संस्करण: 15 जुलाई -2013

प्रधानमंत्री पद के लिये

वोटों का धर्वीकरण

वह शासन कैसे अच्छा हो सकता है जो साम्प्रदायिकता की दरार को चौड़ा करता है जिसके परिणामस्वरूप शासन की अच्छी योजनाएँ खतरे में पड़ जाये?

? पवन के. वर्मा

                29 जून 2013 को, जकात फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अधयक्ष सैयद जफर महमूद ने मुसलमानों की वास्तविक स्थिति और भाजपा की आधिकारिक वेबसाइट पर उनके चित्रण के विषय में नरेंद्र मोदी के समक्ष एक प्रस्तुति दी। उनके द्वारा कई चिन्ताजनक मुद्दे उठाये गये जिसमें एक निबंध भी शामिल है जिसमें कहा गया है कि सभी मुस्लिम महिलाओं को मंगलसूत्र पहनना चाहिए। साथ ही इसमें 2002के गुजरात दंगों के प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिये बनाई गई कॉलोनियों की हालत का मुद्दा भी उठाया गया जो मीलों लंबे कचरे के ढेर के बाजू में बनी हुई है जहाँ एक बार भी मोदी ने जाकर नही देखा।

                मैं इस रिपोर्ट पर होने वाली एक टेलीविजन चर्चा में शामिल हुआ था और गुजरात से भाजपा के प्रवक्ता द्वारा बार-बार कही जाने वाली इस बात को सुनकर स्तब्ध था कि ''कम से कम मोदी ने मुसलमानों के साथ एक बातचीत तो शुरू की और उन्होने इस प्रस्तुति को धयान से देखा और सुना।'' हमसे इस तथ्य का जश्न मनाने की अपेक्षा की जाती हैं कि एक मुख्यमंत्री के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल में, गोधराकाण्ड के 11 साल बाद, और देश के गणतंत्र लागू होने के 66 साल बाद देश का प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले उस व्यक्ति ने कम से कम नागरिकों के एक महत्वपूर्ण वर्ग के साथ चुनाव के ठीक पहले बातचीत तो शुरू की और उन पर बड़ा भारी एहसान किया?

               वास्तविकता यह है कि आज देश एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, और यह बहुत सावधानीपूर्वक चिन्तन करने का समय है। एक ओर हमारे पास ऐसे अति महत्वाकांक्षी राजनेता की प्रचण्ड ताकत है जिसके पास एक राज्य पर शासन करने के अतिरिक्त अन्य कोई दक्षता नही है, एक गठबंधन चलाने का कोई अनुभव नहीं है, एक टीम लीडर के रूप में कोई प्रतिष्ठा नही है, मतभेद के प्रति बहुत कम सहनशीलता है, जो बलशाली है और जो विशाल भारत को एक आयाम से देखता है जिसमें देश के नागरिकों का बहुत बड़ा भाग शामिल नही है। दूसरी ओर हमारे पास एक बहुलधर्मी देश की हकीकत है जहॉ से दुनिया के महान धर्मों में से चार- हिंदू धर्म, बौध्द धर्म, जैन धर्म और  सिख धर्म का यहाँ से उदय हुआ है, जहॉ ईसाई अल्पसंख्यक है और दुनिया के किसी भी देश से अधिक इस्लाम के अनुयाई यहाँ पर है।

               हमारे संस्थापक पूर्वजों नें देश की जीवंत बहुलता की रक्षा करने का प्रयास किया था। और उन्होने ऐसा मात्र आदर्शवाद के लिये नही किया बल्कि भारत की वास्तविक परिस्थितियों में इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प भी नही था। हो सकता है कि गुजरात के 6 प्रतिशत मुसलमानों ने अपने दमन से स्थापित शांति के साथ सामंजस्य स्थापित कर लिया हो किन्तु भारत गुजरात का प्रतिबिंब नही है। केरल में एकचौथाई आबादी मुस्लिम है, पश्चिम बंगाल की 30 प्रतिशत आबादी मुसलमान है, असम में हर चौथा व्यक्ति मुसलमान है, उत्तरप्रदेश में 3 करोड़ मुसलमान रहते हैं, बिहार में लगभग 1.5 करोड़ मुसलमान है, कर्नाटक का प्रत्येक नवाँ निवासी मुस्लिम है। अतएव भारत में सह-अस्तित्व एक विकल्प नहीं, बल्कि एक मजबूरी है जैसा कि पं. जवाहर लाल नेहरू ने 1948 में कहा था।

                कुछ साल पहले, भाजपा ने अटलबिहारी वाजपेयी के नैतृत्व में पार्टी की अपील को अधिक व्यापक बनाने के क्रम में तथा भारत की वास्तविकताओं के साथ अनुरूपता स्थापित करने के प्रयास में अपने संकीर्ण हिंदुत्व उन्मुखीकरण पर पुनर्विचार करना शुरू किया था। यह उसके स्वयं के हित में था क्योंकि प्रत्यक्ष रूप से अपनी साम्प्रदायिक छवि बनाये रखने पर उसे मिलने वाला लाभ कम होता जा रहा था। भाजपा को यह महसूस होने लग गया था कि भारत के लोग अब अधिक समय तक राजनेताओं के प्यादे नही बने रहना चाहते है जो उन्हे धार्मिक विश्वास के आधार पर बॉटने की कोशिश करें। लेकिन आज, इस पार्टी की स्वस्थ प्रवृत्ति पर एक व्यक्ति द्वारा अपना संपूर्ण प्रभुत्व स्थापित किया जा रहा है जिससे भारत की स्थिरता और शांति को खतरा पैदा हो रहा है।

                शहरी भारत में मध्यम वर्ग के कुछ तत्वों को इस तर्क से बहकाया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी ही ऐेसे व्यक्ति है जो देश को बेहतर शासन दे सकते हैं। यह एक ऐसी कपोलकथा है जो मोदी और उनकी सशक्त जनसंपर्क टीम द्वारा तैयार की गई है और जिससे प्रबुध्द वर्ग द्वारा सख्त प्रतिप्रश्न करने की जरूरत है।

               बिहार में लालू प्रसाद के कुशासन के 15 साल में अविश्वसनीय रूप से बर्बाद हुये राज्य को नीतीश कुमार ने लगातार पांच साल से देश के विकास के चार्ट के शीर्ष पर बनाये रखा है। मोदी के शासन से हो सकता है कि गुजरात को कुछ मामलों में फायदा मिला हो लेकिन यह हमेशा से एक अधिक विकसित राज्य रहा है। यहां तक कि भाजपा के भीतर भी ऐसे दूसरे नेता और मुख्यमंत्री हुये है उनका ट्रैक रिकॉर्ड अधिक कठिन परिस्थितियों में भी बहुत अच्छा नही तो अच्छा तो रहा ही है। गुजरात के मानव संसाधान सूचकांक में काफी कुछ ऐसा है जो अभी भी छूटा हुआ है। कुछ कंपनियों के मालिक यह सोच सकते है कि मोदी उनके उध्दारकर्ता है किन्तु ऐसे लोग मोदी द्वारा वाइब्रेंट गुजरात के अभियान में किये गये दावे के एक अंश मात्र है। वास्तव में थोड़े से। और अंत में एक बात- शासन ऐसी चीज है जो प्रत्येक भारतीय के जीवन को स्पर्श करता है। वह शासन कैसे अच्छा हो सकता है जो साम्प्रदायिकता की दरार को चौड़ा करता है जिसके परिणामस्वरूप शासन की अच्छी योजनाएँ खतरे में पड़ जाये?

               अतएव राजनीतिक कटुता से परे हमें राष्ट्र के बारे में अवश्य सोचना चाहिए। भाजपा को अपने स्वयं के कुछ कार्यकर्ताओं में व्याप्त सोचे-समझे उन्माद के बावजूद गंभीरता से आत्मविश्लेषण करना चाहिये। भारतीय मतदाताओं को किसी एक व्यक्ति का समर्थन करने के पहले यह बहुत सावधानी से तय करना होगा कि जिसका शासन रिकॉर्ड न सिर्फ एक राज्य तक सीमित है तथा दागदार है बल्कि उसने पहले से अपनी ही पार्टी को विभाजित भी कर दिया है क्या वह देश को विभाजित नही करेगा?

              यह लिखत हुये श्री अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं में से कुछ पंक्तियाँ मेरे मस्तिष्क में आ रही है जिनका अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिये उन्होने मुझसे अनुरोध करके मेरा सम्मान बढ़ाया था-

''जरूरी यह है कि

ऊॅचाई के साथ विस्तार भी हो,

जिससे मनुष्य,

ठूॅठ सा खड़ा न रहे,

औरों से घुले-मिले,

किसी को साथ लें,

किसी के संग चलें।

मेरे प्रभु!

मुझे इतनी ऊॅंचाई कभी मत देना,

गैरों को गले न लगा सकूँ,

इतनी रूखाई कभी मत देना।''      

? पवन के. वर्मा

(लेखक एक प्रसिध्द रचनाकार, पूर्व राजनयिक, एवं वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री के सलाहकार है. उक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।)