संस्करण: 15 जुलाई -2013

अन्ना की यात्रा से नहीं बदलेगा भ्रष्ट व्यवहार

? डॉ. सुनील शर्मा

               भ्रष्टाचार के संदर्भ में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा तैयार की गई अंतराष्ट्रीय सूची मे भारत का स्थान 94 वें नंबर पर है। पहले और दूसरे नंबर पर डेनमार्क और फिनलैण्ड जैसे देश है,जहॉ भ्रष्टाचार लगभग न के बराबर है। उल्लेखनीय है कि देशभर में पिछले तीन सालों से भ्रष्टाचार के विरोधा में जन आंदोलन चल रहें है। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जनसेवक यात्राएॅ निकाल रहें है और आम आदमी को डायरेक्ट कनेक्शन कर बिजली की चोरी को भी प्रोत्साहित कर रहें है। लेकिन भ्रष्टाचार है कि बढ़ता ही जा रहा है। वास्तव में हमारे देश के लिए भ्रष्टाचार का बढ़ना किसी अभिशाप से कम नहीं है।यह देश के विकास को तो बाधित करता ही है। साथ ही अनेक प्रकार की दूसरी समस्याएॅ भी बढ़ाता है। आजादी के बाद से ही भ्रष्टाचार  की जड़े गहरीं होती जा रहीं है। आजादी से आज तक कर चोरी,अपराध और भ्रष्टाचार की वजह से देश से धन की अवैधा तरीके से होने वाली निकासी से भारत को 465 अरब डालर का नुकसान हुआ है।वाशिंगटन स्थित ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी द्वारा जारी रिपोर्ट बतलाती है कि  अवैधा वित्त के प्रवाह के कारण  भारत में गरीबी बढ़ रही है। कालेधन की बात करें तो  स्विस बैंकिग ऐशोसियेशन की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 65550 अरब रूपये स्विस बैंक मे जमा हैं। देश में सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार का कारण माना जाता रहा है। लेकिन उदारीकरण के बाद बढ़ते निजीकरण से भ्रष्टाचार और तेजी से बढ़ा है और भ्रष्टाचार ने व्यापकता ग्रहण कर ली है,अब कार्पोरेट जगत ठेके हासिल करने में इक्ट्ठी चौथ चुकाने के बाद आम आदमी को खुले हाथों से लूटते है।सेवा क्षेत्र में निजीकरण के कारण जबाहदेही के खात्मे के साथ साथ भ्रष्टाचार बढ़ा है और आम आदमी इससे त्रस्त है। अब बात भ्रष्टाचार के निवारण की है तो हम सभी इससे पीड़ित है और इससे निजात चाहते हैं लेकिन इसके लिए रास्ता कौन सा है हो यह महत्तवपूर्ण है क्योंकि आजकल भ्रष्टाचार का विरोध यानि सरकार का विरोधा बन गया है क्या सरकारों के विरोध से यह खत्म होगा तो उत्तर नहीं में ही आएगा।

               अभी भ्रष्टाचार के विरोध के पुरोध अन्ना की यात्रा चल रही है लेकिन भ्रष्टाचार इससे भी दूर नहीं होगा। लोगों को भ्रम है कि शायद अन्ना के लोकपाल से भ्रष्टाचार से दूर होगा।तो हमें लोकपाल के संबंधा में देश के वैज्ञानिक और विद्वान पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की इस पर की गई प्रतिक्रिया मनन योग्य है।उन्होंने कहा है कि लोकपाल के प्रभावी होने से सिर्फ जेलें भरेंगीं, भ्रष्टाचार नहीं दूर होगा। उनकी इस प्रतिक्रिया का आधार भी यही है कि भ्रष्टाचार लोक व्यवहार में शामिल हो चुका है अत: कानुन से इसे रोक पाना संभव नहीं है। जब कोई मुद्दा व्यवस्था के चरित्र से जुड़ा होता है तो सिर्फ कानून बनाकर उसका समाधान नहीं खोजा जा सकता है।सुचना का अधिकार हमें मिला लेकिन कितना बदलाब आया यह हम सभी जानते हैं  सुचना मॉगने वालों को मौत के घाट उतार दिया जाता है।यह तय है कि लोकपाल जैसी व्यवस्था आदमी के चरित्र को नहीं बदल सकते हैं  और  भ्रष्टाचार पर अंकुश आचरण और व्यवहार में परिवर्तन से ही संभव है।इसकी शुरूआत घर से ही होनी चाहिए हमें घर को नैतिक मुल्यों की पाठशाला बनाना  होगा। यह काम माता पिता और प्रारम्भिक शिक्षा देने वाला शिक्षक ही कर सकते है।जग को सुधारने के लिए पहले खुद को सुधारना पड़ता है। तभी तो कहा गया है कि आप सुधारे तो जग सुधारे। यह बात भ्रष्टाचार पर भी लागू होती है। भ्रष्टाचार एक विष बेल है जिसे हम अपने मूक व्यवहार से पल्लिवित होने का सुअवसर दे रहें है।हम भ्रष्टाचार को व्यवहार से दूर करने की दिशा में न तो सोच रहें हैं और न ही कोई उपक्रम चलाना चाहते है। सिवाए कानून के डण्डा की चाहत और युवाओं को बरगलाने के।सिर्फ राजनैतिक और कदाचार और  भ्रष्टाचार में शामिल  लोंगों का दोषी ठहराकर हम अपनी जिम्मकदारी से नही बच सकते है।अक्सर होता यह है कि जब हम समाधान का हिस्सा नहीं बन पातें हैं तो खुद ही समस्या बन जातें है। हमारा यही आचरण भ्रष्टाचार को हवा दे रहा हैऔर हम अपनी नैतिक जिम्मेदारी सें भाग रहें।

 

                
? डॉ. सुनील शर्मा