संस्करण: 15 जुलाई -2013

और कितने राघवजी ?

? सुभाष गाताड़े

                विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ी एवं विधानसभा के आसन्न सत्र का सामना कर रही किसी सरकार के लिए इससे बड़ी शर्मनाक स्थिति और कुछ नहीं हो सकती थी कि उसके एक अग्रणी मंत्री को यौन शोषण के आरोप में रूखसत कर दिया जाए। बहरहाल, जिस तरह आननफानन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने वरिष्ठ मंत्री राघवजी - जो पिछले दस साल से राज्य का वित्त मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण महकमा देख रहे थे - को पदत्याग का निर्देश दिया है, वह इसी बात की ताकिद करता है कि प्रथमदृष्टया अर्थात प्राइमा फेसी, उन्होंने उन आरोपों पर सन्देह नहीं किया है।

                   जैसा कि बताया जाता है कि उनके खिलाफ 'अप्राकृतिक यौन शोषण' का आरोप लगानेवाले दोनों युवक उनके गृहजिले विदिशा के रहनेवाले हैं और दोनों राघवजी के साथ रहे हैं। इनमें से एक ने भोपाल के हबीबगंज थाने में पहुंच कर शिकायती आवेदन दिया, जिसमें कहा गया कि नौकरी दिलाने के नाम पर अपने निवास पर रख कर वह उनसे ढाई साल से अप्राकृतिक कृत्य और दुर्व्यवहार कर रहे थे। पुलिस से खुद को और परिवार को सुरक्षा देने की मांग करते हुए इस युवक ने एक अन्य युवक का फोटोयुक्त शपथपत्र भी पुलिस को दिया है, जो उनके घर चपरासी था, जिस पर भी अप्राकृतिक कृत्य के लिए वह दबाव बनाते थे।

                समाचारों के मुताबिक राघवजी का पत्ता कटने में उस सीडी की भूमिका अहम समझी जा रही है जो करीब तीन साल पहले चर्चा में आयी थी, जिसमें वह अपने जिले की एक महिला भाजपा नेता के साथ बताए गए थे। तब कोई शिकायत सामने ने न आने पर और सियासी वजहों से मामले को रफा दफा कर दिया था। अब एक नया तथ्य इसमें यह भी जुड़ गया है जिसमें भाजपा के ही एक अग्रणी नेता ने यह दावा किया है कि राघवजी के ऐसे प्रसंगों पर उसके पास 20 सीडी हैं, जो इस बात की ताईद करती हैं कि वह किस किस्म के विवादास्पद अतीत के व्यक्ति रहे हैं।

                अपनी झेंप मिटाने के लिए बेताब भाजपा का सूबाई नेतृत्व भले ही इस पूरे घटनाक्रम को आपसी रंजिश का नतीजा बताएं या पार्टी के आन्तरिक विवादों का प्रस्फुटन कहें या मौन बरतें, मगर यह स्पष्ट है कि इसने संघ-भाजपा दोनों को मुश्किल में डाल दिया है।

               निश्चित ही यह कोई पहला मौका नहीं है जब विवादास्पद कही जानेवाली सीडी ने परिवार के दिग्गजों को 'निपटा' देने का काम किया है। मध्यप्रदेश से ही ताल्लुक रखनेवाले वरिष्ठ प्रचारक संजय जोशी का प्रसंग बहुत पुराना नहीं पड़ा है। भाजपा के मुंबई अधिवेशन से ही चलता कर दिए जाने वाले संजय जोशी की इस तरह की दुर्गत के पीछे भी एक विवादास्पद सीडी की भूमिका बतायी गयी थी। भाजपा के इस अधिवेशन में एक सीडी बांटी गयी थी जिसमें संजय जोशी नुमा दिखनेवाले एक व्यक्ति को किसी महिला के साथ अंतरंग क्षणों में दिखाया गया था। इस घटना ने खुद संघ परिवार के अन्दर वाकयुध्द छेड़ दिया। मामला इस कदर आगे बढ़ता दिखा कि संघ के थिंक टैंक कहे जानेवाले एम जी वैद्य ने 'तरूण भारत' अख़बार में लेख लिख कर यह चेताया था कि वह जानते हैं कि इस सीडी के पीछे कौन 'मैकबेथ' और 'लेडी मैकबेथ' हैं और वक्त आने पर उन्हें भी बेपर्द किया जाएगा। एम जी वैद्य क़ा इशारा मध्यप्रदेश के पड़ोसी राज्य के यशस्वी कहे जानेवाले मुख्यमंत्री एवं उनकी एक करीबी मंत्रिमंडलीय सहयोगिनी की तरफ था। उन्हीं दिनों एक स्टोरी में 'तहलका' पत्रिका ने बताया था कि ऐसी ही कोई अन्य सीडी चल रही है, जिसमें किसी अन्य नेता के बारे में ऐसे ही विस्फोटक तथ्य सामने आ सकते हैं।

                 बहरहाल, वे सभी जो संघ परिवार की सक्रियताओं में संलग्न रहे हैं या उसे करीबी से देखते हैं, उन्हें वाचा एवं कर्मणा के बीच ऐसा विराट अन्तराल देख कर विशेष आश्चर्य नहीं होता। बातें चरित्रा निर्माण की हों और आचरण उसके बिल्कुल विपरीत हो।

                 इस सन्दर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से किशोरावस्था से जुड़े और दीनदयाल उपाध्याय के बाद भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष पद सम्भाले बलराज मधोक की अपनी आत्मकथा 'जिन्दगी का सफर' एक आइना प्रदान करती है। इसमें एक अध्याय में वह संघ परिवार के वरिष्ठ नेताओं की जीवनशैली के जरिए उनके नैतिक पतन एवं उसके प्रति तत्कालीन सुप्रीमो गोलवलकर की प्रतिक्रिया पर रौशनी डालते हैं। तीन हिस्सों में बंटी इस आत्मकथा के तीसरे खण्ड में जिसका शीर्षक है 'जिन्दगी का सफर : दीनदयाल उपाध्याय की हत्या से इन्दिरा गांधी की हत्या तक' दिनमान प्रकाशन, दिल्ली, 2003 पेज 20) पर वह बताते हैं कि किस तरह 'जनसंघ के अध्यक्ष पद के दौरान' केन्द्रीय कार्यालय के प्रभारी जगदीश प्रसाद माथुर - जो उन दिनों  30 राजेन्द्र प्रसाद रोड पर स्थित कार्यालय में किसी वरिष्ठ नेता के साथ रहते थे - ने उनसे शिकायत की थी कि किस तरह उस नेता ने दफ्तर को ही अनैतिक गतिविधियों का अड्डा बना दिया है, जहां आए दिन नयी नयी लड़कियां आती है। श्री माथुर के मुताबिक, अब चूंकि पानी सर के उपर से गुजरता दिख रहा है और जनसंघ के वरिष्ठ नेता होने के नाते उन्होंने उन्हें सूचित करना जरूरी समझा। बलराज मधोक का कहना था कि चूंकि उन दिनों इसी वरिष्ठ नेता को जनसंघ का अधयक्ष बनाने की योजना संघ की तरफ से चर्चा में थी इसलिए उन्होंने इस मसले की चर्चा गोलवलकर से की। मधोक की बात सुन कर गोलवलकर कुछ समय तक खामोश रहे और उन्होंने बताया कि वह इन लोगों के चरित्र की कमजोरियों से परिचित हैं, मगर चूंकि उन्हें संगठन चलाना है इसलिए सभी को साथ लेकर चलते हैं और 'शिव की तरह रोज हलाहल पीते हैं।' (पेज 62)

                मीडियाकर्मी, फिल्मनिर्माता एवं लेखक शुध्दब्रत सेनगुप्ता ने पिछले दिनों अपने आलेख में इस बात का विस्तृत जिक्र किया था। बीस साल पहले वह संघ पर निर्मित एक डाक्युमेण्टरी फिल्म 'द बायज इन द ब्रांच' -जिसका निर्देशन ललित वाच्छानी ने किया था - में सहयोग दे रहे थे, जिसका अधिकतर शूटिंग नागपुर में संघ के मुख्यालय 'हेडगेवार भवन' में किया गया है। एक क्षेपक के तौर पर बताया जा सकता है कि इस फिल्म में संघ की शाखा की शूटिंग की गयी थी, वाच्छानी जानना चाहते थे कि संघ आखिर किस तरह अपने युवा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करता है और तैयार करता है। स्पष्ट था इसके लिए निर्देशक एवं उसके अन्य सहयोगी कई दिनों तक वहीं रूके और उन्होंने किशोरों, युवाओं से काफी बात dhA (RSS Supremo Mohan Bhagwat's Thoughts on Rape, JANUARY 4, 2013. www.kafila.org) अपने लेख में शुध्दव्रत उस युवा स्वयंसेवक का विस्तृत जिक्र करते हैं, जो उन्हें एवं निर्देशक से मिलने होटल में आया और घण्टों उनसे बात करता रहा। उसने विस्तार में बताया कि किस तरह 'ग्यारह साल की उम्र से वह वरिष्ठ कर्मियों के हाथों यौन अत्याचार का शिकार होता रहा।'

                 निश्चित ही नैतिक दिवालियेपन को सिर्फ यौनसम्बन्धी दुराचारों तक सीमित नहीं किया जा सकता, उसे हम उन उदाहरणों के जरिए भी देख सकते हैं, जिसमें हम देखें कि खुद पार्टी का अध्यक्ष - और बचपन से संघ का स्वयंसेवक - अपने कार्यालय में घूस लेते एक स्टिंग आपरेशन में पकड़ा जाए और जेल की हवा खा आए (बंगारू लक्ष्मण) या पैसा लेकर प्रश्न पूछनेवाले सांसदों की कतार में संघ के स्वयंसेवक रहने के बाद सांसद बने लोगों की तादाद सबसे अधिक हो - जैसा कि कोब्रा पोस्ट द्वारा किए गए स्टिंग आपरेशन से उजागर हुआ है -या पार्टी का एक अध्यक्ष दलितों के लिए आवंटित जमीन पर अपना कब्जा जमाए रखे और मामला विवादों में आए तो फिर बताए कि वह भूल गया था (वेंकेया नायडू) या कन्ट्रोलर एण्ड आडिटर जनरल (कैग) की रिपोर्ट बताए कि किस तरह मोदी हुकूमत ने अदानी समूह को फायदा पहुंचाया।  विडम्बना यही कही जाएगी कि अपने आप को सही मानने की प्रवृत्ति इस कदर शाखा में जानेवाले स्वयंसेवकों पर हावी रहती है कि वह सच्चाई की अनदेखी करने में संकोच नहीं करते।

                वैसे इस तरह का उदाहरण किसी संगठन में शायद ही मिले जहां पता चले कि पार्टी मुख्यालय स्थित टे्रजरी से ढाई करोड रूपए किसी अलसुबह गायब हो जाए और पुलिसवालों को बुलाने के बजाय निजी डिटेक्टिव से काम चलाया जाए। अभी तक उस ढाई करोड़ रूपए का हिसाब नहीं मिला है, जो भाजपा के मुख्यालय से चोरी हुआ। दिलचस्प यह भी था कि चोर ने खजाने में रखी 1,000 रूपए की नोटों पर हाथ साफ किया था और इस मामले की खबर मीडिया को देने में भी दफ्तर का व्यक्ति ही शामिल था। उस वक्त पत्रकार समुदाय में एक एसएमएस चला था ' ना ताला टूटा न तिजोरी, भाजपा मुख्यालय से ढाई करोड चोरी'।

? सुभाष गाताड़े