल की गयी। सर्वेक्षण में कुछ विचलित करनेवाले तथ्य सामने आए। मसलन् भारत के सबसे औद्योगिकृत कहे जानेवाले राज्यों में निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति एवम जनजातियों का अनुपात, राज्य की आबादी में उनके अनुपात को कहीं से भी प्रतिबिम्बित नहीं करता। उदाहरण के लिए वर्ष 2008-2009के वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण में औद्योगिकीकरण एवं रोजगार के मामले में महाराष्ट्र दूसरे नम्बर पर है, जबकि वहां इन तबकों का रोजगार में अनुपात महज 5 फीसदी है, जो राज्य में उनकी आबादी के प्रतिशत 19.1से काफी कम है। अगर हम महाराष्ट्र के सीआईआई से जुड़े उद्योगों में कार्यरत आबादी को देखें तो अकेले महाराष्ट्र में लगभग 20.72लाख लोग कार्यरत हैं। महाराष्ट्र जैसी स्थिति गुजरात की है जो वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के मुताबिक चौथे नम्बर पर है, मगर वहां निजी क्षेत्रा में अनुसूचित जाति जनजातियों का प्रतिशत महज 9 फीसदी है जो आबादी में उनके प्रतिशत 21.9 से काफी कम है। गौरतलब है कि अकेले तमिलनाडु में इन वंचित तबकों का निजी क्षेत्रा में अनुपात आबादी में उनके हिस्से के लगभग समानुपातिक है। जैसे इनकी आबादी का प्रतिशत 20 फीसदी है, जबकि उद्योगों में उनकी उपस्थिति का प्रतिशत 17.9 फीसदी है। दक्षिण के अन्य राज्यों में भी इसी किस्म की स्थिति है।

                 आबादी में अनुपात एवम रोजगार में उनकी संख्या का बेमेल रिश्ता हम कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में भी देख सकते हैं। एक रोचक तथ्य यह भी सामने आता है कि पूर्वी क्षेत्रा के सबसे कम औद्योगिकीकृत राज्यों में, जहां संगठित क्षेत्र में रोजगार की संख्या तुलनात्मक रूप में कम है, वहां अनुसूचित जाति एवम जनजाति के कर्मचारियों की संख्या सर्वाधिक है। मसलन बिहार को देखें जो उद्योग सर्वेक्षण में 17 वें नम्बर पर है जबकि निजी क्षेत्र में उनकी संख्या चौथाई तक है और आबादी में उनका प्रतिशत महज 16.6 फीसदी है।

                 पहला प्रश्न उठता है कि आखिर ऐसे क्या कारक हैं कि सबसे औद्योगिकीकृत राज्यों -महाराष्ट्र, गुजरात यह रिश्ता इतना बेमेल क्यों है ? आखिर क्या वजह है कि सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों की पृष्ठभूमिवाले तमिलनाडु, केरल उसी किस्म की पृष्ठभूमिवाले महाराष्ट्र से इतने अलग क्यों दिखते हैं।

                 दूसरा बड़ा प्रश्न है कि जिन आग्रहों के चलते निजी क्षेत्र के कर्णधार अपने यहां उत्पीड़ितों-वंचितों के लिए एफर्मेटिव एक्शन(सकारात्मक कार्रवाई) की नीतियां चलाने के प्रति इतना अनिच्छुक दिखते हैं, उन्हें कहां तक उचित माना जा सकता है। क्या यह कहा जाना उचित है कि भद्र जातियों की कार्पोरेट बोर्ड में बहुतायत एवं उनमें मौजूद पूर्वाग्रहों के चलते ही वंचित तबकों को उनमें स्थान नहीं मिल पा रहा है। ऐसे कहे जाने के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है, अमेरिका के प्रिन्स्टन विश्वविद्यालय के साथ मिल कर भारत की 'इण्डियन इन्स्टिटयूट आफ दलित स्टडीज्'के तत्वावधान में सम्पन्न एक अलग किस्म का अध्ययन इसी बात को रेखांकित करता है। (rediff.com, 4 दिसम्बर 2007) अमेरिका में अश्वेतों एवम अन्य अल्पसंख्यक तबकों के साथ होनेवाले भेदभाव को नापने के लिए बनाई गई टेकनीक का इस्तेमाल करते हुए प्रस्तुत अध्ययन में लगभग पांच हजार आवेदनपत्र भारत की अग्रणी कम्पनियों को 548 विभिन्न पदों के लिए भेजे गए। योग्यताएं एक होने के बावजूद इसके तहत कुछ आवेदनपत्रों के आवेदकों के नाम से यह स्पष्ट हो रहा था कि वह दलित समुदायों से सम्बधित हैं।

               गौरतलब था कि कम्पनी की तरफ से ज्यादातर उन्हीं प्रत्याशियों के मामलों में वापस सम्पर्क किया गया जिनके नाम उच्च वर्णीय तबके से आते प्रतीत होते थे। दलित सदृश्य नामों वाले 'प्रत्याशी' नौकरी की पहली ही सीढ़ी पर छांट दिए गए थे। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित/वंचित रहे तबकों को अपने यहां तैनात करने हेतु आरक्षण जैसी किसी प्रणाली को लागू करने के केन्द्र सरकार के प्रस्ताव को खारिज करते हुए 'मेरिट' की वरीयता की बात करनेवाले कॉर्पोरेट क्षेत्र को बेपर्द करनेवाले प्रस्तुत अधययन के निष्कर्षों पर कभी चर्चा नहीं हुई। बात आयी गयी हो गयी।

? सुभाष गाताड़े