संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

थोक व्यापारी भी रिटेल में

एफडीआई के पक्ष में?

? डॉ. सुनील शर्मा

                गिरिधर काबरा तुअर दाल का थोक कारोबार करते हैं। इनका कहना है कि बाजार में दालों के फुटकर और थोक दामों में भारी अंतर चलता है। खुदरा व्यापारी एक किलोग्राम दाल पर बीस रूपये तक का मार्जिन उपभोक्ता से वसूलते हैं।अगर दालों के दाम में गिरावट आती है तो थोक के दाम तो तुरन्त कम करने पड़ते हैं लेकिन खुदरा दाम काम नहीं होतें हैं इस तरह खुदरा व्यापारी आम आदमी की जेब काटते रहते हैं बदनाम होती है सरकार! काबरा का मानना है कि फुटकर यानि खुदरा बाजार में एफडीआई के आने से थोक और खुदरे के दामों में भारी अंतर की बात खत्म होगी और दाम घटने का तत्काल लाभ उपभोक्ता को मिलना तय है क्योंकि संगठित और बड़े आकार के बाजार खुली लूट नहीं कर सकते हैं। काबरा यह भी कहते हैं कि रिटेल एफडीआई से उन जैसे थोक व्यापारियों को एक बड़ा बाजार मिलने वाला है जिससे उनका फायदा बढ़ना तय है। हीरा सिंधी मसालों के थोक व्यापारी हैं वो भी इस बात से सहमत है कि रिटेल मे एफडीआई से उपभोक्ता को फायदा होगा और वो फुटकर व्यापारियों की लूट से बचेगा। हीरा भाई उदाहरण देकर बतलाते हैं कि  अप्रेल में मखाना के थोक रेट छह सौ रूपये प्रति किलो तक हो गए थे जो अब घटकर आधे रह गए हैं लेकिन फुटकर किराने वाला अब भी उॅची कीमत पर ही मखाना बेंच रहे हैं। हीरा भाई बतलाते हैं कि मसालों के मामले में उपभोक्ता की समझ कम ही होती है जिसका फायदा फुटकर व्यापारी जमकर उठाते है। उपभोक्ता को न तो इनके थोक रेट के विषय में ज्यादा जानकारी होती है और न ही क्वालिटी का ज्ञान? वह पाव आधा किलो की खरीद के लिए व्यापारी से बहस भी नहीं करता है। जबकि थोक व्यापारी बहुत ही कम मार्जिन पर मसाले बेचता हैं तथा दाम घटने पर तुरन्त ही इसका फायदा ग्राहकों को देता है। ज्ञानी जैन भी मसालों के थोक व्यापारी है और वो हीरा सिधीं की बात से सहमत हैं इनका भी कहना है कि खुदरे का कारोबार करने वाले धाना, हल्दी,जीरे और हींग जैसे सामान पर दूहरा मार्जिन बसूलते हैं और इनके थोक के रेट और फुटकर रेट में कहीं से मेल नहीं बैठता हैं, आप बाजार में दस दुकानों पर जाइए लगभग हरेक पर इनके दाम अलग मिलेगें। अगर आप अधिक दाम का हवाला देतें हैं तो व्यापारी अच्छी क्वालिटी होने की बात करतें हैं जिसकी काट आम उपभोक्ता के पास नही हैं। जैन का भी मानना है कि रिटेल में एफडीआई उपभोक्ता के हित में है और इसका विरोध सिर्फ वोट बैंक का मामला है।

                महेन्द्र चावल वाले चावल और मैदा के थोक व्यापारी हैं उनका भी मानना है कि रिटेल में एफडीआई उपभोक्ता और थोक व्यापारियों के हित में है।वो चावल के दामों संदर्भ में बतलाते हैं कि पिछले साल चावल के थोक दामों में हजार रूपये क्विंटल तक की गिरावट आई थी लेकिन आम उपभोक्ता को मॅहगें में ही चावल खरीदने पड़े। वो बतलाते हैं कि मैदा के थोक और फुटकर दाम में   दस रूपये प्रति किलोग्राम तक का अंतर आम हैं लेकिन हमारा मार्जिन फिक्स रहता है। आगें वो बतलातें हैं कि पिछले माह के मुकाबले खाद्य तेल के दामों में दस रूपये प्रति किलो ग्राम की गिरावट है लेकिन खुदरें में दाम वही चल रहें हैं। फल के थोक व्यापारी अहमद भाई बतलाते हैं कि आप भले ही मौसम्मी साठ रूपया खरीदतें हैं मगर हम तो पन्द्रह से बीस रूपयों किलो ही बेंच रहें है। सब्जियों के मामले में भी हालात कुछ ऐसे हैं कि नवीं मुम्बई के अत्याधुनिक माल में भोपाल के किसी ठेले वाले से सस्ती दर पर  मिलना तय है।

               इस तरह थोक व्यापार से जुड़ा वर्ग रिटेल में एफडीआई को उपभोक्ता हितैषी तथा बाजार को बढ़ावा देने वाला कदम मान रहा है। जिसका फायदा सबको होगा, रिटेल में एफडीआई और संगठित क्षेत्र के आगमन से निश्चित फुटकर व्यापारियों की अधिक मार्जिन लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगना तय है। और बाजार में जो भी उपभोक्ता पर विश्वास कायम कर व्यापार करेगा उसकी दुकान माल के सामने भी शान से चलती रहेगी। इस संदर्थ में म.प्र. के एक कस्बे में फ्टकर के व्यापारी राठी बतलाते है कि उनकी दुकान पर ग्राहकों की लगातार भीड़ रहती हैं क्योंकि उनके रेट शहर मे सबसे कम रहतें हैं वो एक निश्चित मार्जिन पर ही सामान बेचतें है और ग्राहक भी कस्बे में खुले एक रिटेल स्टोर की बजाए उनकी दुकान को प्राथमिकता देते है।

               रिटेल में एफडीआई के विरोध करने वाले इसे बेरोजगारी पैदा करने वाला कदम घोषित कर रहें है। इनका कहना है कि मंडी व्यवस्था के अंतर्गत किसान के अलावा संग्राहक, अढ़ातिया, थोक विक्रेता, खुदरा व्यापारी और उपभोक्ता का अस्तित्व रहता है परंतु आधुनिक रिटेल मार्केट में सिर्फ किसान स्टोर और उपभोक्ता हैं बांकी संग्राहक अढ़ातिया, थोक विक्रेता और खुदरा व्यापारी ये सभी गायब  हो जाएॅगे है। प्रश्न यह है कि जिस देश की कुल आबादी में अस्सी फीसदी किसान है और उन्हें बाजार में जगह मिलती है तो यह व्यापक हित हुआ या अहित? वास्तव में यह किसानों की कमाई पर डाका डालने वाले दलालों को समाप्त करने वाला कदम हैं। खुदरे व्यापारियों की बेरोजगारी की बात है तो यह भी सत्यता से परे है। आज से बीस साल पहले बाजार में रेडियो की बड़ी बड़ी दुकानें हुआ करती थीं लेकिन अब वो बंद हो गई है तो क्या ये दुकानदार बेराजगार हुए? नहीं बल्कि आज उनके स्थान पर टेलीविजन और मोबाइल जैसे अत्याधुनिक संचार उपकरणो की बड़ी बड़ी दुकानें है और उन्हें संचालित करने वाले उन्हीं पुराने दुकानदारों के परिजन है जो उनसे ज्यादा कमाई कर रहें। वास्तव में रिटेल के बहाने देश में मुद्रा का प्रसार बढ़ेगा जो रोजगार के नए मार्ग प्रशस्त करेगा।

                
? डॉ. सुनील शर्मा