संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

मप्र में भाजपा की वापसी पर प्रश्नचिन्ह

? महेश बाग़ी

                  ध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी, खासकर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तीसरी पारी खेलने के लिए बेताब हैं और 'मिशन-2013'को कामयाब बनाने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। सत्ता और संगठन मिल-जुल कर इस कोशिश को अंजाम देने में लगे हैं। उनकी यह कोशिश कितनी परवान चढ़ती हैं, यह तो भविष्य बताएगा, किंतु वर्तमान में जो कुछ भी चल रहा है, उससे सत्ता-संगठन की कोशिशों पर सवालिया निशान लग गए हैं। ऊपरी तौर पर दोनों एक-दूसरे को पूरक बताते नहीं अघाते हैं, पर अंदरूनी खिचड़ी कुछ और ही पक रही है। सच्चाई यह है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की कब्र खोदने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते हैं। यद्यपि मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष एक-दूसरे का स्वागत कर अपने कार्यकर्ताओं में यह संदेश देने की कोशिश कर चुके हैं, मगर अंदरूनी तौर पर दोनों प्रतिस्पर्धात्मक भूमिका में हैं।

               भाजपाई हलकों में यह चर्चा आम है कि शिवराज सिंह यह नहीं चाहते कि प्रदेश अध्यक्ष पद पर प्रभात झा की दोबारा ताजपोशी हो। इसका बड़ा कारण यह है कि यदि अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा फिर सत्ता पर काबिज होती है तो पार्टी में यह संदेश भी जाएगी कि संगठन ने अपनी भूमिका का निर्वाह ईमानदारी से किया है। इससे भविष्य में शिवराज का मुख्यमंत्री पद खतरे में पड़ सकता है। संभवत: यही कारण है कि पिछले दिनों विभिन्न जिलों में संपन्न भाजपा की वाहन रैलियों के क्रम में जब ग्वालियर का नंबर आया तो वह फ्लॉप शो साबित हुई। यदि यह रैली जबरदस्त रूप से सफल हो जाती तो प्रभात झा की पार्टी पर मजबूत पकड़ दिखाई देती। गौरतलब है कि ग्वालियर अब 'बिहारी बाबू' का गृहनगर है। भाजपा की तमाम वाहन रैलियों के फ्लॉप होने के पीछे यह तथ्य सामने आया है कि सत्ता की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं किया गया। अब यह बात भी सामने आ रही है कि कांग्रेस के आदिवासी कार्ड की तर्ज पर शिवराज सिंह भी यही दांव अपनाना चाहते हैं। माना जा रहा है कि वे फग्गन सिंह कुलस्ते को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने की जुगाड़ में हैं। कुलस्ते का आदिवासी क्षेत्रों में प्रभाव है और वे अध्यक्ष बनाए भी जा सकते हैं, लेकिन उनका स्याह पक्ष यह है कि सांसद रिश्वत कांड में पूरा देश उन्हें नोटों के बंडल लेते देख चुका है। ऐसे दागदार नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का जोखिम भाजपा उठा पाएगी, इसकी संभावना कम ही नजर आती है।

               शिवराज सिंह की एक अंदरूनी मंशा उन नेताओं के पर कतरने की भी है, जो भविष्य में उनकी कुर्सी के लिए खतरा बन सकते हैं। इसलिए वे ऐसी गोटियां बिछाने में लगे हैं कि मुख्यमंत्री पद के लिए भावी दावेदारों को मैदान से ही बाहर कर दिया जाएगा। भाजपायी सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार बाबूलाल गौर की जगह उनकी पुत्रवधू और भोपाल की महापौर कृष्णा गौर को अगली बार टिकट दिलवाया जाए। इसके पीछे प्रमुख तर्क यह दिया जा सकता है कि जो महिला चार विधानसभा क्षेत्रों में जीत चुकी हो, उसके लिए एक विधानसभा सीट जीतना आसान होगा। वैसे भी कृष्णा गौर महिला होने के साथ सुंदर हैं और राजधानी में काफी लोकप्रियता भी हासिल कर चुकी हैं। शिवराज की राह का दूसरा प्रमुख कांटा, गोपाल भार्गव हैं, जिनके पुत्र को टिकट दिलवाई जा सकती है। इसी तर्ज पर राघवजी और जयंत मलैया को भी निपटाने की तैयारी है। शिवराज की सबसे बड़ी दिक्कत कैलाश विजयवर्गीय हैं, जिनकी संघ में भी खासी पैठ है। उन्हें पेंशन घोटाले और सुगनी देवी कॉलेज भूमि घोटाले में घेरने की कवायद शुरू हो गई है।इस प्रकार शिवराज सिंह ने अपनी तीसरी पारी की तैयारियां शुरू कर दी है, मगर क्या इन राजनीतिक  कवायदों से ही सत्ता पर कब्जा बरकरार रखा जा सकता है? भाजपा को कैडर बेस पार्टी माना जाता है, किंतु सत्ता में आने के बाद पार्टी ने जैसे कार्यकर्ताओं को बिसरा ही दिया है। पार्टी के विभिन्न कार्यक्रमों में कार्यकर्ताओं की पीडा सामनने आ चुकी है। यद्यपि शिवराज सिंह ने कार्यकर्ताओं को तवों देने के उद्देश्य से अधिकारियों और मंत्रियों को निर्देशित किया था कि वे सप्ताह में एक दिन गांवों में बिताएं। खुद शिवराज ने इस पर अमल किया, परंतु मंत्री-अधिकारी उनके निर्देश को घोलकर पी गए। अब पार्टी फिर से कार्यकर्ताओं की सुध लेने की योजना बना रही है,किंतु इसमें उसे सफलता मिल पाएगी, उसमें संदेह है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि जब पार्टी सरकार में थी, तब नेताओं ने तो जमकर माल कमाया और उनके हिस्से खुरचन तक नहीं आई। अब तक फिर सत्ता पाने की बारी आई है तो उन्हें लखलखा सुंघाया जा रहा है। लगातार नौ साल से ठगे जा रहे कार्यकर्ता तथा ऐन वक्त पर मान जाएंगे?

                  इसमें कोई दो राय नहीं कि शिवराज सरकार ने कुछ कल्याणकारी योजनाएं लागू की हैं जिनका भाजपा को लाभ मिल भी सकता है। इनमें मुख्यमंत्री कन्यादान योजना और लाड़ली लक्ष्मी योजना शामिल हैं। लेकिन इसमें भी फर्जीवाडे क़े मामले सामने आ चुके हैं और सरकार दोषी सरकारी अमले पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकी है। शिवराज सरकार की ही लोक सेवा गारंटी योजना की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई है, पर सरकार ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि इस योजना का हश्र क्या हो रहा है?खुद सरकारी आंकड़े बयान कर रहे हैं कि इस योजना में 70हजार से अधिक शिकायतें लंबित पड़ी हैं। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को निपटाने के सरकार ने लोक कल्याणकारी शिविरों का आयोजन भी किया। इनमें डेढ़ करोड़ से अधिक शिकायतें आला अधिकारियों की टेबलों की शोभा बढ़ा रही हैं। इन दोनों योजनाओं को लागू करते समय सरकार ने यह प्रावधान भी किया था कि समय-सीमा में काम न होने पर संबंधित कर्मचारी-अधिकारी के विरुध्द नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। दुर्भाग्य की बात है कि सरकार अब तक ऐसा एक भी उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सकी है। शिवराज सरकार की जननी सुरक्षा योजना का हश्र तो आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनता रहता है,जब जननियां अस्पताल परिसर में ही बच्चों को जन्म देने के लिए विवश हो जाती हैं। इस योजना के लिए सरकार द्वारा खरीदे गए वाहन स्वास्थ्य विभाग केअफसरान की निजी जायदाद बन गए हैं। इसी तरह अटल बाल मिशन और दीनदयाल उपाध्याय मिशन के तहत भी सरकार की ओर से सरकारी वाहन खरीदे गए हैं। ये तमाम वाहन आम जनता की बजाय सरकारी अमले द्वारा उपयोग में लाए जा रहे हैं। सरकार यह मानकर चल रही है कि उसकी इन कल्याणकारी योजनाओं से भाजपा का उध्दार होना तय है और अगली बार भाजपा को फिर सत्ता में आने का मौका मिल सकता है,लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि सरकार की ये तमाम योजनाएं उसके ताबूत में कीलें ठोंकने का काम कर रही हैं। प्रदेश में सड़क, बिजली और पानी की व्यवस्था जस की तस है। इस मामले में सरकार अपने घोषणापत्र को ही तिलांजलि दे चुकी है। खासकर किसानों के मामले में तो इस सरकार ने उनके साथ जैसे 'दुराचार' ही किया है। ऐसे में अगर भाजपा फिर से सत्ता में आने का सपना संजो रही है तो इसे दिन में सपने देखने जैसा ही माना जा सकता है। उम्मीद है कि अपने बचे-खुचे कार्यकाल में शिवराज सरकार कुछ ऐसा कर दिखाएगी कि जनता में उसके प्रति सहानुभूति उपजे, वरना इस सरकार का पतन सुनिश्चित

   ? महेश बाग़ी