संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

संदर्भ : गोसीखुर्द बांध परियोजना घोटाला

सवाल, बीजेपी और नितिन गडकरी के रवैये पर भी हैं

? जाहिद खान

                बीजेपी की कथनी और करनी में कितना फर्क है, यह सच कई बार देश के सामने आ चुका है। पार्टी और उसके नेता कहते कुछ हैं और करते कुछ। महाराष्ट्र की सिंचाई परियोजनाओं में भ्रष्टाचार को लेकर पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस को घेरने वाली बीजेपी,खुद राज्य में इस भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती रही है। पार्टी से जुड़े कई आला लीडर सिंचाई घोटाले में सीधे-सीधे मुब्तिला हैं। यह बात हाल ही में एक आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि दमानिया के सनसनीखेज खुलासे के बाद सामने आई। दमानिया ने अपने इस खुलासे में बीजेपी के राष्ट्रीय अधयक्ष नितिन गडकरी पर सिंचाई घोटाले को जानबूझकर दबाने के इल्जाम भी लगाए। बीजेपी इस इल्जाम पर अपनी कोई सफाई दे पाती, इससे पहले मीडिया में एक चिट्टी सामने आ गई। जिसे नितिन गडकरी ने ही लिखा है। चिट्टी, केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री पवन बंसल के नाम है और इसमें, उनसे गोसीखुर्द बांधा परियोजना के लिए बकाया 400 करोड़ रूपए जारी करने की मांग की गई है। कमोबेष ऐसी ही एक चिट्टी बीजेपी के पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने भी लिखी है। दोनों चिट्ठियों का सार कुल मिलाकर एक ही है, परियोजना का बकाया पैसा केन्द्र जल्द जारी करे।

                  यह बतलाना लाजिमी होगा कि गोसीखुर्द परियोजना, घोटालों को लेकर विवादों में है। कार्य गुणवत्ता में कमी पाए जाने पर, केन्द्र ने फिलवक्त परियोजना के लिए शेष कोष जारी करने पर रोक लगा रखी है। परियोजना के काम का मूल्यांकन करने वाली सेंट्रल वाटर कमीशन और वडनेरे कमेटी दोनों ने ही अपनी रिपोर्टों में,परियोजना में इस्तेमाल सामग्री को घटिया दर्जे की बताते हुए,सरकार से काम कर रही कंपनियों पर रोक लगाने की सिफारिश की थी। ठेकेदारों की लूट का जरिया बनी इस परियोजना में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी हद से ज्यादा दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं ?जानना ज्यादा मुश्किल नहीं। परियोजना में ठेकेदार,गडकरी के ही दोस्त अजय संचेती और मितेश बांगड़िया हैं। बीजेपी राज्यसभा सांसद अजय संचेती की एसएमएस कंसट्रक्शन कंपनी और बीजेपी के एमएलसी मितेश बांगड़िया की एमजी बांगड़िया व महेन्द्र कंस्ट्रक्शन कंपनी सीधे-सीधे तौर पर गोसीखुर्द परियोजना में बांध बनाने के काम से जुड़ी हुई है। जाहिर है,यह दोनों नेताओं ने पहले तो अपने सियासी रसूख का फायदा उठाते हुए, इस परियोजना में ठेकेदारी हासिल की,और फिर इसके बाद पैसों की लूट में लग गए। जब परियोजना के लिए पैसा आना बंद हो गया, तो इन्होंने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के जरिए केन्द्र पर दवाब बनाना षुरू कर दिया।

               यह पहली बार नहीं है जब नितिन गडकरी और उनके कार्यकलाप सवालों के घेरे में हैं, बल्कि इससे पहले भी चर्चित कोल ब्लॉक घोटाले में उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने अपने यहां जो कोल ब्लॉक आबंटन किए, उनमें भी एक खदान का ठेका नितिन गडकरी के इन्हीं खासमखास अजय संचेती को मिला था। छत्तीसगढ़ सरकार ने सभी कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर, अजय संचेती की कंपनी एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर को यह ठेका 32 साल के लिए, बहुत कम दरों पर व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए दिया था। अजय संचेती की कंपनी पर यह हद से ज्यादा मेहरबानी नितिन गडकरी की वजह से ही थी। बहरहाल, सीएजी ने बाद में अपनी एक रिपोर्ट में बतलाया कि रमन सरकार के इस फैसले से राज्य को 1,052 करोड़ रूपए का नुकसान हुआ।

               देश की महत्वपूर्ण चौदह राष्ट्रीय सिंचाई परियोजनाओं में से एक गोसीखुर्द बांध परियोजना का उद्धाटन आज से चौबीस साल पहले, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किया था। यह केन्द्रीय परियोजना है और इसकी लागत का 90 फीसदी केन्द्र खर्च कर रहा है। परियोजना का मकसद विदर्भ के लाखों किसानों को सिंचाई के लिए पानी मुहैया कराना था। परियोजना की लागत 372 करोड़ रूपए और इसे पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया। राजीव गांधी ने इसके लिए तत्काल 200 करोड़ रूपए जारी भी कर दिए। योजना के बजट को देखते हुए, इसे सही वक्त पर पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा न हो सका। परियोजना जैसे ही शुरू हुई, इस पर अधिकारियों, नेताओं और ठेकेदारों की गिध्द नजर लग गई। जो भी इस परियोजना से जुड़ा, उसका एक मात्र मकसद पैसा कमाना था। परियोजना को शुरू हुए चौबीस साल हो गए, लेकिन यह आज भी अपने मुकाम तक नहीं पहुंच पाई है। इस बीच केन्द्र और महाराष्ट्र में कई सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन परियोजना जस की तस रही। पैसों की इस बंदरबांट में, परियोजना वहीं अटकी है। अलबत्ता, परियोजना का बजट 372 करोड़ रूपए से बढ़ते-बढ़ते 14,000 करोड़ रूपए पार कर गया।

                परियोजना को लेकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने वाली बीजेपी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि, महाराष्ट्र में साल 1995 से लेकर 1999 तक जब वह सत्ता में थी, तब उसने इस परियोजना को पूरा करने के लिए अपनी ओर से क्या कदम उठाए ? महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि केन्द्र में भी वह साल 1999 से लेकर 2004 तक सत्ता में रही, तब उसे यह ख्याल नहीं आया कि परियोजना समय पर पूरी हो। आज केन्द्र और राज्य दोनों जगह, जब वह विपक्ष में है तो उसे परियोजना का ख्याल आया है। किसानों के लिए,वह घड़ियाली आंसू बहा रही है। सच बात तो यह है कि गोसीखुर्द बांध परियोजना में देरी के लिए बीजेपी भी उतनी ही दोशी और जिम्मेदार है,जितनी राज्य की कांग्रेस सरकारें। नितिन गडकरी को परियोजना पूरी होने से ज्यादा इस बात की फिक्र है कि ठेकेदारों को पैसा क्यों नहीं मिल रहा?जबकि जांच रिपोर्ट में ठेकेदारों पर ही सबसे ज्यादा अंगुली उठी है और वे ही परियोजना में देरी के लिए जिम्मेदार हैं। नितिन गडकरी को विदर्भ के किसानों की यदि जरा सी भी फिक्र होती, तो उनकी चिट्टी का मजमून कुछ इस तरह से होता कि परियोजना में भ्रष्टाचार के दोषी ठेकेदारों से पैसा वसूला जाए और उनके लाइसेंस रद्द कर दिए जाएं। ताकि परियोजना सही समय पर पूरी हो सके।                        

? जाहिद खान