संस्करण: 15 जुलाई -2013

अब राजनीतिक संगठन हो चुका है आरएसएस...?

? विवेकानंद

                राष्ट्रीय स्वयं संघ यानि आरएसएस ने कभी यह स्वीकार नहीं किया उसका भारतीय जनता पार्टी के मामलों में देखल है। आएसएस के मौजूदा और पूर्व में जितने भी मुखिया रहे हैं वे गाहे-गवाहे यही कहते रहे हैं कि भाजपा और उसके अंदरूनी मामलों में आरएसएस का दखल नहीं। लेकिन,भाजपा की पैदाईश से ऐसा शायद कोई वक्त रहा हो जब आरएसएस के नीतिनियंताओं ने भाजपा नेताओं को और उसकी नीतियों को नियंत्रित न किया हो। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि भाजपा में चपरासी से लेकर और प्रधानमंत्री तक की नियुक्ति और चुनाव का निर्णय पर्दे के पीछे आरएसएस ही करता है। उसके ही परामर्श पर नीतियां और रणनीतियां तय की जाती हैं। इसका ताजा उदाहरण गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पीएम इन वेटिंग घोषित करने के लिए अमरावती में संघ चर्चा की खबरों में निहित है। अमरावती में हो रही बैठक में संघ सहित भाजपा से जुड़े वे सभी संगठन हैं जो खुद को सामाजिक कहते हैं लेकिन राजनीति में गहरी रुचि रखते हैं और उसका सुख भोगने से उन्हें कभी परहेज नहीं रहा है। इन सामाजिक संगठनों ने विशुध्द रूप से राजनीतिक प्रक्रिया यानि लोकसभा चुनावों पर बंद दरवाजे में बैठक की जिसमें करीब 175 स्वयंसेवक शामिल हुए। इसे लेकर मीडिया से दूरी बनाना तो जरूरी थी ही, लेकिन स्थानीय संघ पदाधिकारियों को भी दूर रखा गया। इस बैठक में चुनावों के लिए संघ की रणनीति और नीतियों पर विचार विमर्श किया। क्या यह राजनीति में सक्रिय भागीदारी नहीं है?

              इससे पहले नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव की कैंपेन कमेटी के अध्यक्ष बनाए जाने से लेकर लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफे के बाद उन्हें मनाने और आडवाणी व मोहन भागवत मुलाकात में लोकसभा चुनाव की रणनीति पर चर्चा राजनीति में संघ की रुचि को प्रदर्शित नहीं करता?आडवाणी को मनाने के वक्त तो स्वयं पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने ही कहा था कि आडवाणी जी की भागवत जी से बात हुई है उसके बाद आडवाणी माने। इसके बाद नागपुर में आडवाणी-भागवत मुलाकात के बाद आडवाणी ने कहा कि भागवत के साथ लोकसभा चुनाव को लेकर चर्चा हुई। इससे पहले नितिन गडकरी को लेकर संघ का जबदरस्त दखल लोगों ने देखा ही है। क्या यह सब राजनीति में भागीदार नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि यदि संघ भाजपा की राजनीति में इतने गहरे तक दखल रखता है तो फिर उसे स्वीकार करने में क्या परहेज है? क्यों खुद को सामाजिक संगठन बताकर जनता को बेवकूफ बनाने की नाकाम कोशिशों में लगा रहता है।

             दरअसल राजनीति से आएसएस का हमेशा द्वंद्व का रिश्ता रहा है। खाकी निक्कर पहने,सिर पर टोपी लगाए,डंडा पकड़ने वाले स्वयंसेवकों को राजनीति की चकाचौंध खूब रास आती रही है। और यह आज की बात नहीं है, शुरूआती वक्त से ही राजनीति स्वयंसेवकों को आकर्षित करती रही है। इसके लिए संघ ने पहला रास्ता निकाला जनसंघ की स्थापना का। जनसंघ बनाकर स्वयंसेवकों ने अपनी आकांक्षा पूरी की, लेकिन उन्हें वह प्राप्त नहीं हुआ जिसके लिए उन्होंने सारी कवायद की थी,लिहाजा जनसंघ को भंग कर दिया गया और भारतीय जनता पार्टी के नाम से नई संस्था का गठन किया गया। भाजपा के शुरूआती सभी सदस्य की संघी थे,और इस पर जनसंघ जैसा ठप्पा न लगे संभवत:इसी के चलते कुछ बाहर के लोगों को भी पार्टी में शामिल किया गया। हालांकि उनकी हैसियत पार्टी में क्या रही इसका उदाहरण गडकरी कांड के वक्त रामजेठमलानी,यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह के रूप में देखा गया। लेकिन फिर भी भाजपा में कुछ ऐसे लोगों ने अपना भविष्य चमकाने की कोशिश की जो संघ की पृष्ठभूमि से नहीं आते और कुछ लोग आज भी इसकी कोशिशों में लगे हुए हैं। संघ को लेकर उनसे कोई बात करना तो दूर वे संघ का नाम भी इस डर से नहीं लेते कि कहीं कुछ गलत न निकल जाए। क्योंकि सब जानते हैं, यदि संघ की लाइन से हटे तो फिर खैर नहीं। अब तक जिसने भी नागपुर के निर्देश और नीतियां लांघने की कोशिश की है उनके पर कतर दिए गए हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं पार्टी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी। सन 2005 में पाकिस्तान जाकर आडवाणी को मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता बताना महंगा पड़ गया था। पार्टी में आडवाणी का संभवत: यह पहली बार अपमान था कि उनके सामने एक अदने से नेता को लाकर संघ ने इस्तीफा लेने के लिए खड़ा कर दिया था। आखिरकार उन्हें भाजपा अध्यक्ष का पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इन तमाम बातों से देश भलीभांति परिचित भी है, बावजूद संघ बार-बार दोहरात है कि उसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

              दरअसल इसके पीछे बहुत गंभीर कहानी है, जिसे आज के दौर में वादाखिलाफी भी कह सकते हैं। आजकल भाजपा नेता जिन सरदार बल्लभ भाई पटेल का नाम कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं, नरेंद्र मोदी गुजरात में जिनकी सबसे ऊंची प्रतिमा बनाकर उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित करना चाहते हैं, आडवाणी जी जिन्हें धारा 370 से जोड़ रहे हैं, उन्हीं सरदार पटेलजी ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए शर्त रखी थी कि वह राजनीति में कभी दखल नहीं देगा। सरदार पटेल को दिए गए वचन के कारण आरएसएस सीधे राजनीति में नहीं उतरता बल्कि भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से राजनीति करता है। इसलिए जब भी ऐसा मौका आता है, जो राजनीति में संघ के शामिल होने का संकेत देता हो, संघ नेता तत्काल आकर सफाई देते हैं कि संघ का राजनीत से कोई लेना देना नहीं। सरदार पटेल तो छोड़िए भगवान राम को लेकर भी आरएसएस और भाजपा की विवशता यही है। राम जब फायदेमंद दिखे थे तब कसम खाई थी कि मंदिर वहीं बनाएंगे, अब राम के नाम से कुछ कम फायदा होता दिख रहा है, तो भाजपा कहती है मंदिर वहीं बनना चाहिए, लेकिन यही राम जब अदालत में सजा दिलाते दिखते हैं तो कहती है कि हमने बाबरी मस्जिद नहीं गिराई, हमें तो बहुत दुख हुआ था। राजनीतिक दल हैं तो राजनीति करेंगे ही, पर भगवान से भी राजनीति करने लगेंगे यह कौन सोच सकता था। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने पहले सत्ता पाने के बाद राम को भुला दिया था अब सत्ता पाने के लिए भी राम की शरण में जाने के बजाए राम से राजनीति कर रही है। पिछले दिनों जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राम जन्मभूमि न्यास ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के 75 वें जन्मदिन पर 19 जून से 22 जून तक मनाए जाने वाले मनाए जाने वाले अमृत महोत्सव में आमंत्रित किया गया था। तब उन्होंने व्यस्तताओं का हवाला देकर इंकार कर दिया था। हालांकि बताया यह जा रहा है कि मोदी अयोध्या जाकर कुछ ऐसा नहीं बोलना चाहते थे, जिससे विवाद की स्थिति बने या फिर मोदी के लिए मुस्लिम वोट जुगाड़ने में लगी भाजपा की मुहिम को धक्का लगे। लिहाजा अयोध्या जाकर राम मंदिर का मुद्दा उछलाने का काम उनके करीबी अमित शाह को सौंपा गया। अमित शाह अयोध्या गए और उन्होंने यहां भव्य राम मंदिर बनाने की वकालत की। यही राम से राजनीति है। जो लोग कभी मंदिर बनाने की कसमें खाते आए हैं, वे आज कह रहे थे कि मंदिर बनना चाहिए। खैर! भाजपा की राजनीति यहीं खत्म नहीं हुई है। राम से राजनीति करने का प्लान इतना धांसू है कि राम भी चक्कर खा जाएंगे। दरअसल कहा जा रहा है कि इस बार भाजपा सीधे राम मंदिर का मुद्दा नहीं उठाएगी बल्कि उसके लिए यह काम विश्व हिंदू परिषद करेगा। यों-यों चुनाव करीब आएंगे एक ओर विहिप राम मंदिर के मुद्दे को उठाएगी दूसरी ओर भाजपा सीधे यह कहने के बजाए अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए, यह कहेगी कि हम तो शुरू से ही मंदिर का निर्माण चाहते हैं। भगवान राम और आम जनता के साथ यह दोहरी राजनीति भाजपा के लिए न पहले शुभ साबित हुई और न शायद आगे होगी।

   ? विवेकानंद