संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

महासंकट का रूप लेता डिप्रैशन

? राहुल शर्मा

               मानसिक समस्याओं की वैश्विक बढ़ोतरी मैं डिप्रैशन सबसे अग्रणी है। पूंजीवादी समाजों के आधुनिकता और प्रगति  के भीमकाय दावों की पोल खोलती यह मानसिक समस्या इतनी तेजी से हमारे चारों ओर बढती जा रही है कि इसके सही स्तर का पता लगा पाना लगभग नामुमकिन सा है। हमारे जैसे विकासशील देशों मैं जहाँ की राजनैतिक व प्रशासनिक व्यवस्थाएं मानसिक समस्याओं की रोकथाम को ज्यादा तरजीह नहीं देतीं, जहाँ मानसिक समस्याओं के प्रति कई पूर्वग्रह हों व इन पर जागरूकता मैं कमी हो वहां  हालात लगभग बेकाबू हो जाते हैं। 

                विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू. एच. ओ.) द्वारा डिप्रैशन को सन 2004 मैं विश्व पर पड़ने वाले रोगों के भार की श्रेणी मैं तीसरी पायदान पर रखा था जो अनुमानत: सन 2030  तक पहले पायदान पर आ बैठेगा। विकसित देशों मैं आर्थिक क्षेत्रों के हालिया नकारात्मक बदलावों के चलते उन देशों मैं बेरोजगारी बढ़ी है, आम लोगों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है तथा उनमें असुरक्षा बोध में बेतहाशा वृध्दी हुई है। इस सब के चलते अब वे देश भी डिप्रैशन के प्रति कई गुना संवेदनशील हो गये  हैं। बहुत पहले अमेरिका के अश्वेत समुदाय के एक पादरी जेस्से जैक्सन ने वहां के गोरों पर तंज करते हुए कहा था कि ष्हमारी बेरोजगारी को गोरे लोग आलसीपन बताते हैं लेकिन जब वो बेरोजगार होते हैं तो उसे आर्थिक डिप्रैशन कह दिया जाता हैष्। अब यही आर्थिक डिप्रैशन या रिसेशन मानसिक व्याधिरुपी डिप्रैशन मैं तब्दील हो रहा हैं और इसके पीछे नवउदारवादी आर्थिक नीतियां स्पष्ट तौर से जिम्मेवार हैं। अल्प आय वाले व विकासशील देशों मैं तो ये स्थितियां जैसे हमेशा के लिए घर ही कर गयीं हैं। इसका दर्दनाक उदाहरण हमारे देश के किसानों द्वारा लगातार आत्महत्या करते जाना है। सन 1995 से अब तक देश मैं लगभग 3 लाख किसानों ने आत्महत्याएं की हैं और यह दुश्क्रम अब भी जारी है। आत्महत्या का बड़ा गहरा सम्बन्ध डिप्रैशन से होता है।  एक अनुमान के अनुसार पूरी दुनिया मैं 35 करोड़ से ज्यादा लोग डिप्रैशन के शिकार हैं। भारत में गंभीर या तीव्र किस्म के डिप्रैशन से पीड़ितों की संख्या दुनिया में सर्वाधिक(36 प्रतिशत) है। करीब 10 लाख लोग प्रतिवर्ष दुनियाभर में डिप्रैशन की समस्या के कारण आत्महत्या करते हैं। भारत में भी आत्महत्याओं का ग्राफ साल दर साल बढ़ रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने बताया कि सन 2010 में हुई आत्महत्याओं में सन 2011 में 0 .7 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। गए साल 1,35,585 लोगों ने आत्महत्याएं कीं जिनमें से ज्यादातर को डिप्रैशन या कोइ अन्य मानसिक समस्या थी।

                डिप्रैशन की समस्या ज्यादातर युवावस्था मैं शुरू होती है और यह लोगों की कार्य क्षमता व जीवन के प्रति नजरिए मैं तीव्र स्तर के नकारात्मक बदलाव लाती है। इसी कारण वैश्विक स्तर पर विकलांगता के पीछे डिप्रैशन एक बड़ा कारक है खासकर उन मायनों मैं जिनमें विकलांगता के कारण मनुष्यों के कुल वर्ष नष्ट होते हैं, डिप्रैशन एक महत्वपूर्ण कारण बनता है।  महिलाएं डिप्रैशन के प्रति पुरुषों की अपेक्षा 2 से 3  गुना ज्यादा संवेदनशील होती हैं। उच्च-मध्यम व निम्न आय वाले देशों मैं महिलाओं पर पड़ने वाले रोग-जनित बोझ को बढाने मैं भी डिप्रैशन ही जिम्मेवार है। विकसित देशों के शोधों ने बताया है कि माँ को यदि डिप्रैशन की समस्या है तो इससे उनके बच्चों की वृध्दि भी प्रभावित होती है। सामान्यत: डिप्रैशन को हल्के, मध्यम व तीव्र  श्रेणियों मैं बांटा जाता है। इसके उपचार हेतु दवा की आवश्यकता मध्यम व खासकर तीव्र स्तर के डिप्रैशन मैं होती है जबकि अल्प स्तर का डिप्रैशन मनो-चिकित्सा विशेषकर संज्ञानात्मक-व्यावहारिक चिकित्सा व अन्य मनोचिकित्साओं से ठीक हो सकता है। दुनियाभर में 50 प्रतिशत से ज्यादा डिप्रैशन  के मामले इलाज के दायरे में कभी आ ही नहीं पाते। हमारे देश में सही उपचार नहीं मिलने के पीछे कमजोर प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र, निजी हाथों में कैद होती स्वास्थ्य सेवाएँ एवं मानसिक स्वास्थ्य  सेवा प्रदाताओं की भारी कमी जैसे कई कारक जिम्मेवार हैं।

                पूंजीवादी व्यवस्थाओं ने हर क्षेत्र की तरह विज्ञानं व सम्बध्द क्षेत्रों को भी अगवा किया हुआ है जिसके चलते बीमारियों के जैविक व खास तौर पर वंशानुगत कारकों को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। स्वास्थ्य के सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक निर्धारकों को चिकित्सा शिक्षा से ही दरकिनार कर दिया जाता है। इसके चलते लोगों को यह बताया जाता है कि यदि वे बीमार हुए हैं तो इसमें उनके देश व दुनिया की सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक संरचनाओं का कोई योगदान नहीं बल्कि उनके अपने भीतर के रसायनजनित विकृतियों  या वंशानुगतता का परिणाम हैं उनकी बीमारियाँ। इनके  उपचार व रोकथाम के तौर पर यह प्रचारित किया जाना लाजिमी है कि सिर्फ और सिर्फ डाक्टर व दवा ही काम आते हैं बाकी सब बेकार है। यह अब बहस के परे है कि आर्थिक असमानताओं व अस्थिरता की स्थितियों का सबसे ज्यादा खामियाजा वे ही उठाते हैं जो गरीबी की रेखा से नीचे बसर करते हैं व हमारे समाज में संवेदनशील वर्ग के बतौर जाने जाते हैं। विभिन्न शोधों व अधययनों ने दसियों हजार बार यह साबित किया है कि अभावग्रत लोग गहन किस्म के लम्बे दौर वाले मानसिक तनावों व अवसाद का सामना करते हैं। माता-पिता पर आर्थिक संकट से उपजने वाले प्रभावों  के नतीजे उनकी संतानों पर पीढ़ियों की विकृतियों के रूप में उभरते हैं।  ऐसे माहौल में पलने-बढ़ने वाले बच्चे शारीरिक व मानसिक स्तरों पर अल्पविकसित ही रह जाते हैं और उनमें संज्ञानात्मक, भावनात्मक व शारीरिक स्तरों पर कई किस्म की समस्याएं घर कर जाती हैं। बेरोजगारी, गरीबी व परिवारों के टूटते जाने से डिप्रैशन, आत्महत्या, शराबखोरी, आपराधिक व्यवहार एवं कई अन्य व्यावहारिक समस्याएं जन्म लेती हैं। दूसरी तरफ ये विकृत आर्थिक व्यवस्थाएं समाज में कई रिक्तियां पैदा करती हैं। पूंजी का असमान वितरण लालच एवं अतार्किक महत्वाकांक्षाओं को उभारता है जिसके चलते उच्च-मध्यम वर्गों के लोगों में भी अव्यवहारिक एवं अतार्किक किस्म की अवसादपूर्ण सोच जन्मती है और वे भी डिप्रैशन या अन्य किस्म की मनो-समस्याओं के दुश्चक्र में फंस जाते हैं।  इसलिए वह चाहे मानसिक बीमारी हो अथवा शारीरिक, जब तक उसके सामजिक व अन्य निर्धारकों को समान महत्व देते हुए रोकथाम के गंभीर उपाय नहीं किये जाते तब तक सभी के लिए स्वास्थ्य कि संकल्पना एक सपना ही रहेगी।

                
? राहुल शर्मा