संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

सशक्तीकरण कार्यक्रम और सरकारी मशीनरी का कार्य मूल्यांकन              

?  वीरेन्द्र जैन

                 कालजयी व्यंग्य उपन्यास 'राग दरबारी' में श्रीलाल शुक्ल लिखते हैं कि ' हमारी शिक्षा व्यवस्था तो रास्ते में पड़ी हुई कुतिया की तरह है जिसे हर राह चलता हुआ आदमी ठोकर मारता जाता है। असल में यह हाल केवल शिक्षा नीति के प्रति ही नहीं है अपितु लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमें मिले अधिकारों का उपयोग करते हुए गैर राजनीतिक लोग भी किसी भी सरकार के सरकारी कामों और सरकारी मशीनरी की चाहे जब चाहे जैसी आलोचना करते ही रहते हैं। यह आलोचना इतनी अधिक विरल,मात्रा में अधिक और बेतुकी भी होने लगी है कि सरकारी मशीनरी ने भी मोटी बेशर्मी ओढ ली है जिससे उस पर इस आलोचना का कोई असर नहीं पड़ता। दूसरी ओर एक निर्दोष को बचाने के लिए निन्नानवे दोषी छोड़ देने को तैयार हमारी न्याय प्रणाली लगभग सौ प्रतिशत लोगों को छोड़ देती है जिससे न्याय का भय लगभग समाप्त प्राय: है।

               सरकारी मशीनरी की आलोचना करते समय हम यह भूल जाते हैं कि सरकारी मशीनरी का काम किसी निजी पूंजीपति के संस्थान की तरह उपयोगिता और लाभ का एक सूत्रीय कार्यक्रम भर लेकर नहीं चलता अपितु उसकी कुछ सामाजिक जिम्मेवारियां भी होती हैं। वह अपनी सेवाओं में कमजोर वर्गों के सामाजिक सशक्तीकरण का कार्यक्रम भी साथ साथ लेकर चलती है जिसका असर भी उसके कुल कार्य उत्पादन पर पड़ता है। निजी संस्थाओं से तुलना करते समय भी अक्सर ही यह बात भुला दी जाती है, और खुले प्रतियोगी की तरह मानकर सरकारी मशीनरी को लतियाया गरियाया जाता है। जो लोग  अनुसूचित जाति, जनजाति, महिला, विकलांग आदि कमजोर वर्गों के आरक्षण के विरोधी नहीं हैं और सामाजिक समरसता का वांछित लक्ष्य प्राप्त होने तक इसे जारी रखने के पक्ष में हैं वे भी यह मानते हैं  कि सामाजिक समरसता पाने का यह तरीका पूरी तरह दोषहीन नहीं है, इसलिए जब तक इससे बेहतर तरीका सामने नहीं आता तब तक इसे ही जारी रखा जाना चाहिए। सामाजिक सशक्तिकरण कार्यक्रम को पूरा करते समय हमारे सरकारी संस्थान अपने काम के साथ साथ समाज कल्याण की भी जिम्मेवारी उठा रहे होते हैं इसलिए उनके कार्य मूल्यांकन करते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वे अपेक्षाकृत कमजोर मानव संसाधनों के सहारे काम कर रहे हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति के कुछ कर्मचारी उनको प्राप्त विशेष सुविधाओं का दुरुपयोग करते भी देखे गये हैं। मेरे परिचित एक बैंक मैनेजर अपने एक कर्मचारी की शिकायत अपने रीजनल मैनेजर से करते हुए कह रहे थे कि 'वह कर्मचारी न केवल काम में कमजोर है, देर से कार्यालय आता है, अपनी सीट से गायब हो जाता है जिससे ग्राहक परेशान होते रहते हैं तथा डाँटने पर हरिजन थाने में जातीय उत्पीड़न की शिकायत करने की धमकी देता है। इन लोगों ने अपनी यूनियन भी अलग से बना रखी है जिससे उसे झूठे गवाह भी आसानी से मिल सकते हैं। जब मैं अपने पुराने ग्राहकों को ही ठीक से सेवाएं नहीं दे पा रहा हूं तो नया बिजनेस कैसे लाऊँ।'मैं उन बैंक मैनेजर को जानता हूं वे स्वयं भी पिछड़ी जाति और कमजोर आर्थिक परिवार से आते हैं। अनुसूचित जाति जनजाति के सदस्यों के प्रति उनकी सहानुभूति है और वे जातिवादी भेदभाव नहीं मानते। वे सम्बन्धित कर्मचारी का छूटा हुआ काम भी स्वयं करने को तैयार हैं बशर्ते कि उसके ज्ञान की कमजोरी के कारण वह छूट रहा हो, पर उनकी समस्या यह भी है कि सम्बन्धित कर्मचारी पर अनुशासनात्मक कार्यवाही न कर पाने के कारण दूसरे कर्मचारी भी अनुशासनहीन हो गये हैं और कुछ कहने पर उसका उदाहरण देकर अभद्र भाषा में जबाब देने लगे हैं। परिणाम यह निकल रहा है कि निर्धारित कार्य लक्ष्य पूरा न कर पाने के कारण मैनेजर का कैरियर बिगड़ रहा है और वे उन लोगों के साथ दिखने लगे हैं जो अपने सवर्ण अहं के कारण आरक्षण के विरोध में हैं। कुछ कुछ ऐसा ही हाल कतिपय महिला कर्मचारी और विकलांग कर्मचारियों के साथ भी दिख जाता है। एक सच्चरित्र ईमानदार बड़े अधिकारी द्वारा काम के लिए डाँटे जाने पर एक महिला कर्मचारी ने छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया था और उन कर्मचारियों ने भी उसका साथ दिया था जिनकी कमाई उक्त अधिकारी की पदस्थापना के बादसे बन्द हो गयी थी। सनसनी बेचने वाले मीडिया ने भी इस कहानी के चटखारे बेचे थे। चूंकि उनकी ईमानदारी और चरित्र से सारे बड़े अधिकारी परिचित थे इसलिए उन्हें केवल स्थानांतरण का ही 'दण्ड' मिला जिससे उनके बच्चों की पढाई पर दुष्प्रभाव पड़ा। महिलाओं को नौकरी में आरक्षण देने वाले कार्यालय के कार्य मूल्यांकन करते समय यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ज्यादातर घरों में उन्हें अपनी नौकरी के साथ साथ गृहणी का काम भी यथावत करना पड़ता है क्योंकि पारम्परिक घरों में उनकी नौकरी करने के कारण उनके घरेलू काम में कोई कमी नहीं आती। इसीलिए सामान्यत:मध्यम वर्ग से आयी महिला कर्मचारियों का ध्यान बँटा रहता है। उन्हें मातृत्व अवकाश भी चाहिए होता है पर इस कारण से उनके कार्यालय के कर्मचारियों की संख्या में अतिरिक्त वृध्दि नहीं की जाती व उनका काम दूसरों पर डाला जाता है जो उसे अपने काम से समय मिलने पर ही उपेक्षाभाव के साथ करते हैं जिसके परिणाम स्वरूप कार्यालय का काम प्रभावित होता है। विकलांग कर्मचारियों से तो प्रबन्धन भी कुछ नहीं कहता किंतु कार्य उत्पादन कम होने के कारण वह ऐसे कर्मचारियों को अपने दफ्तर में रखना पसन्द नहीं करता। सरकारी बैंकों में कमजोर वर्ग के हेतु जो कम लाभ और कमजोर वसूली वाली सरकारी ऋण योजनाएं स्वीकृत की जाती हैं वे अधिक श्रम और जिम्मेवारी माँगती हैं जिससे न केवल बैंकों को ही नुकसान होता है अपितु अधिकारियों की रिपोर्टों पर भी असर पड़ता है,यही काम निजी क्षेत्र के बैंकों को नहीं करना पड़ता। किंतु हम व्यावसायिक प्रगति की तुलना बराबर से करते हैं। 

               सामान्यत: होना यह चाहिए कि हम जब भी सरकारी संस्थानों के कार्य उत्पादन का मूल्यांकन करें तब उसके द्वारा सामाजिक सशक्तीकरण और जन हितैषी कार्यों को भी उसके साथ जोड़ें। यह कुछ कुछ दीवार फिल्म के उस संवाद की तरह होगी कि तुम्हारे पास पैसा है, गाड़ी है, बंगला है, पर मेरे पास माँ है।

? वीरेन्द्र जैन