संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

झूठ बोलने में हिटलर को भी मात करते हैं

आरएसएस से जुड़े नेता और अखबार

? एल.एस.हरदेनिया

                 झूठ बोलने में संघ परिवार से जुड़े व्यक्तियों को कोई हरा नहीं सकता है। संघ से जुड़े झूठ बोलने वालों की सूची में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम सबसे ऊपर है। न सिर्फ संघ से जुड़े लोग वरन् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े समाचार पत्रों को भी झूठ बोलने में भारी विशेषज्ञता हासिल है।

               अभी हाल में नरेन्द्र मोदी ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी की विदेश यात्राओं और विशेषकर उनके इलाज पर लगभग दो हजार करोड़ रूपये खर्च हुआ है। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि उन्होंने यह आंकड़ा एक समाचार पत्र में पढ़ा है। क्या एक मुख्यमंत्री को समाचार पत्र में छपी खबर के आधार पर इतना गंभीर आरोप लगाना चाहिये?दो हजार करोड़ रूपया इतना बड़ा आंकड़ा है कि उसमें एक नहीं सैकड़ों लोगों का विदेश में इलाज हो सकता है पर इससे मोदी को क्या मतलब उन्हें तो आरोप लगाना है जो उन्होने लगा दिया।

                 'पांचजन्य' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख पत्र है। उसने अभी हाल में असम के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट छापी थी। यह रिपोर्ट झूठी बातों और झूठे आंकड़ों से भरपूर थी। परंतु उसमें एक घटना का जिक्र ऐसा किया गया था जिस तरह का विवरण शायद स्वयं हिटलर और झूठ बोलने में माहिर उसका चेला गोयबल्स भी नहीं करता। सन् 1983में असम में एक साम्प्रदायिक नरसंहार हुआ था। इस नरसंहार में सिर्फ मुसलमान मारे गये थे। मारे गये मुसलमानों की संख्या लगभग तीन हजार थी। परंतु पांचजन्य ने लिखा कि सन् 1983में बांग्लादेशी मुसलमानों ने सैकड़ों गैर-मुसलमानों की हत्या की थी।

                इसी तरह की कई और झूठी बातें 'पांचजन्य' में प्रकाशित रिपोर्ट में लिखी गई हैं। मैंने इस समाचार के संबंध में पांचजन्य के संपादक को पत्र लिखा है। संपादक ने पत्र मिलने की सूचना देने का शिष्टाचार भी नहीं निभाया।

पत्र निम्नानुसर है:

प्रति,                    

            संपादक,

            पान्नचजन्य

 

प्रिय महोदय,,

मैं आपके साप्ताहिक का नियमित पाठक हँ और पूरे पत्र को ध्यान से पढ़ता हूं। इसी तारतम्य में मैंने आपके 12 अगस्त के अंक के कवर पेज पर असम का समाचार पढ़ा।  समाचार के साथ आपने कुछ चित्र भी छापे हैं। कवर पेज के अतिरिक्त पृष्ठ 3 पर और 5 पर भी आपने असम के संबंध में विस्तृत समाचार छापे हैं।

कवर पेज पर छापा गया है ''बांग्लादेशी घुसपैठियों ने रचाया यह खूनी खेल,अंगारे पर असम,सोनिया पार्टी की देशघाती राजनीति''। मेरी राय में यह देखकर कोई भी पाठक उत्तेजित हो सकता है। भड़काऊ शीर्षक के साथ एक चित्र में कुछ झोपड़े नुमा घरों को आग से जलते दिखाया है। साथ ही एक अत्यधिक वृध्द महिला और उसके पांच अन्य लोगों को अत्यधिक चिन्तित मुद्रा में दिखाया है। वेषभूषा से ये सब हिन्दू प्रतीत हो रहे हैं। इस तरह ये चित्र चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि वे बंगलादेशी घुसपैठियों की हिंसक गतिविधियों की शिकार है। इस तरह के शीर्षक और चित्र साम्प्रदायिक हिंसा का कारण बन सकता है क्योंकि उन्हें देखकर कोई भी संवेदनशील इंसान उत्तेजित होकर प्रतिहिंसा पर उतारू हो सकता है।

पृष्ठ दो पर छपी रिपोर्ट भी आपने ''बांग्लादेशी घुसपैठियों की आड़ में सोनिया पार्टी की देशघाती राजनीति''शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया है।

इस लेख में भी अनेक बेबुनियाद,तथ्यों से परे बातें छापी गयी हैं। जैसे इस लेख में एक जगह कहा गया है ''बांग्लादेश जब पाकिस्तान से अलग हो गया तो पाकिस्तान की खुफिया एजेन्सी आई.एस.आई.को असम को मुस्लिम बहुल बनाकर उसे हिन्दुस्तान से तोड़ने का एक और रास्ता मिल गया। बांग्लादेश बनने के बाद लाखों की संख्या में बांग्लादेश मुस्लिम घुसपैठियें हिन्दुस्तान आये और अधिकांश असम में स्थाई रूप से बसने लगे। यह ठीक है कि इन बांग्लादेश घुसपैठियों ने अपने विस्तार के लिये सारे हिन्दुस्तान को ही अपना निशाना बनाया था। एक मोटे अनुमान के अनुसार आज हिन्दुस्तान में बसे बांग्लादेश घुसपैठियों की संख्या चार करोड़ के लगभग है।''

समाचार के उक्त अंश पूरी तरह बिना किसी ठोस आधार के लिखे गये हैं। पहली बात यह है कि अधिकांश बांग्लादेशी पृथक बांग्लादेश के निर्माण के पहले भारत आये थे। अनेक वे बांग्लादेश निवासी जो मुजीबुररहमान और उनकी अवामी लीग के समर्थक थे उन्हें पाकिस्तान के क्रूर शासकों के जुल्मों का सामना करना पड़ा था। जब एक देश का निवासी अपने देश की सरकार की ज्यादतियों का शिकार होते हैं तो ऐसे अन्य देश में जाकर शरण लेता है जहां उन्हें सुरक्षा प्राप्त होने का विश्वास होता है। इस तरह के लोगों को शरणार्थी कहा जाता है जो राजनीतिक कारणों से शरण लेते हैं। परंतु आपका साप्ताहिक और संघ परिवार जिसके आप मुख पत्र ह, उन मुसलमानों को भी घुसपैठिया बताता है जो पूर्व पाकिस्तान में ढाये गये जुल्मों से परेशान होकर भारत में शरण लेने को मजबूर हुए थे। इसके विपरीत आप भारत में शरण लेने वाले हर हिन्दू को शरणार्थी बताते हैं भले ही वहे व्यक्तिगत कारणों से भारत में बसा हो। इस तरह यह एक वास्तविकता है कि बांग्लादेश  बनने के पूर्व भारी संख्या में बांग्लादेशी मुसलमानों ने भारत में शरण ली थी और हमने उन्हें शरण दी थी। वैसे यह कहना गलत होगा कि बांग्लादेश बनने के बाद एक भी बांग्लादेशी मुसलमान भारत नहीं आया। परंतु यह दावा करना कि भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या चार करोड़ है, अत्यंत अतिश्योक्तिपूर्ण है। इस संबंध में यह जिज्ञासा होना स्वाभाविक होगा कि आपने चार करोड़ का आंकड़ा किस आधार पर दिया है? क्या उसका आधार कोई सरकारी दस्तावेज या किसी अन्य संस्था द्वारा किया सर्वेक्षण है। पत्रकारिता का एक बुनियादी सिध्दांत है Facts are sacred comment is free  बिना किसी तथ्यात्मक आधार के आपने चार करोड़ का आंकड़ा दिया है। ऐसा करके आपने पत्रकारिता के बुनियादी सिध्दांत का उल्लंघन किया है।

            इसी तरह पृष्ठ पांच में छपे लेख में भी उत्तेजित करने वाली अनेक बातें छापी गई है जैसे:-

कोकराझार की कुल आबादी 8 लाख है उसमें एक लाख से अधिक मुसलमान हैं जिनमें से अधिकांशत: बांग्लादेशी हैं जो घुसपैठ करके आये हैं। असम में रहने वाले सभी मूल नागरिकों को भय है कि यदि असम में इसी गति से बांग्लादेश मुसलमानों की आबादी बढ़ती  रही तो वह दिन दूर नहीं जब पूरा असम मुसलमानों के चंगुल में आ जायेगा और यहां के मूल निवासी अपनी जड़ों से कटने को मजबूर कर दिए जाएंगे। उनका सामूहिक नर-संहार हो जायेगा। सन् 1983 का नैल्ली नर-संहार अभी भी सबको याद है, जब बांग्लादेश मुसलमानों ने सैकड़ों स्थानीय लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी। बोडो हिन्दुओं को भी यह भय समान रूप से सता रहा है। ये मुसलमान बोडो समाज के अस्तित्व को खतरा पैदा कर रहे हैं और उनके जंगल व जमीन से बोडो लोगों को बेदखल कर रहे हैं। लेख के इस हिस्से में यह लिखकर कि ''उनका सामूहिक नर संहार हो जायेगा'' आपने लोगों को एक बेबुनियादी डर दिखाकर उत्तेजित करने का प्रयास किया है। इस हिस्से में नैल्ली में हुये नरसंहार का जिक्र किया है। आपने लिखा है कि ''सन् 1983 का नेल्ली नरसंहार सभी को याद है, जब बंगलादेशी मुसलमानों ने सैकड़ों स्थानीय लोगों की निर्मम हत्या कर दी थी।'' आपके द्वारा दिया गया यह तथ्य भी बेबुनियाद है क्योंकि यह किसी से नहीं छिपा है कि नैल्ली नरसंहार में 3000 मुसलमान मारे गये थे, यह नरसंहार पूर्णत: एकतरफा था ओर इसमें एक भी हिन्दू नहीं मारा गया था।

आपने अपने लेखों में बोडो का बोडो-हिन्दू बताया है। ऐसा लिखना अर्थात बोडो को हिन्दू बताना उनका अपमान है क्योंकि वे आदिवासी हैं और स्वयं को हिन्दू नहीं मानते। उनका हिन्दू धर्म से कुछ लेना देना नहीं है। कुल मिलाकर 12 अगस्त के अंक में आपने भड़काने वाली बातें तो लिखी ही है इसके साथ ही आपने बेबुनियाद, तथ्यों से दूर और लगभग असत्य बातें भी लिखी है। मेरी राय में 12 अगस्त के अंक में छपे दोनों डिस्पेच लोगों को भड़काने वाले है। इन्हें पढ़कर साम्प्रदायिक उत्तेजना पैदा हो सकती है जो हिंसक रूप ले सकती है। इस तरह की बेबुनियाद बातें लिखकर आपने भोले-भाले पाठकों को भ्रमित किया है। ये दोनों लेख राष्ट्रीय एकता परिषद एवं प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा प्रसारित दिशा निर्देशों का उल्लंघन है। अत: आपसे निवेदन है कि मेरे द्वारा भेजे गये पत्र को अक्षरश: प्रकाशित करें और अपने पाठकों से उत्तेजना फैलाने वाली सामग्री छापने के लिये क्षमा मांगे। मेरा पत्र कवर पेज से छापें और उतने ही मोटे शीर्षकों से छापें जितने मोटे अक्षरों से आपने उक्त लेख प्रकाशित किया था। मेरा अनुरोध है कि मेरे पत्र को अगले अंक में छापे और इसकी सूचना मुझे दें । साथ ही मेरा लेख लिस अंक में छापें वह भी मुझे भेजे। यदि 15 दिन के अंदर मेरा लेख नहीं छापा गया तो मैं अन्य आवश्यक कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र रहूंगा। 

                                    भवदीय

                                    (हम समवेत)

? एल.एस.हरदेनिया