संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

2-जी पर नीतिगत दुविधा

? कपिल सिब्बल

                 2-जी पर मचा बवाल अब थम गया है। अब यह उस पर विचार करने का समय है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद क्या अब क्या आगे का रास्ता साफ हो गया है? सी.ए.जी की आधारहीन रिपोर्ट, कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने वाले और मीडिया यह स्थिति पैदा करने के दोषी है। वे लोग, जो इस मामले में जमकर हंगामा कर रहे थे, क्या वे इस नवोदित क्षेत्र की जटिलताओं को पूरी तरह समझते है? हम एकदम नये एक ऐसे क्षेत्र से गुजर रहे थे, जिसमें सीखने के लिये कोई पूर्व उदाहरण हमारे पास नही थे। इसमें दूसरे देश भी अपनी ही गलतियों से सीख रहे थे।

               राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एन.डी.ए.) ने उस समय इस क्षेत्र में विस्तार के लिये  के लिये एक मार्गदर्शी मानचित्र प्रस्तुत किया जब संकट में पड़ा संचार का क्षेत्र या टेलीकॉम सेक्टर स्वयं की वचनबध्दता पर खरा नही उतर रहा था। 2001 में पहली बार 1658 करोड़ में टेलीकॉम लायसेंस की एक नीलामी हुई जिसमें लाइसेंस के साथ स्पेक्ट्रम भी जुड़ा हुआ था।  इसके बाद जो लोग टेलीकॉम सेक्टर में आकर सेवाएँ प्रदान करना चाहते थे उन्हे लाइसेंस के साथ जुड़ा हुआ स्पेक्ट्रम भी नि:शुल्क प्राप्त हो रहा था। 2001 में संचार का घनत्व 3.58 प्रतिशत था। अनुभवहीन लोगों के लिये यह एक जोखिम भरा काम था। हमारे घरेलू उद्यमी अनुभवहीन थे। लायसेंस की 20 वर्षों की अवधि में होने वाले संभावित लाभ का विश्लेषण करने के लिये सरकार के पास कोई साधान नही थे। इसके अलावा जिन्होने 2001, 2004 या 2006 में लायसेंस प्राप्त किये वे इसका संपूर्ण विवेचन और सिंहावलोकन कर चुके थे। इन लायसेंसों की अवधि 2021, 2024 या 2026 जो भी हो उसमें समाप्त होगी। उस समय जिस सरकारी अधिकारी ने ये लायसेंस दिये क्या उसके खिलाफ बहुमूल्य संसाधान को बहुत कम कीमत पर देने के लिये अभियोग चलाया जायेगा? बिलकुल नही।

               2026 के बहुत पहले नई तकनीकें आ सकती है जो इन लाइसेंसियों के अधिक लाभ की संभावनाओं को बढ़ा सकती है।क्या सरकार पर इन संभावित तकनीकों के आ जाने का पूर्वानुमान नही लगा सकने का दोष मढ़ना चाहिये?ग्राहकों का आधार बढ़ने पर स्पेक्ट्रम का उपयोग बढ़ा जिससे कंपनियों को होने वाले लाभ में सरकार का हिस्सा भी बढ़ा है। लायसेंस शुल्क के रूप में सरकार इन लाइसेंसियों से जो वार्षिक राशि लेती है  उसमें प्रतिवर्ष उपभोक्ताओं की संख्या में हुई वृध्दि के आधार पर इसका निर्धारण किया गया जिससे सरकार को पुन: लाभ हुआ।

               2007 में संचार घनत्व 18 प्रतिशत था जो मार्च 2012 तक 78.66 प्रतिशत पर पंहुच गया। क्या ऐसे में सरकार को लायसेंस से स्पेक्ट्रम को अलग करके नियम बदल देने चाहिये थे? टेलीकॉम सेक्टर लोगों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाल रहा था। इस क्षेत्र में कम प्रवेश शुल्क जिसमें लायसेंस के साथ स्पेक्ट्रम भी जुड़ा हुआ था,उससे बहुत लाभ हो रहा था। पुराने लायसेंस प्राप्त उद्यमी निरंतर काम कर रहे थे तथा  कई नये उद्यमियों को लायसेंस प्रदान किये गये।

                 इस क्षेत्र की संभावनों का यथार्थ ज्ञान होने पर कई नये लोग इसमें लायसेंस चाहने लगे। बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिये पर्याप्त रूप से स्पेक्ट्रम मौजूद नही था, संचार क्षेत्र का लाभ आम आदमी तक पंहुच रहा था।

                तब यह कहा जा सकता था कि स्पेक्ट्रम को लायसेंस से पृथक कर देना चाहिये और उसकी नीलामी करनी चाहिये। ऐसा करना सरकारी संसाधनों को बेचने जैसा होता। तब क्या यह सेक्टर उसी गति से बढ़ता? मैं नही जानता। यदि ऐसा होता तो टेलीकॉम आपरेटरों के बीच फैले असंतोष का परिणाम न्यायालयीन लड़ाई में बदल जाता। नये ऑपरेटर यह तर्क करते  कि सरकार इस क्षेत्र में असमान बर्ताव करके प्रतियोगिता को समाप्त कर रही है। सरकार पर पहले से मौजूद लाइसेंसियों का पक्ष लेकर उनको लाभ पंहुचाने का आरोप लगाया जा रहा होता। कुल मिलाकर कोई भी 1800मेगाहर्ट बैंड पर दो प्रकार के नियम कैसे रख सकता है कि नये उद्यमी तो स्पेक्ट्रम के लिये बहुत ज्यादा रकम दें और पुराने स्थापित उद्यमी इसे मुत में प्राप्त करें? ऐसा करने पर एक अत्याधिक सक्रिय न्यायालय इसमें जाँच का आदेश देता और इसके परिणामस्वरूप मुकदमा चलता। तथ्यों को गलत नही ठहराया जा सकता था। नीति बनाने वाले पर मुकदमे अवश्यंभावी था जिससे नही बचा जा सकता था।

                  ट्राइ ने बगैर किसी सूचकांक से जोड़े सभी उद्यमियों के लिये समान नियम अपनाने की राह को चुना। नौकरशाहों की राय इससे भिन्न थी। हालाकि स्पेक्ट्रम लायसेंस के साथ जुड़ा हुआ था फिर भी सरकार को 2001 की कीमत पर इन्हे आवंटित करने की सलाह दी जा सकती थी किन्तु यह नही किया गया। लायसेंस बगैर किसी सूचकांक से संबध्द किये ही दे दिये गये।

               जनवरी 2008 में पुराने नियमों के अधीन नये उद्यमियों को लायसेंस देने से लेकर अगस्त 2010 के बीच सिर्फ एक कोर्ट में एक संदिग्ध याचिका के प्रस्तुत होने के अलावा कुछ भी नही हुआ। इस याचिका का आधार ही संदिग्ध था जिसे कोर्ट ने निरस्त कर दिया।

               इसके बाद सी.ए.जी. की रिपोर्ट आई जिसमें सरकारी खजाने को लगभग 1,76,000 करोड़ का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया। इसके बाद एकाएक शोरगुल मचा। यह कहा जाने लगा कि यदि स्पेक्ट्रम की नीलामी की जाती तो सरकार को इससे बहुत अधिक लाभ होता। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर मजेदार तरीके से प्रस्तुत किया। उसने मनमाने तरीके से लोगों को मामले को स्पष्ट समझने और बात करने का अवसर दिये बगैर और बिना वैकल्पिक दृष्टिकोंणों को प्रस्तुत किये जनता को गुमराह किया।कोर्ट को भीयह लगा कि पूॅजीपतियों या उद्यमियों की सरकार के साथ साँठगाँठ के कारण यह कथित नुकसान हुआ है। कोर्ट सी.बी.आई.द्वारा की जा रही जाँच की मॉनीटरिंग कर रहा था। इसके आगे की कहानी सब जानते है।

               जनवरी 2008 में दिये गये सभी लायसेंस निरस्त कर दिये गये। पहले आओ पहले पाओ की नीति को अवैध घोषित कर दिया गया।घृणित सौदों के आरोप लगाये गये। रातों रात धनवान बनने के लिये लायसेंस देने में पैसा कमाने के आरोप लगाये जाने लगे।लोगों ने अग्रसक्रिय कोर्ट की प्रशंसा की और तत्कालीन मंत्री तिहाड़ जेल पंहुच गये।

               किन्तु वे निवेशक जो संचार क्षेत्र में हो रही क्रान्ति में योगदान देना चाहते थे और बहुत ज्यादा फैले हुये बाजार से लाभ प्राप्त करना चाहते थे,जिन्होने निष्पक्षता और ईमानदारी से लायसेंस प्राप्त किये थे उन्होने स्वयं को असहाय पाया। उनके द्वारा लगाया गया धन मुश्किल में फॅस गया। बैंक लोन को जमा नही किया जा सकता था।  बाजार ने इस सेक्टर में अपना विश्वास खोना प्रारंभ कर दिया। जो नये उद्यम प्रारंभ करना चाहते थे उन्होने इस निर्णय के कारण पैदा हुई अनिश्चितता को देखते हुये ऐसा नही किया। जो 4 सालों तक निवेश कर चुके थे (2008 से 2012 तक) उनके व्यवसाय की संभावनाओं पर एकाएक गाज गिर गई, जिसमें उनका स्वयं का कोई अपराध नही था। उन्होने यह मान लिया कि इसमें सरकार की गलती थी और सरकार को बायलेटरल इन्वेस्टेमेंट प्रमोशन एण्ड प्रोटेक्शन एग्रीमेंट (बी.आई.पी.ए.) को तोड़ने के कारण उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने का निश्चय किया।

               आज हम निरस्त किये गये लायसेंसों सहित अतिरिक्त स्पेक्ट्रम की नीलामी की प्रक्रिया से गुजर रहे है। यह सेक्टर भारी कर्ज में डूबा हुआ है। लगभग 2लाख करोड़ रूपये के ऋणों का भुगतान नही हुआ है। पहले से ही समस्याग्रस्त इस सेक्टर की बैंकें भी मदद नही करना चाहती।  3-जी नीलामी के खाते पर प्राप्त  ऋण से कोई ज्यादा मदद नही मिल सकती है।

                    नीति निर्माता दुविधा का सामना कर रहे है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद नीलामी के अलावा कोई विकल्प नही है। यदि संचार कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिये नीलामी के लिये आरक्षित मूल्य से हमने कम पर नीलामी की तो हम पर अभियोग चलाया जायेगा। इससे कुछ जज समझ सकते है कि हमने संचार कंपनियों को लाभ पंहुचाया। यदि नीलामी की न्यूतम कीमत ज्यादा रखते है तो प्रतियोगी नीलामी एक बहुत बुरी चीज होगी और इस क्षेत्र के परिवेश तथा सामान्य अर्थव्यवस्था में और अधिक गिरावट आयेगी। ऐसे हालात पैदा करने के लिये हमें सीएजी, कोर्ट और मीडिया का जरूर शुक्रिया अदा करना चाहिये।

                मैं ऐसा कोई सुझाव नही देने जा रहा हूॅ कि कोर्ट गलत कार्य करने वालों पर तथा भ्रष्ट लोगों पर कोई मुकदमा न चलायें। यदि वे ऐसा नही करेंगे तो अपने कर्तव्यविमुख होंगे। किन्तु उन्हे ऐसा एक संपूर्ण जाँच और व्यक्तिगत अपराध की संभावना को सुनिश्चित करने के बाद ही करना चाहिये। एक व्यापक प्रभावी आदेश से लाखों डॉलर का निवेश जोखिम में पड रहा है। वे कंपनियॉ भी मुश्किल में है जो अपराध में शामिल नही है,किन्तु पहले आओ पहले पाओ नीति,जिस पर बहुत ज्यादा संदेह किया जा रहा है,की शिकार बन गई है। निर्दोष और कम जागरूक लोग दंडित हो रहे है। जो दोषी है उन्हे और जो नीलामी के बहुत बाद में इस सेक्टर में आये उन्हे एक ही डंडे से हाँका जा रहा है। उस समय जो स्पेक्ट्रम बेंड थे जिन्हे मुश्किल से ही कोई लेने को तैयार था। इस मामले में पीड़ित उद्यमियों को राहत देने में यह एक समुचित तथ्य है कि इस मामले में न्यायालय के हस्तक्षेप के पूर्व 4वर्षों तक निरंतर निवेश किया जाता रहा,किन्तु कोर्ट ने इस तथ्य पर भी विचार नही किया गया। विशेषकर उन लोगों के मामले में जिन्होने इस क्षेत्र में बाद में निवेश किया।

                   व्यक्तिगत रूप से दोष की जाँच किये बगैर और प्रत्येक मामले में निवेशक की परिस्थितियों को देखे बगैर नीति को अवैधानिक बताकर लायसेंसों को निरस्त करना मूलरूप से सुप्रीम कोर्ट का काम नही है। सरकारी खजाने के धान को बचाने के लिये हम ऐसी विशाल संपत्ति को खतरे में डाल रहे है जिसके द्वारा खजाने को निरंतर लाभ मिलता रह सकता है। एक जटिल सामाजिक-आर्थिक परिवेश में जो समूचा कार्य कभी न्यायालय का नही रहा उसे नीति निर्माण का काम कार्यपालिका के पास ही बने रहने देना चाहिये। नीति और नियमों के अंतर्गत यदि कोई व्यक्तिगत निर्णय गलत है तो कोर्ट को निश्चित ही उस पर फैसला करने का अंतिम अधिकार है।

               जहाँ तक खजाने को अनुमानित नुकसान की बात है यह एक चिन्ता का विषय है, मैं यह विनम्रतापूर्वक राय देता हूॅ कि यह सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने या इन्हे सशक्त करने के उध्देश्यों के विरूध्द होगा। भूमि को ही लीजिए। क्या दिल्ली में स्कूल खोलने के लिये भूमि की नीलामी की जानी चाहिये? इसका उत्तर निश्चित रूप से ''नही'' है। निजी क्षेत्र इसमें निवेश नही करेगा और यदि वह ऐसा करता भी है तो इसकी कीमत अभिभावकों पर डाल दी जायेगी। तब स्कूल जाना सिर्फ धनी लोगों के बच्चों के लिये ही संभव होगा। सी.ए.जी.को ऐसे सभी प्रकार के आवंटन के लिये अनुमानित नुकसान की गणना भी करनी चाहिये थी।  यही बात अस्पतालों और को संस्थागत दरों पर भूमि आवंटन के मामले में लागू होती है या अनुदान देकर आवंटित औद्योगिक टाउनशिप के निर्माण पर भी लागू हो सकती है। जब समाज के व्यापक उध्देश्यों को पूरा करने के लिये संसाधनों का उपयोग किया जाता है तो बाजार तंत्र पूरी तरह से अप्रासंगिक है, विशेषकर तब जब यह पिछड़े, उपेक्षित या समाज की मुख्यधारा से पृथक लोगों के लिये किया जाता है।

                मेरी दूसरी आपत्ति यह है कि जब कार्य की निरंतरता की दशा में एक एकाकी तत्व  को हानि या अनुमानित हानि की गणना करने के लिये कभी भी विश्लेषित नही किया जा सकता। कार्य की गतिशीलता में सभी तत्वों के हानि या लाभ का विश्लेषण करने की जरूरत है। संचार के संदर्भ में आपको राजस्व की गणना करने की भी जरूरत है जो सरकार को प्राप्त होता है, परिणामस्वरूप निवेश में वृध्दि होती है, और रोजगार का सृजन होता है आदि। इसमें एक बात और जोड़ता हूॅ,सशक्तीकरण से प्राप्त अनेक अगणनीय लाभ भी प्राप्त होते है जिन्हे हम अनुमानित लाभ कह सकते है।

               इसके अतिरिक्त, बाजार का प्रतिक्रिया करने का अपना विशिष्ट तरीका होता है। यदि स्पेक्ट्रम आवंटन के लिये नीलामी को अपनाया गया होता तो बाजार सकारात्मक प्रतिक्रिया नही करता अथवा संचार घनत्व की गति बहुत अधिक धीमी होती। अर्थशास्त्री प्राय: बाजार को गलत पाते है। एक विशेष पालिसी को अपनाने पर उसकी सफलता एक जुऑं है। सार्वजनिक संपत्ति के आवंटन के लिये नीलामी की प्रक्रिया को नही अपनाने का दोष सरकार पर लगाने से न सिर्फ बाजार की अनिश्चितता की अनदेखी की जा रही है बल्कि सी.ए.जी. अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहे है जिसे करने का आपको अधिकार नही है। एक अकाउन्टेन्ट को एक अकाउन्टेन्ट ही रहना चाहिये और उन सब हानियों की गणना करना चाहिये जो अकाउन्टेन्सी के नियमों के अंतर्गत आती है।

               अन्त में, हानियों की गणना सिर्फ बेलेंस शीट के बाद ही करना चाहिये जिसमें लेनदेन के सभी पक्ष दर्शाये जाते है। माना कि एक कंपनी लागत से कम पर कोई उत्पाद बेचती है और उसे बढ़ाने के लिये मीडिया के माधयम से प्रचार प्रसार करती है,इसमें प्राप्त होने वाली आय से ज्यादा खर्चें हो जाते है। क्या कंपनी के डायरेक्टर को ऐसी रणनीति के लिये दोषी माना जाना चाहिये। हो सकता है उनकी यह रणनीति लंबी अवधि में सफल हो और वे खूब ज्यादा लाभ कमायें। वह असफल भी हो सकती है। यह व्यवसाय की एक जोखिम है जो कंपनी लेती है।सामान्य लेखा परीक्षा या ऑडिट में ऐसी स्थितियों को शामिल नही किया जा सकता। वह एक नीति है।

               हमने एक नयी रूपरेखा बनायी है। मुझे उम्मीद है कि हम सफल होंगे। यदि हम सफल नही होते है, तो इसके लिये हम स्वयं को दोषी मानेंगे।

? कपिल सिब्बल

(लेखक केन्द्रीय मानव संसाधन विकास तथा संचार एवं सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री है।)