संस्करण: 15 जुलाई -2013

तेजाबी हमलों पर

विराम की पहल कब ?

? डॉ. गीता गुप्त

                ह सर्वविदित है कि तेज़ाब का प्रहार महिलाओं के जीवन को हमेशा के लिए नारकीय बना देता है। इससे शरीर के अंग पूर्णत: नष्ट अथवा इस कदर विकृत हो जाते हैं कि दीर्घकालिक महंगी चिकित्सा के बावजूद उसकी भरपाई संभव नहीं हो पाती। वर्ष 2005 में एक युवक का प्रेम-प्रस्ताव देने के कारण दिल्ली की सोलह वर्षीया लक्ष्मी पर तीन युवकों ने तेज़ाब फेंक दिया। जिससे उसकी आंखें, नाक, कान, व गर्दन जल गए। हाथों पर गहरे जख्म हो गए। चेहरा इतना विकृत हो गया कि जब वह अपने घर लौटी तो वहां के सारे शीशे हटा दिए गए थे। उसकी सारी तस्वीरें भी हटा दी गई थी। उसकी दुनिया बदल चुकी थी। माता-पिता उसे समझाते थे कि वह पहले की तरह सुन्दर हो जाएगी। मगर उसने घर से निकलना बन्द कर दिया। वह सिर्फ डॉक्टर, वकील, न्यायालय या पुलिस के पास जाने के लिए घर से बाहर कदम रखती थी।

                लक्ष्मी की कहानी बहुत दु:ख भरी है। परिवार वालों के समझाने पर उसने बुर्का पहनकर आगे की पढ़ाई स्कूल में जारी रखी। वह किसी से इसलिए बात नहीं करती थी कि कोई बुर्का उठाने के लिए न कह दे। उसके पिता खानसामा के रूप में जिस संस्थान में कार्यरत थे, उसने लक्ष्मी के सात ऑपरेशनों का व्यय-भार वहन किया और उसे प्रोफेशनल ट्रेनिंग भी दिलवायी। कुछ माह पूर्व उसके पतिा चल बसे। क्षयरोग से ग्रस्त भाई चार माह से अस्पताल में है। उसके इलाज, घर-खर्च, मां की देखभाल सारी जिम्मेदारी लक्ष्मी के कंधों पर है। उसका खुद का उपचार भी अधूरा हो पाया है। उसने पिछले साल ब्यूटीशियन का कोर्स किया है और अब उसे नौकरी की तलाश है। उसके तीन आरोपियों में से दो को सजा मिली, जो कुछ समय बाद सामाजिक जीवन जीने लगेंगे। लेकिन लक्ष्मी आजीवन सजा भुगतने के लिए बाध्य है क्योंकि यह हादसा उसके शरीर और आत्मा पर स्थायी निशान छोड़ गया है, जिसके दर्द से वह कभी उबर नहीं सकेगी।

                 महिलाओं पर तेजाबी हमले के ऐसे कई उदाहरण हैं। हालांकि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो से ऐसे मामलों का स्पष्ट आंकड़ा नहीं मिल पाता क्योंकि ये मामले धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 320 (गम्भीर चोट पहुंचाना) और धारा 326 (घातक हथियारों से जान-बूझकर प्रहार करके चोट पहुंचाने) के तहत दर्ज किए जाते हैं। तथापि कैम्पेन एण्ड स्ट्रगल अगेंस्ट एसिड अटैक्स ऑन विमेन' की एक रपट के अनुसार, सिर्फ कर्नाटक राज्य में ही 1999 से 2007 अर्थात, 9 वर्षों में ऐसे 56 मामले दर्ज किए गए। अनुमान है कि भारत में प्रति वर्ष तेजाबी हमले की 1000 घटनाएं घटती हैं पर रपट 100-150 की ही दर्ज हो पाती है। 18 से 40 वर्ष आयु वर्ग की 80 प्रतिशत महिलाएं विवाह और प्रेम प्रस्ताव को नकारने के कारण ऐसे हमले का शिकार होती हैं। अब तो विश्व के कई देशों में तेज़ाबी हमला गंभीर समस्या बन चुका है। कम्बोडिया और बांग्लादेश में ऐसे अनेक प्रकरण सामने आए हैं। बांग्लादेश में तो पिछले डेढ़ दशक में तीन हजार मामले दर्ज हो चुके हैं। अनेक देशों में तेज़ाबी हमलों और तेज़ाबी की बिक्री पर नियंत्रण हेतु अलग कानून बनाये गए हैं। बांग्लादेश में 'तेज़ाब नियंत्रण कानून 2002' लागू हैं।

                 भारत में तेज़ाब की खुली बिक्री पर अब तक कोई नीति न बनना आश्चर्यजनक है। महिलाओं को तेज़ाबी हमले से बचाने के लिए कठोर कानून की दरकार तो है ही, पर यह भी आवश्यक है कि तेजाब की खुली बिक्री कानूनन प्रतिबंधित हो। हालांकि अभी विस्फोटक पदार्थों के निर्माण, भण्डारण, प्रयोग और विक्रय संबंधी जो नियम कानून हैं वे भी सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। उनके पालन के प्रति संबंधित विभाग और सरकारें सख्त नहीं हैं। कानून की एक ख़ामी यह है कि तेजाब के भयंकर दुष्प्रभावों को देखते हुए भी इसे हथियारों की तरह घातक माना ही नहीं गया है। जबकि दुकानों में दस-बीस रुपयों में खुले आम मिल जाने वाला तेजाब हथियार से भी अधिक घातक है। तेजाबी हमले से पीड़ित को आरंभिक दो-तीन बड़े ऑपरेशानों के बाद भी कई बाद 25-30 ऑपरेशन कराने पड़ सकते हैं, जिसका खर्च हर बार तीन लाख रुपये तक आता है। फिर भी, संक्रमण का ख़तरा सदैव बना रहता है क्योंकि हाइड्रोक्लोरिक एसिड, सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड मनुष्य की त्वचा के साथ हड्डियों को भी गला देती है। यह पीड़ित के लिए भयंकर दर्दनाक और परिजनों-देखने वालों के लिए भी असहय होता है। सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचने वाला तेजाब तो प्राणलेवा साबित होता है, जैसा कि पिछले दिनों मुंबई की प्रीति राठी के मामले में हुआ।

               यहां स्मरणीय है कि वर्ष 2007 में नोएडा के एक सत्रह वर्षीय किशोरी पर पड़ोसी ने तेजाब से प्रहार किया। मैसूर में एक 22 वर्षीया गृहिणी को उसके पति ने सल्फ्यूरिक एसिड मिश्रित शराब पीने के लिए मजबूर किया और दिल्ली की एक फैशन डिज़ाइनर को ऐसे प्रहार का सामना करना पड़ा। उक्त तीनों महिलाएं जीवन की भयावहता से जूझने के लिए विवश कर दी गई। तब उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं पर तेज़ाब प्रहार को हत्या से बदतर बताते हुए उनसे निपटने के लिए कठोर कानून की मांग की थी। राष्ट्रीय महिला आयोग ने इससे सहमति जतलाते हुए आरोपियों के लिए सात वर्ष से आजीवन कारावास तक की सजा के प्रावधन का सुझाव दिया था। कुछ वर्ष पूर्व महिला बाल विकास मंत्रालय ने भी अपराध की गंभीरता को देखते हुए एक प्रस्ताव तैयार किया था। पर वह ठण्डे बस्ते में चला गया।

                अलबत्ता राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा प्रस्तावित योजना बहुत उपयोगी सिध्द हो सकती थी। उसमें तेज़ाब पीड़िता के लिए आर्थिक राहत और पुनर्वास का प्रावधन था। उपचार हेतु पचास हजार की तात्कालिक सहायता से लेकर आवश्यकतानुसार 25 लाख तक मुआवजे का प्रस्ताव था। पीड़िता की मृत्यु की दशा में उसके परिजन को दो लाख रुपये देना प्रस्तावित था। जिला, राज्य व केन्द्र स्तर पर समान रूप से पीड़िता को राहत पहुंचाने हेतु बोर्ड की व्यवस्था का भी सुझाव था। लेकिन प्रस्तावित योजना कानून का रूप नहीं ले सकी। बलात्कार पीड़ित स्त्रियों के लिए राहत एवं पुनर्वास योजना लागू की गई, पर तेज़ाब पीड़ितों का ध्यान नहीं रखा गया। जबकि तेज़ाब पीड़ितों का जीवन अभिशप्त हो जाता है। उन्हें लम्बे समय तक महंगी चिकित्सा और प्लास्टिक सर्जरी आदि की आवश्यकता होती है, जिसका व्यय-भार उठाना हरेक के सामर्थ्य की बात नहीं। चेहरा वीभत्स हो जाने के कारण तेज़ाब पीड़िता का सामाजिक जीवन नष्ट हो जाता है। वह शारीरिक एवं मानसिक रूप से भी टूट जाती है। उसके लिए रोज़गार की संभावना क्षीण हो जाती हैं। अतएव उसे अधिक आर्थिक राहत की दरकार होती है।

                 बहरहाल हरियाणा सरकार ने अपने राज्य में तेज़ाब से पीड़ित महिलाओं के लिए राहत एवं पुनर्वास योजना लागू की है। तदनुसार पीड़िता को एकमुश्त राहत राशि,चिकित्सा-व्यय एवं पुनर्वास सुविधा सुलभ होगी। उसे ज़िला स्तर के बोर्ड द्वारा तत्काल चिकित्सा हेतु पच्चीस हजार की राशि तथा नियत अस्पतालों में नि:शुल्क चिकित्सा सेवा प्राप्त होगी। पीड़िता की मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार को पांच लाख रुपये बतौर मुआवजा दिया जाएगा। वस्तुत: ऐसी योजना देश भर में लागू की जानी चाहिए। पर सच्चाई यह है कि राज्यों का धयान इस ओर नहीं है।

                ज्ञातव्य है कि तेज़ाब हमले के मामले में भारत दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश है। वर्ष 1967 में बांग्लादेश में, 1982 में भारत में और 1993 में कम्बोडिया में तेज़ाब हमले की पहली घटनाएं घटी। यह सिलसिला कमोबेश निरन्तर जारी है। सरकार ने महिला हिंसा उन्मूलन हेतु प्रतिबध्दता तो दर्शायी, कानून भी बनाये लेकिन यह एक पहलू छूट गया। बाद में भी इस पर धयान नहीं दिया गया। जबकि तेजाब के प्रहार से पीड़ित महिलाओं का पुनर्वास भी आसान नहीं है क्योंकि प्लास्टिक सर्जरी, त्वचा प्रत्यारोपण या पुन: त्वचा उगाना न केवल बहुत महंगा है बल्कि इसमें सफलता की संभावनाएं भी क्षीण हैं। शिक्षित और नौकरीपेशा स्त्रियां भी ऐसे हादसे के बाद बेरोजगार हो जाती है। आर्थिक रूप से असहाय ऐसी महिलाओं की दुर्दशा की कल्पना करना कठिन नहीं है। फिर भी केन्द्र व राज्य सरकारों ने इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया और आवश्यक उपाय नहीं किये अन्यथा इस पर काबू पाया जा सकता था।  ग़ौरतलब है कि दिल्ली की तेज़ाब पीड़िता लक्ष्मी ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर तेजाब की खुली बिक्री पर रोक लगाने की मांग की है। तेज़ाब प्रहार की घटनाओं के मद्देनजर यह जरूरी भी है। लेकिन पिछले सात वर्षों में भी सरकार इस संबंध में कोई नीति नहीं बना पायी। 29 अप्रैल 2012 को भी न्यायालय ने गृह मंत्रालय को सभी राज्यों से परामर्श कर नीति बनाने हेतु कहा था किन्तु सरकार ने सिर्फ कानून में संशोधान किया, नीति नहीं बनायी। न्यायालय के निर्देशों के बावजूद अप्रैल 2013 तक तेज़ाब की बिक्री पर अंकुश लगाने की नीति नहीं बन पायी तो अब शीर्ष न्यायालय ने सरकार को सिर्फ एक सप्ताह की मोहलत दी है। इस अवधि में सरकार ने नीति निर्धारण नहीं किया तो न्यायालय स्वयं उचित आदेश पारित कर देगी। हालांकि इससे आगे जाकर सरकार को तेज़ाब प्रहार से पीड़ित महिलाओं की चिकित्सा, आर्थिक राहत एवं पुनर्वास सहित अन्य सुविधाओं संबंधी योजना भी घोषित करनी चाहिए क्योंकि उसने महिलाओं के हित में अनेक कल्याणकारी योजनाएं पहले भी लागू की हैं। लेकिन अभी तो तेज़ाब की बिक्री पर रोक लगाने संबंधी सरकार की नीति का इंतजार लक्ष्मी के साथ-साथ हमें भी है। देखना है कि तेजाबी हमलों पर विराम की यह पहल हो पाती है अथवा नहीं ?  

                
? डॉ. गीता गुप्त