संस्करण: 15 जुलाई -2013

तुम मुझे वोट दो-मैं तुम्हें खाना खिलाऊंगा

प्रलोभनों की घोषणाओं पर

उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी

? राजेन्द्र जोशी

                  त्ता पर काबिज रहने की तिकड़मबाजियों का कहीं अंत नहीं दिखाई देता। झूठे वायदों, घोषणाओं मुफ्त के प्रलोभनों और आश्वासनों के राजनैतिक पैतरों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी ने कई राजनैतिक दलों की चालों को मात दे दी है। कुछ राज्यों में विधनसभा के निर्वाचन के साथ ही 2014 की प्रथम तिमाही के बाद लोकसभा के चुनाव भी होने हैं। यही वह समय है जब राजनीति का माहौल उबाल पर देखा जाता है। वैसे तो निर्वाचन के बाद पांचों वर्ष तक राजनैतिक दलों के कदम बिना राजनीति के सहारे आगे नहीं बढ़ पाते हैं किंतु चार वर्ष गुजरने के बाद अंतिम पांचवा साल कुछ ज्यादा ही वोटरों को पटाने में गुजरता है। मतदाताओं को अपनी गिरफ्त में बांधे रखने के प्रयास तो सदैव ही होते रहते हैं। मतदाताओं से अपनी अपनी पार्टियों के लिए मत कबाड़ने के लिए उनसे वचन भी ले लिए जाने लगे हैं। एक तरह से देखा जाय तो मतदाताओं के साथ सौदेबाजी भी की जाने लगी है। महान क्रांतिकारी नेता सुभाषचन्द्र बोस ने नारा दिया था 'तुम मुझे खून दो-मैं तुम्हें आजादी दूंगा' की तर्ज पर अब राजनीति में यह नारा जमीनी रूप ले रहा है' तुम मुझे वोट दो-मैं तुम्हें खाना दूंगा।' यह केवल नारा ही नहीं है बल्कि एक हकीकत के रूप में समाज के सामने है।

                यह मीडिया-प्रधान युग है और इस युग में राजनीति, सेवा, उद्योग या व्यवसाय क्षेत्र की किसी भी तरह की तिकड़में मीडिया से छुपी नहीं रह सकती। निर्वाचनों के दौरान और उसकी पूर्व बेला में जब राजनैतिक दल अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुट जाते हैं तो वे मतदाता के प्रति अपना नजरिया बदल देते हैं। वहीं मतदाता जो पिछले चार वर्ष तक नेताओं द्वारा नजरअंदाज किया जाता रहता है, अंतिम पांचवे वर्ष में उन्हें भगवान का अवतार दिखने लगता है,माई-बाप दिखने लगता है। वह नेता जो सत्तासीन रहकर अपने अहम के आडम्बर में रहता है वहीं नेता मतदाताओं की चरणवंदना करते हुए भी तस्वीरों में देखा जा सकता है। सत्ता के चस्के में जिस ग्लेमर से उसका जीवन गुजरता है उसे जारी तभी रखा जा सकता है जब मतदाताओं की मेहरबानी पाने का वह हकदार बनेगा। इस दृष्टि से मतदाताओं को वायदों,आश्वासनों और प्रलोभनों की चटनी चटाने के लिए उसे कई तरह की हरकतों को अंजाम देने की जरूरत पड़ती है।

                वह जमाना गुजर चुका जब सार्वजनिक तौर पर या चुपके-चुपके मतदाता को खरीदने के धंधे हुआ करते थे। अब ते रात के घनघोर अंधेरे में भी एकांत में किसी मतदाता से सौदेबाजी होती है तो फौरन वह न जाने कब और कैसे मीडिया की पकड़ में आ जाती है। राजनैतिक बुराइयां खुलकर सामने आ जाती है। किस क्षेत्र में किस दल के किस नेता ने कितने पैसे बांटे, कितनी साड़ियां और कपड़े वितरित किए, किसको लक्जरी की वस्तुएं दान में दी, सब बातें मीडिया में आ जाती है। राजनैतिक दल सत्तासीन हो तो फिर क्या पूछना ! पांचों ऊंगली घी में और सिर कढ़ाई में होता है। ऐसे ऐसे जस्टिफिकेशन निकाल लिए जाते हैं कि शासकीय धन का उपयोग राजनीति के लिए होने लगता है। निर्वाचन की पूर्व बेला में सरकारी खजानों का तो दिवाला ही निकाल दिया जाता है। घोषणायें और वायदों की राशि का जब टोटल किया जाता है तो वह सरकार के एक साल के पारित बजट से कई गुना अधिक की राशि होती है। साइकिलें बांटना, लेपटाप की घोषणायें करना मतदाताओं से सहानुभूति अर्जित करने के लिए बिजली, पानी और विभिन्न तरह की संपत्तियों पर लगने वाले टेक्स माफ करना इस दौर की राजनीति की अनिवार्य विशेषतायें हो गई हैं।

                 हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से राजनैतिक दलों में हड़कम्प मच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक तीखी टिप्पणी में कहा है कि राजनैतिक दलों द्वारा मुफ्त सामान बांटने के वादों से निष्पक्ष चुनाव की नींव हिल जाती है। कोर्ट ने ऐसे वायदों प्रलोभना पर रोक के लिए चुनाव आयोग से गाइडलाइन तय करने की अपेक्षा की है। कोर्ट ने यह सुझाव भी दिया है कि राजनैतिक दलों के चुनाव पूर्व के घोषणा पत्र आचार संहिता का हिस्सा होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट यह जरूर मानता है कि मौजूदा कानून के मुताबिक इस तरह की घोषणाऐं गैरकानूनी नहीं है। इसे भ्रष्ट आचरण भी नहीं कहा जा सकता लेकिन मुफ्त सामान देने के वायदों से निश्चित तौर पर मतदाता प्रभावित हो जाते हैं और इसका असर निष्पक्ष चुनाव पर पड़ता है। चुनाव पूर्व राजनैतिक दल सत्ता पर पकड़ बनाये रखने के लिए लुभावने वायदे करने लगते हैं। कई दलों ने जीतने पर मुफ्त में लेपटॉप, टी.वी., मिक्सर-ग्राइंडर, पंखे, थालियां और अनाज बांटने के वायदे किए हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी पर कार्यवाही होती है तो निश्चित ही प्रलोभनों की झड़ी रूकेगी और निष्पक्ष चुनाव का रास्ता साफ होगा।                  

? राजेन्द्र जोशी