संस्करण: 15 जुलाई -2013

भाजपा फिर रामभरोसे

?  सुनील अमर

                  भाजपा फिर अयोध्या लौटी है। ये भी कह सकते हैं कि लौटाई गयी है। डेढ़ दशक से अधिक समय तक राम को ठंढ़े बस्ते में डाले रहकर इधर-उधर भटकने के बाद उसे याद आया है कि धार्मिक कट्टरता के बिना उसका उध्दार नहीं। भाजपा के नये खेवैया नरेन्द्र मोदी और उनके सह-मल्लाह अमित शाह, दोनों ने अपनी दृष्टि साफ कर दी है। बीती छह जुलाई को अमित शाह ने अयोध्या पहुॅचकर भाजपाई कार्यकर्ताओं को अपने दिल का ई.सी.जी. दिखाते हुए बताया कि आज भी वहाँ राम मंदिर निर्माण का सपना बसता है। यहाँ मुँह उनका लेकिन शब्द मोदी के थे। हालॉकि उन्होंने यह नहीं बताया कि सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन इस मामले का फैसला होने के पहले कैसे उनकी पार्टी मंदिर बना सकती है। अमित शाह के जाने से वर्षों से सुसुप्त पड़े विश्व हिंदू परिषद के मुख्यालय अयोधया के कारसेवकपुरम् में एक बार फिर रौनक आ गई जहाँ उन्होंनें कार्यकर्ताओं को सम्बोधित किया। पार्टी की नयी सोच, नये खेवनहार तथा आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के केन्द्र बिंदु रहने की संभावनाओं के चलते ऐसा लग रहा है कि अयोधया का कारसेवकपुरम् एक बार फिर भाजपाई गतिविधियों का महत्त्वपू््ण स्थान होगा। पूरी संभावना है कि साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिशें यहाँ होंगीं।

                 असल में भाजपा इस मुगालते में हैं कि केंद्र की कॉग्रेस सरकार की रीतियों-नीतियों से लोग बहुत त्रस्त हैं और उनके पास भाजपा को चुनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। यही कारण है कि भाजपा में अब किसी भी प्रकार की शुचिता तथा चाल, चरित्र और चेहरे की बात नहीं की जाती। उन्हें लगता है कि सत्ता का यह पका आम तो अब उनकी झोली में आकर गिरेगा ही। ऐसा ही भाजपा को वर्ष 2004 के चुनाव पूर्व भी लग रहा था जब राजग नीत सरकार के मुखिया अटल बिहारी वाजपेयी ने इंडिया शाइनिंग की स्वकल्पना से अभिभूत होकर समय पूर्व चुनाव की घोषणा कर दी थी। अतीत को भूलना नहीं चाहिए लेकिन उसे बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह अपने से चिपकाए भी नही रखना चाहिए। भाजपा अपने जन्म से ही इतिहास जीवी रही है। दु:खद तो यह है कि वह भविष्य का उत्स खोजने के लिए भी अतीत में ही जाना चाहती है। भाजपा ने सर्वस्वीकार्य होने के लिए काँग्रेस बनना चाहा और कॉग्रेस बनने के लिए धर्मनिरपेक्षता का छद्म चोला भी ओढ़ने की कोशिश की। यह जो बताया जाता है कि भाजपा ने 17 साल तक 'जय श्री राम' को ठंढ़े बस्ते में रखा यह भाजपा की नहीं, उसके सहयोगी दलों की नकेल का कमाल था। मोदी को फ्रंट पर लाते ही भाजपा के कर्णधारों ने अपने नख-दंत पैने करने शुरु कर दिये हैं। वयोवृध्द नेता लालकृष्ण आडवाणी अपने सुदीर्घ राजनीतिक जीवन का सबसे दारुण अपमान झेलने के बाद अब इतिहास के तमाम राजनीतिक पन्ने खंगालने में लगे हैं। भाजपा के अंदर वे स्वयं भी इतिहास घोषित कर दिये गये हैं लेकिन यह उनकी अदम्य लालसा है कि वे अभी भी स्व. दीनदयाल उपाधयाय से लेकर पटेल और नेहरु तक तथा धारा 370 से लेकर अयोध्या के विवादित स्थान तक का विंहगावलोकन करने में लगे हैं। यकीन मानिए कि नागपुर ने उनकी महत्त्वाकांक्षाओं के चलते उन्हें पहले से ही उनकी सेल्फ स्टाइल्ड रथ यात्रा के लिए बरज रखा है नहीं तो देश को एक बार फिर सोमनाथ से अयोध्या तक की उनकी किसी लम्बी और हिंसक गतिविधि का भुक्तभोगी बनना पड़ता।

                सन् 1984 के दौरान देश में दो बड़ी घटनाऐं हुईं- अयोध्या विवाद में विश्व हिंदू परिषद का दखल तथा बहुजन समाज पार्टी का जन्म। भारतीय राजनीति पर इन दोनों घटनाओं का बहुत गंभीर असर पड़ा। एक तरफ हिंदू जनमानस को उनके आराधय देव श्री राम के नाम पर आलोड़ित-उद्वेलित किया गया तो दूसरी तरफ देश की अधिसंख्य दलित जनता को उसकी अस्मिता की याद दिलाने की शुरुआत हुर्इ्र। इन दोनों घटनाओं को अब तीन दशक होने को हैं तथा इससे हमारी चुनावी राजनीति में आमूल-चूल परिवर्तन आया। उस काल में पैदा हुए बच्चों में से अधिकाश आज खुद 10-5 साल के बच्चों के बाप होकर अपनी घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों से दो-चार हो रहे होंगें। अयोध्या में विहिप, भाजपा, संघ और इसके अन्य आनुषांगिक संगठनों ने मिलकर जो बड़ा आंदोलन चलाया उसमें सारी भागीदारी बाहरी लोगों की ही थी। स्थानीय लोग बहुत ही कम थे। यहाँ धयान देने योग्य तथ्य है कि आने वाले लोग बाहर के थे लेकिन उनकी वजह से तमाम तरह की तकलीफें उठाने वाले लोग स्थानीय थे। आज स्थिति यह है न तो पिछली बार की तरह लोग देश के कोने-कोने से आकर अयोध्या में इकठ्ठा होने पाएंगें और न स्थानीय जनता उनकी बदमाशियों को झेलेने को तैयार है। अयोध्या विवाद में स्वामित्व सम्बन्धी उच्च न्यायालय का फैसला आने के समय हमने इसे देख भी लिया है कि आज की युवा पीढ़ी की प्राथमिकता में मंदिर-मस्जिद का पचड़ा कहीं है ही नहीं।

                ऐसे में देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की ढ़ाई-तीन दशक पुराने और कड़वे अतीत को गले लगाने की घोषणा चिंतनीय है और इससे पता चलता है कि सोच-विचार के स्तर पर इस पार्टी के भीतर कितनी जबर्दस्त रिक्तता आ चुकी है। भाजपा अयोध्या मुद्दे पर साम्प्रदायिक खेल करके कुछ सीटें झटकना चाहती है तथा बाद में सत्ता लोभी छोटे दलों को साथ मिलाकर सरकार बनाने की कवायद। जदयू से 17 साल पुराना सम्बंध विच्छेद होने के बाद भाजपा का निष्कर्ष संभवत: यही है। इससे पता चलता है कि इतनी लम्बी राजनीतिक यात्रा तय करने के बावजूद उसमें लोकतांत्रिक परिपक्वता नहीं आई। उसकी हालत उस नौकर के समान है जो तमाम उम्र एक सरीखा काम करने के बाद भी अपने विवेक से कुछ नहीं कर सकता। बीते तीन दशक में देश की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ काफी कुछ बदल चुकी हैं और देश की जनता का मिजाज भी। ऐसे में यह नहीं लगता कि भाजपा आज की तारीख में अयोध्या में कोई बड़ी भीड़ इकठ्ठा कर 1992 जैसा आंदोलन करने में कामयाब हो जाएगी। कॉग्रेस का सहज विकल्प बनने के लिए भाजपा के पास एक अद्भुत अवसर है लेकिन उसके तमाम नेताओं के दिन-ब-दिन के कर्म उसे मुॅह छिपाने को विवश कर रहे हैं। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि पिछले लम्बे अरसे से भाजपा ने अपने ध्येय वाक्य 'चाल, चरित्र और चेहरा' का उद्बोधन करना छोड़ दिया है?

                आगामी लोकसभा चुनाव में देश में जैसा भी राजनीतिक माहौल हो लेकिन उत्तर प्रदेश में स्थिति यह लग रही है कि एक तरफ समाजवादी पार्टी का सरकारी झुनझुना तो दूसरी तरफ अपने निश्चित वोट बैंक को लेकर बसपा। अपने सर्वग्राह्य स्वभाव तथा लोककल्याणकारी कार्यक्रमों को लेकर काँग्रेस तो दूसरी तरफ मतिविभ्रम की स्थिति में ढ़ाई दशक पहले की हालात में पहॅुचती भाजपा। मौजूदा राजनीतिक हालात में केंद्र में लगातार दस साल तक सरकार चलाना वैसे भी एक उपलब्धि कही जा सकती है और हो सकता है कि जनता अब बदलाव की इच्छुक हो लेकिन देश का जो राजनीतिक दल अपने को इस बदलाव का नायक मानता है उसकी सोच भारत जैसे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सर्वथा प्रतिकूल है। बीती छह जुलाई को अयोधया जाकर भाजपा के यूपी चुनाव प्रभारी अमित शाह ने जो उद्गार व्यक्त किया है वह केंद्रीय सत्ता के दावेदार किसी राष्ट्रीय दल का नहीं बल्कि किसी स्थानीय और अवसरवादी दल का विचार ही लगता है।

? सुनील अमर