संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

आर्थिक सुधारों पर हल्ला गैरवाजिब

? नीरज नैयर

                र्थिक सुधारों को लेकर सरकार जिस गंभभता और प्रतिबध्दता से आगे बढ़ रही है वो काबिले तारीफ है। सब्सिडी खर्च घटाना,डीजल के दाम में इजाफा,रिटेल और बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी जैसे फैसले ऐसे वक्त पर लिए गए जब हर कहीं से विरोध के स्वर सुनाई दे रहे थे। इससे पहले तक सरकार ने जब भी इस दिशा में कदम बढ़ाने का प्रयास किया गठबंधन की मजबूरियों ने उसकी राह रोकी। सबसे यादा ममता बनर्जी के विरोध का उसे सामना करना पड़ा, मगर अब वो इस सब से आजाद है। हालांकि बाहरी तौर पर यानी विपक्ष का विरोध अब भी बरकरार है। वैसे देखा जाए तो विरोध करना विपक्ष की आदत बन गई है।

               आमतौर पर विपक्ष में बैठी पार्टियों को सरकार के हर फैसले में खामिया नजर आती हैं, लेकिन भाजपा का रुख बेहद आर्श्चचकित करने वाला है। वो उन फैसलों का भी विरोध कर रही है जिनकी नींव उसी के कार्यकाल में तैयार की गई। मसलन, बीमा और पेंशन क्षेत्र में एफीडीआई का प्रस्ताव राजग सरकार में रखा गया। इतना ही नहीं रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर भी तत्कालीन सरकार ने माथा-पच्ची की थी। अब जब यूपीए वही काम कर रही है तो उसे बुराई नजर आ रही है। भाजपा शायद ये भूल गई है कि विपक्ष की भूमिका महज हो-हल्ला या वॉकआउट करने तक ही सीमित नहीं है। देश हित में अगर कुछ हो रहा है तो उसकी प्रशंसा भी की जानी चाहिए। कुछ ऐसा ही भाजपा ने सेतुसमुद्रम परियोजना पर किया था, पहले उसने खुद योजना का खाका खींचा और सरकार गिरते ही राम की दुहाई देने लगी। तेल की कीमतों में इजाफे पर भाजपा नेता हर बार बस यही दलील देते नजर आते हैं कि हमारे वक्त पेट्रोल-डीजल के दाम इतने थे और अब इतने हो गए हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि तब और अब की कीमतों में जमीन आसमान का अंतर है, लेकिन क्या तब और अब के हालातों को नजरअंदाज किया जा सकता है। उस वक्त न तो अंतरराष्ट्रीय और न घरेलू स्तर पर इतनी आर्थिक जटिलताएं थीं। पिछले कुछ वक्त में ही वैश्विक बाजार में सबकुछ महंगा हुआ है,ऐसे में इसका असर भारतीय बाजार पर पड़ना लाजमी है। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही है,अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेसिंया हमारी रेटिंग घटाकर इसका नमूना भी पेश कर चुकी हैं। तबीयत नासाज हो तो कड़वी दवाईयां खानी ही पड़ती हैं और दवाई कोई शौक के लिए नहीं खाता। अफसोस की विपक्ष को ये बात समझ नहीं आती। सरकार की आय के स्त्रोत सीमित हैं और खर्चे बेशुमार।

                 मोटे तौर पर देखा जाए तो सरकार की आय के तीन प्रमुख साधन हैं, सरकारी संस्थाओं और परिसंपत्तियों से आय, सेवाओं एवं उत्पादों से आय और तीसरा टैक्स से आय। इनमें से एक बड़ा हिस्सा हर साल सब्सिडी के तौर पर सरकार को खर्च करना पड़ता है,आबादी के बढ़ते बोझ के चलते खर्चे के भार में भी इजाफा होता जा रहा है। नतीजतन आर्थिक सुधार की परियोजाएं परवान चढ़ने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। रसोई गैस पर सब्सिडी कम करना आम आदमी के लिए कष्टदायक जरूर है,लेकिन आर्थिक नजरीए से देखें तो ये फैसला बिल्कुल सही है। अगर आज कुछ नहीं किया गया तो कल इससे भी यादा कठोर कदम उठाने होंगे और वो स्थिति हर मायने में भयानक होगी। जहां तक बात एफडीआई की है तो नकारात्मक के साथ-साथ इसके सकारात्मक पहलुओं को भी समझने की जरूरत है। विपक्ष या दूसरे दल जो कुछ बता रहे हैं वो पूरा सच नहीं है। कहा जा रहा है कि रिटेल में विदेशी निवेश से सैंकड़ो लोग बेरोजगार हो जाएंगे, लेकिन इससे पैदा होने वाले रोजगारों की बात कोई नहीं कर रहा। संभव है शुरुआत में कुछ लोगों को गुजर-बसर के लिए संघर्ष करना पड़े,मगर बाद की स्थिति उनके लिए भी सुखदाई होगी। यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, जब कंप्यूटर युग ने हमारे दरवाजे पर दस्तक दी तो उसका भी ऐसे ही विरोध हुआ। तथाकथित संगठनों ने इसे रोजगार निगलने वाला दैत्य करार दिया, उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज सपा मुखिया मुलायम सिंह भी कंप्यूटर की मुखालफत करने वालों में शमिल थे। या कह सकते हैं, अभी भी हैं। पार्टी की विचारधारा में जो बदलाव हुए हैं वो अखिलेश यादव ने किए हैं, मुलायम ने नहीं। विलायत से पढ़कर लौटे अखिलेश इस बात को अच्छे से समझते हैं कि बगैर कंप्यूटर के विकास की रफ्तार नहीं बढ़ाई जा सकती। कम ही लोग जानते होंगे कि 1987 में केरल की वाममोर्चा सरकार ने बाकायदा एक आदेश जारी कर सभी सरकारी दफ्तरों में कंप्यूटर की खरीद पर रोक लगा दी थी। अगर उस वक्त विरोध के आगे कंप्यूटराइजेशन को रोक दिया गया होता तो क्या आज आम भारतीय तकनीकि संपन्न बन पाता।

               कंप्यूटर ने भले ही कुछ लोगों का काम कम किया, लेकिन रोजगार के कई नए अवसर भी पैदा किए। ये भारत के कंप्यूटर ज्ञान का ही प्रभाव है कि अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक सब भयभीत रहते हैं। एक अनुमान के मुताबिक कंप्यूटर क्षेत्र में हर साल ढाई से तीन लाख नौकरियां पैदा होती हैं। भारत आईटी हब के तौर पर विकसित हो चुका है। सोचने वाली बात है कि विदेशी किराना स्टोर्स अपने साथ हजारों लोगों का स्टाफ लेकर तो आएंगे नहीं, उन्हें यहीं से स्टाफ का चयन करना होगा। वो यहीं से सामान खरीदेंगे और यहीं बेचेंगे, इससे होगा केवल इतना ही गुणवत्तता में सुधार आएगा। इससे अगर किसी को नुकसान होगा तो मिलावटखोरों और बिचौलिया बनकर मुनाफा कमाने वालों का। लिहाजा विरोध का बिगुल बजाने से पहले सभी पक्षों पर गौर फरमा लिया जाए तो बेहतर होगा। सरकार जो कुछ कर रही है, उसकी प्रशंसा होनी चाहिए, क्योंकि यही कदम देश का बेहतर भविष्य निर्धारित करेंगे।

? नीरज नैयर