संस्करण: 15 जुलाई -2013

झूठी मुठभेड़ के आरोप में गुजरात के अनेक पुलिस अधिकारी थानों के स्थान पर जेल में हैं

?  एल.एस.हरदेनिया

                शायद ही देश के इतिहास में ऐसा हुआ हो जैसा कि गुजरात में हो गया है। गुजरात के एक दर्जन से ज्यादा वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या तो जेल में हैं या उनके विरूध्द गम्भीर अपराध के मुकदमें चल रहे हैं। ये एक दर्जन अधिकारी हैं-डी.जी. बंजारा, इशरत जहां, सोहराबुद्दीन और सादिक जमाल, मुठभेड़ के सनसनी खेज मामले के संबंधा में जेल में हैं। इशरत जहां मुठभेड़ के एक और आरोपी का नाम जी.एल. सिंघल है, इनका पद पुलिस अधीक्षक का है। एक और पुलिस अधीक्षक हैं तरूण बारोट इनके ऊपर भी इशरत जहां, सादिक जमाल झूठे मुठभेड़ का आरोप है। के.आर. कौशिक जो अवकाश प्राप्त पुलिस महानिदेशक हैं, इनके ऊपर भी इशरत जहां झूठे मुठभेड़ का आरोप है। आई.बी. अधिकारी प्रमोद कुमार, ये भी इशरत जहां, सादिक जमाल केस में आरोपी हैं। पुलिस अधीक्षक जे.जी. परमार भी इशरत जहां मुठभेड़ के आरोपी हें। पुलिस अधीक्षक राजकुमार पाण्डियन, सोहराबुद्दीन मुठभेड़ केस में फंसे हुए हैं। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पी.पी.पाण्डेय भी इशरत जहां मामले के आरोपी हैं। पुलिस अधीक्षक एन.के. अमीन भी इशरत जहां और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के आरोपी हैं। पुलिस अधीक्षक अभय चुधादासम्मा, ये भी सोहराबुद्दीन मामले के आरोपी हैं। पुलिस अधीक्षक दर्जे के एक और अधिकारी विपुल अग्रवाल भी सोहराबुद्दीन, तुलसीराम मुठभेड़ के आरोपी हैं।

                इतनी बड़ी संख्या में शायद ही किसी मामलें में इतने वरिष्ठ अधिकारी आरोपी बनाये गए होंगे। इस संबंधा में कुछ लोगों का आरोप है कि पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी से पुलिस के साहस और गुणवत्ता में कमी आती है। इससे पुलिस निर्भयता से काम नहीं कर पाती है। यह तर्क उस समय सही प्रतीत हो सकता है जब, मुठभेड़ में हुई हत्याएं उचित हों। इस तरह की मुठभेड़ आत्मरक्षा में की गईं हों या निर्दोष व्यक्तियों की जान बचाने के लिए। परन्तु 2002 से 2007 के बीच में जितनी भी हत्याएं मुठभेड़ों में हुई हैं उनका यदि विश्लेषण किया जाए तो, वास्तविकता कुछ और ही प्रगट होती है। पहली बात तो यह है कि इन सभी मुठभेड़ों में अल्पसंख्यक मुस्लिम ही मारे गए। एक तथ्य यह है कि 2002 के बाद, जो भी घटनाएं हुईं उनको लेकर गुजरात में जो प्रचार किया गया उसका एक मात्र उद्देश्य हिन्दुओं को भड़काना था ताकि, चुनाव में इसका लाभ मिले। एक तथ्य यह भी है कि वे समस्त पुलिस अधिकारी जो आवश्यकता से ज्यादा मोदी सरकार के प्रति वफादार थे उन्हें 2002 के दंगों के बाद पुरस्कृत किया गया। एक तथ्य यह भी है कि वे अधिकारी जिन्होंने दंगे के दौरान लापरवाही बरती या कर्तव्यपरायणता नहीं दिखाई, उनमें से एक भी न तो गिरफ्तार किया गया और न ही उन्हें सजा दी गई। न सिर्फ 2002 के दंगों के दौरान बल्कि बाद में भी जो स्थितियां निर्मित हुईं उनमें भी इस तरह के अधिकारियों के विरूध्द रंचमात्र कार्यवाही नहीं की गई। गुजरात के भीषण नरसंहार के लिए सिर्फ एक मुख्य आरक्षक को दोषी पाया गया। उसके अतिरिक्त गुलवर्ग सोसायटी के हत्याकांड में एक पुलिस इंस्पेक्टर की गिरफ्तारी की गई।

                इसके बाद, 2002 के मध्य में मोदी सरकार ने इस तरह के अधिकारियों की पहचान की जो नियम, कानून और परंपराओं की परवाह किए बिना अपनी वफादारी का सबूत देते रहे। 2002 के बाद जब चुनाव का समय आया तो भारतीय जनता पार्टी और गुजरात की सरकार की तरफ से यह प्रचारित किया गया कि गुजरात के पुलिस अधिकारी आतंकवादियों और जेहादियों के विरूध्द मुस्तैदी से कदम उठा रहे हैं। परन्तु उनके यह प्रयास सफल नहीं हुए। इस दरम्यान जो भी मुठभेड़ हुई उनका औचित्य भी गुजरात की सरकार नहीं बता पाई। गुजरात सरकार यह नहीं बता पाई कि जो लोग इस मुठभेड़ में मारे गए उनकी पृष्ठभूमि क्या थी, घटना के पहले उनकी तैयारी क्या थी, उनके पास क्या साधन थे, उनके पास सम्पर्क करने के कौनसे साधन थे, गुजरात सरकार यह भी नहीं बता पाई की मुठभेड़ में जो लोग मारे गए उनके बारे में क्या कोई गुप्त सूचनाएं गुजरात के गुप्तचर विभाग की तरफ से या केन्द्र सरकार के इन्टेलीजेंस ब्यूरो की तरफ से मिली थीं और यदि मिली थीं तो वे क्या थीं। इस तरह की मुठभेड़ों के बारे में, उनके संबंध में गुजरात पुलिस मैन्यूअल में विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं, परन्तु उन प्रावधानों के अन्तर्गत जांच नहीं की गई। यह भी नहीं बताया जा सका कि जो लोग मुठभेड़ में मारे गए उनका गुजरात के किन निवासियों से सम्पर्क या संबंध था। ये सब सवाल आर.बी. श्रीकुमार ने हिन्दू में प्रकाशित एक लेख में पूछे। आर.बी. श्रीकुमार गुजरात के पुलिस महानिदेशक रहे हैं।

              इशरत जहां मुठभेड़ कांड में जिन अधिकारियों के विरूध्द चार्जशीट दाखिल हो गई है उनके बारे में नरेन्द्र मोदी एवं भारतीय जनता पार्टी की तरफ से यह कहा जा रहा है कि ये सब सीबीआई का षडयंत्र है और सीबीआई इस मामले में कांग्रेस के इशारे पर गुजरात सरकार के अधिकारियों को परेशान कर रही है। नरेन्द्र मोदी ने यह बात गांधी नगर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कही। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि दिल्ली में किसी का भी राज स्थाई नहीं होता। मोदी अपने इस कथन से एक प्रकार से उन अधिकारियों को धामकी दे रहे हैं जिन्होंने इशरत जहां मामले में गुजरात के कुछ अधिकारियों के विरूध्द कार्यवाही की मांग की है। मोदी शायद यह कहना चाहते हैं कि जब हमारी सत्ता दिल्ली में कायम होगी तो हम सीबीआई के इन अधिकारियों से निपट लेंगे। मोदी शायद इस बात को भूल गए हैं कि इन मुठभेड़ों की जांच सीबीआई ने भारत सरकार के इशारे पर प्रारंभ नहीं की है, परन्तु सीबीआई को जांच करने का आदेश गुजरात हाईकोर्ट ने दिया था। दूसरी बात याद रखने की यह भी है कि अकेले इशरत जहां मामले में ही गुजरात के पुलिस अधिकारियों के विरूध्द चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है। इसके पहले भी दो मामलों में इस तरह की चार्जशीट अदालतों में दाखिल कर दी गई हैं। इनमें से एक मामले का संबंधा सोहराबुद्दीन, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति से मुठभेड़ में उनकी हत्या से है, और दूसरे मामले का संबंधा सादिक जमाल मेहतर की हत्या से है। ये संयोग की बात है कि बंजारा जो पहले से ही जेल में है उनका हाथ सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के अतिरिक्त सादिक जमाल से हुई मुठभेड़ से भी है। यहां उल्लेखनीय है कि गुजरात के मंत्री अमित शाह भी सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में आरोपी हैं, वे गुजरात के अभी हाल में संपन्न चुनाव के पूर्व तक जेल में थे। गुजरात चुनाव के पहले उन्हें जमानत पर छोड़ा गया है और इस समय वे भाजपा की महत्वपूर्ण पद पर पदस्थ हैं। उन्हें अभी हाल में उत्तरप्रदेश में पार्टी के अभियान का प्रभारी बनाया गया है। गुजरात में हुए मुठभेड़ों के संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि एक से ज्यादा मुठभेड़ों में बंजारे का हाथ पाया गया है। इससे इस बात का सबूत मिलता है कि ये मुठभेड़ एक षडयंत्र का हिस्सा थी क्योंकि कोई भी मुठभेड़ यकायक होती है षडयंत्र से नहीं। एक और महत्वपूर्ण बात है यह है कि इन मुठभेड़ों में जिन संदेहास्पद आतंकवादियों को मारा गया है उनके बारे में यह कहा जाता है कि वे नरेन्द्र मोदी और भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं की हत्या करना चाहते थे।

                  गुजरात के वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल सिन्हा जो कि इन मुठभेड़ों में मारे गए लोगों को कानूनी सहायता दे रहे हैं ने दावा किया है कि इन मुठभेड़ों का मुख्य उद्देश्य यह सिध्द करना था कि 2002 के दंगों का बदला लेने के लिए कुछ मुस्लिम आतंकवादी मोदी की हत्या करना चाहते हैं। और गुजरात की पुलिस इस तरह की गतिविधियों को एक क्षण भी सहन नहीं करेगी, इसलिए इन मुठभेड़ों में इन  आतंकवादियों को मार कर मोदी के विरूध्द किए गए षड़यंत्र को विफल किया है। 2002 से लेकर 2006 तक गुजरात में 21 मुठभेड़ें हुई हैं। यह एक समझने वाली बात है कि इन मुठभेड़ों के बाद अब मोदी की जिन्दगी को कोई खतरा नहीं रह गया है।

               आर.बी. श्रीकुमार कहते हैं कि इस तरह के अधिकारियं को उनकी सेवाओं के लिए गुजरात में पुरस्कृत किया गया है। उनकी पदस्थापना अच्छे पदों पर की गई है और अवकाश के बाद भी इस तरह के अधिकारियों को महत्वपूण उत्तरदायित्व सौंपे गए हैं। जिन लोगं ने मोदी सरकार के इशारे पर काम नहीं किया है उन्हें तरह-तरह से दंडित भी किया गया है। अनुभव बताता है कि, किसी भी अपराधी को अपना अपराध छिपाने में सौ प्रतिशत सफलता नहीं मिलती है। गुजरात में भी यही हुआ और मुख्यत: न्यायालयों के हस्तक्षेप के कारण और सीबीआई के समान संगठनों की भूमिका के कारण ये अधिकारी कानून की गिरत में आ चुके हैं। परन्तु अभी तक इन मुठभेड़ों के लिए राजनीतिक उत्तरदायित्व तय नहीं हो सका है। हो सकता है कि भविष्य में ऐसा हो सके। यदि होता है तो स्वयं नरेन्द्र मोदी इससे लम्बे समय तक अप्रभावित नहीं रह सकेंगे।

   
? एल.एस.हरदेनिया