संस्करण: 15 अक्टूबर-2012

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के जनाधार में हुआ इजाफा?

? राजेन्द्र जोशी

       त्ता के खिलाफ मध्यप्रदेश में कांग्रेस के महाघेराव से एक बात तो उभरकर सामने आ गई है कि जिस कांग्रेस पार्टी की छवि धूमिल करने के लिए सत्तारूढ़ राजनैतिक पार्टी द्वारा जो भी हथकंडे शुरू किए गये उन हथकंडों, साजिशों और आरोपों का उसे मुंहतोड़ जवाब दे दिया गया है। इस महाघेराव से राजनैतिक विश्लेषणकर्ताओं के सामने यह मुद्दा साफ हो गया है जिसमें माना जा रहा था प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। मध्यप्रदेश कांग्रेस के बारे में यह एक आम राय बनाने की कोशिश कि,पार्टी का जनाधार कम होता जा रहा है,झूठा और बेबुनियाद सिध्द होता चला जा रहा है। राजनैतिक पार्टियों के अपने-अपने रणनीतिकार होते है और वे अपनी पार्टी को टिनोपाल से धुली बतानें के लिए नकली वाशिंग पाउडर का इस्तेमाल करने की सलाह देते रहते हैं।

               मध्यप्रदेश कांग्रेस संगठन के खिलाफ जब कोई आरोप लगाये जाते हैं या फिर कोई बुराई ढूंढी जाती है तो केवल इसी मुद्दे को हवा दी जाती है कि संगठन के वरिष्ठ नेताओं में समन्वय नहीं है। सब आपस में एक दूसरे की टांग खिंचाई में लगे रहते हैं। लेकिन जब इन आरोपों पर से पर्दा उठ जाता है तो सब स्थिति सामने आ जाती है। फैलाया जाता है कि हर छोटा बड़ा नेता अपने आपको नम्बर पर आना चाहता है। नम्बर वन पर आने की होड़ तो राजनैतिक नेताओं में तब लगती है जब पार्टी उस संवैधानिक स्थिति में हो जिसके जरिए पार्टी अपने नेताओं को नंबर एक-दो का दर्जा दे सके। जब किसी पार्टी में यह संवैधानिक स्थिति ही नहीं है तो किस लोभ, लालच या महत्वकांक्षा में फंसकर पद लोलुपता के पीछे वह भागेगा। एक तरफ तो प्रदेश भर में सत्तारूढ़ दल द्वारा कांग्रेस के भविष्य को लेकर टीका टिप्पणियां की जा रही है, कि तीसरी बार भी उनकी पार्टी सत्ता में आयेगी, दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी से भय भी लग रहा है कि कहीं आरोपों से घिरी सत्ता के खिलाफ कांग्रेस के नेतागण एक न हो जाय।

               दरअसल नज़र दौड़ाई जाय तो यह लगता है कि नंबर वन और नंबर दो का झगड़ा तो सत्तारूढ़ दल में ही संभव है। वह इसलिए कि सत्ता के पास ग्लैमर होता है, पद होता है, अधिकार होता है, नियुक्तियां पदस्थापनाओं के जरिए श्रेय और वाहवाही मिलने के अवसर होते हैं। इसलिए ऊपर से तो नहीं दिखती किंतु भीतर ही भीतर सत्ता और संगठन का रस सेवन करने की लालसा विपक्ष के बजाय पक्ष वालों में ज्यादा होता है। इस तरह के इस सेवन के इच्छुओं में सत्तारूढ़ दल के नेताओं के बीच खींचतान जितनी ज्यादा चल रही है उतनी कांग्रेस के नेताओं में नहीं।

              वैसे, राजनीति के क्षेत्र में कितना भी फैलाया जाय कि प्रदेश में कानून व्यवस्था बेहतर है, चारों तरफ विकास ही विकास हो रहा है यह केवल सत्तारूढ़ दल के नेताओं द्वारा फैलाया हुआ भ्रमजाल है जबकि कोई ऐसा दिन नहीं जाता,जिस दिन आम नागरिक को थोड़ा बहुत सुकूल मिल जाय। अपराधों के दिल दहलाने वाले आंकड़ों के बिना सुबह-शाम के अखबारों में कुछ होता ही नहीं है। प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा अन्य प्रचार तंत्र हकीकतें उगलते रहते हैं किंतु न तो सत्ता को इसमें कोई लेना होता है न ही संगठन को। आम जनता की भावनाओं और संवेदनाओं के साथ रात-दिन खिलवाड़ हो रहा है। माना कि सरकारें वे ही कामयाब मानी जाती है जो अपने आलाकमान के नेताओं के सुरगान में ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेती है और अपनी कमजोरियों, गलतियों, चालबाजियों और झूठ की हकीकतों से आम लोगों को अनजान बनाये रखना चाहती है।

               ऐसे में जो हालात बन जाते है, वे यही है कि आम जनता सत्ता की जमीनी हकीकतों से अनजान बनाई रखी जाती है। जनता के आगे वही पेश किया जाता है जिसमें सरकार को चमकदार दिखाया जाता है। खुद अपने मुंह से अपनी तारीफ कर लो, अपनों से ही पीठ ठुकवा लो, नारे लगवा लो, कुछ करो न करो बस दावे ठोंकते जाओ, ये भी मत देखों कि खजाने में पैसा है भी या नहीं, घोषणाऐं और आश्वासन देते रहो, स्वाभाविक है कि इन घोषणाओं का उद्देश्य होता हैं तालियां पिटवाना। तालियों की गड़गड़ाहटों और जयघोष और विकास के टेबुली नारों से अपनी छाती फुलाते रहो। उनके पास झूठ, फरेब और धोखेबाजी के इतने अधिक पैतरे हैं जिन्हें चुनाव के अवसर पर आजमा कर उन्हें वैतरणी पार होने का दंभ जो है।

               जनता भी जानती-समझती है कि कांग्रेस के पास सत्ता भले ही नहीं हो किंतु उसके पास सत्ता के आरोपों का जवाब देने की व्यापक क्षमता है। महाघेराव से यह सिध्द हो गया है कि प्रदेश में सत्ता के प्रति आम जनता का मोहभंग होता जा रहा है। जहां तक कांग्रेस के समन्वय के अभाव की बात फैलाई जा रही थी उस पर लगाम जरूर लग गई है। गुटबाजी को लेकर जिन-जिन बड़े नेताओं के नाम गिना गिना कर सत्तारूढ़ दल कांग्रेस में फूट की हवा फैलाता रहा है, उन सभी नेताओं ने एकता को सर्वोपरि माना है जहां तक नंबर एक पोजीशन का सवाल है कांग्रेस हमेशा से कहती आ रही है कि उनकी पार्टी के नंबर वन का मुद्दा तब उठेगा जब निर्वाचन के बाद विधायकों की सहमति से आलाकमान आदेशित करता है। फिलहाल सत्तारूढ़ दल में नंबर वन पोजीशन का अंदरूनी मुद्दा चल रहा है।

? राजेन्द्र जोशी