संस्करण: 15 जुलाई -2013

लोकतंत्र में लोकप्रियतावाद के साथ सार्वजनिक जीवन में शुचिता के सवाल

? वीरेन्द्र जैन

                1985 में जब संसद ने दल बदल विरोधी कानून पास किया तो उन लोगों को बड़ा धक्का लगा था जो अपनी खरीद फरोख्त की ताकत की दम पर सरकारों को बनाने बिगाड़ने का खेल खेलते थे और इसी की दम पर कई सरकारों को अपने पास गिरवी रख कर अपनी मनमर्जी के कानून और नीतियां बनवाते रहते थे। यह कानून सचमुच में एक क्रांतिकारी कानून था क्योंकि इससे देश में व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व की जगह दलों को महत्व मिला था और जिस दल के कार्यक्रम और घोषणापत्र के आधार पर कोई व्यक्ति चुन कर सदन में पहुँचता था उसके अनुशासन में रहना जरूरी हो गया था। कानून बनते समय इसका सीधा विरोध तो कोई भी राजनीतिक दल नहीं कर पाया था पर जो लोग पैसे वालों की दम पर सत्ता के खेल खेलते हैं,वे विचलित हो गये थे। यह कानून बनने से पहले चुनावों में धन का प्रयोग कम होता था क्योंकि निहित स्वार्थ अपना सारा जोर चुन कर आने वाले प्रतिनिधि पर केन्द्रित रखते थे, पर अब अपने व्यक्ति को जितवाने के लिए चुनाव के समय से ही धन का प्रवाह किया जाने लगा है। राजनीतिक दल अपनी सरकार बनने की स्थिति में मुफ्त उपहार देने के लुभावने वादे करने लगे हैं। इससे न केवल चुनाव ही मँहगे हो गये हैं अपितु सभी सदनों में करोड़पति उम्मीदवारों और प्रतिनिधियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है।

                 पिछले कुछ दिनों से यह देखा जा रहा है कि एक वर्ग दल बदल कानून के बाद से अर्जित, संसद में दलों की विशिष्ट भूमिका की आलोचना करने लगा है। वे यह कहते हैं कि हमारे संविधान में दलों को महत्व नहीं दिया गया है और चुन कर आया प्रत्येक सदस्य अपनी मनमर्जी से फैसला लेने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। वे इसे दलीय गुलामी बताते हुए लोकतंत्र विरोधी भी बताते हैं। सच तो यह है कि इस तरह की माँग उठाने वाले लोग खरीद-फरोख्त की दम पर सरकार चलाने वाले लोगों का ही हित साधन कर रहे हैं। स्मरणीय कि लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद मोरारजी देसाई ने किसी कार्यक्रम में खुद को प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद देश की विदेशनीति में आने वाले परिवर्तनों से सम्बन्धित कोई बयान दे दिया था तब देश के प्रसिध्द उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला ने किसी पत्रकार से कहा था कि मोरारजी कैसे प्रधानमंत्री बन जायेंगे जबकि दो सौ सांसद तो मेरे हैं। प्रधानमंत्री तो वही बनेगा जिसे मैं चाहूंगा। उनका यह कथन प्रकाशित भी हो गया था।

               देश में चुनाव सुधारों की प्रक्रिया निरंतर जारी है जो सकारात्मक है पर इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सही दलीय लोकतंत्र तो तभी स्थापित हो सकेगा जब व्यक्ति की जगह सुस्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम वाले दलों को ही महत्व मिलेगा और उसकी नीतियों व कार्यक्रमों के आधार पर मतदान होगा। अभी तो देखा जाता है कि कई दलों में चुनाव का नामांकन भरने से दो दिन पहले दल में आये व्यक्ति को टिकिट मिल जाता है, क्योंकि उस क्षेत्र विशेष में उसकी व्यक्तिगत लोकप्रयता या जातिवादी समीकरणों के आधार पर उसके जीतने की सम्भावनाएं अधिक होती हैं। जब दल की जगह व्यक्ति को वोट मिलते हैं तो इससे जातिवाद और साम्प्रदायिकता को भी बल मिलता है। किसी अन्य गुण के आधार पर लोकप्रिय व्यक्ति अपनी लोकप्रियता को वोटों में बदलने के सौदे करता है और दल उसका चुनाव नहीं करता अपितु वह दल का चुनाव करता है। इस दुष्प्रवृत्ति को रोकने के लिए जरूरी है कि उम्मीदवारी हेतु मान्यताप्राप्त दलों में कुछ न्यूनतम पात्रता तय की जाये जिसमें सदस्यता की वरिष्ठता भी सम्मलित हो। इसके लिए दल के संगठन और उसके संविधान अनुसार होने वाले संगठनात्मक चुनावों पर चुनाव आयोग की निगरानी जरूरी होगी। 

                 जब दल की जगह व्यक्ति और उसकी लोकप्रियता महत्वपूर्ण होती है तो विरोध में व्यक्ति की अलोकप्रियता भी चुनावी भूमिका निभाती है। यही कारण है कि चुनावों के दौरान उम्मीदवारों के चारित्रिक पतन के किस्से तेजी से प्रकाश में आने लगते हैं। इसलिए जरूरी है कि सार्वजनिक जीवन में रहने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति का जीवन उस जनसमुदाय की नैतिक मान्यताओं के अनुरूप हो जिनका वह नेतृत्व कर रहा है या करना चाहता है। सार्वजनिक जीवन जीने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को समाज द्वारा वर्जित जीवन शैली से चलने की आजादी नहीं होती। जो दल एक स्पष्ट सांस्कृतिक दृष्टि और जीवनशैली को अपने दल के संविधान में शामिल किये होते हैं उन्हें तो यह और भी जरूरी होता है कि उसके सदस्य दल की नैतिकता के अनुसार ही आचरण करें।  नैतिकता से विचलन के सर्वाधिक किस्से संघ परिवार या भारतीय जनता पार्टी में ही देखने को मिलते हैं क्योंकि वह एक ओर तो परम्परा का मुखौटा लगा कर सामंती युग में जी रहे वर्ग को बरगलाना चाहती है वहीं दूसरी ओर पश्चिमी हवाओं से प्रभावित नवधानाडय वर्ग का जीवन जीना चाहती है। यही कारण है कि भाजपा की राजनीति में चारों ओर दोहरापन देखने को मिलता है। वे निरंतर असत्य वाचन, षड़यंत्रकारी आचरण, और आपराधिक कर्मों के आरोपों से लिप्त पाये जाते हैं। उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष देश के सुरक्षा के लिए काल्पनिक उपकरण खरीदवाने की सिफारिश के लिए रिश्वत लेने की सजा पाते हैं तो दूसरे राष्ट्रीय अध्यक्ष पर किसी धर्मस्थल को तोड़ने के लिए षड़यंत्र रचने के मुकदमे चलते हैं। मंत्रियों को साम्प्रदायिक हिंसा के लिए आजीवन कारावास की सजा होती है, तो मुख्यमंत्रियों और ग्रह मंत्रियों को एनकाउंटर के नाम निर्दोषों की हत्या करवाने के आरोप लगते हैं। एक मुख्यमंत्री खनिज के क्षेत्र में हुए भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में जाते हैं तो एक केन्द्रीय मंत्री रहे राष्ट्रीय नेता को अवैध धन में हिस्सेदारी न करने के लिए अपने ही भाई द्वारा मरना पड़ता है। एक महिला मुख्यमंत्री का भाई बयान देता है कि अगर मैंने सच बोल दिया तो उसकी बहिन को पंखे से लटकना पड़ेगा। एक वरिष्ठ एडवोकेट कहते हैं कि वे पार्टी के सबसे बड़े नेताओं की सारी पोल पट्टी और समझौतों से परिचित हैं तो गठबन्धन से अलग हुए दल के नेता भी ऐसी ही चेतावनी देते हैं। मध्यप्रदेश के वित्तमंत्री रहे सबसे बुजर्ग नेता का आचरण तो हांड़ी का एक चावल है जिसे उन्हीं की पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता ने समझौते का मौका दिये बिना सप्रमाण उजागर कर दिया है बरना तो अपनी आदत अनुसार भाजपा के लोग इसे विरोधियों पर षड़यंत्र का आरोप लगाते हुए गुजरात के नेताओं की तरह उनकी रक्षा में जुट जाते। घुन लगी कमजोर सीड़ी के सहारे शिखर तक पहुँचने की कोशिश करने वालों को कभी भी धराशायी होना पड़ सकता है चाहे उनका नाम भाजपा हो, मुलायम हो, मायावती हो, जयललिता हो, करुणानिधि हो, ममता बनर्जी हो या कुछ और...।

? वीरेन्द्र जैन