संस्करण: 15 जुलाई -2013

सज़ाएँ

? राखी रघुवंशी

                पिछले महीने जब मेरा बेटा स्कूल का गृहकार्य किसी कारणवश नहीं कर पाया, तो सज़ा के रुप में उसे उसी गृहकार्य को दस बार करने के लिए दोबारा दिया गया। उस दिन अपना स्कूल का कार्य निपटने के लिए उसने तब तक खाना नहीं खाया,जब तक उसका गृहकार्य पूरा समाप्त नहीं हो गया। बिल्कुल यही स्थिति मेरे बेटी की भी है। कई बार उसके मुॅह से सुन चुकी हूॅ कि हमारी मेम छड़ी रखती हैं और यदि कोई बच्चा शरारतकरें या पढ़ाई ना करे तो मेम बहुत ज़ोर से गुस्सा होती हैं, फिर पनिश भी करती हैं।

               इस संदर्भ में एक और बात जरुर कहना चाहूंगीं कि हमारे ऑफिस में जो लड़का चाय लेकर आता है, उसके अनुसार सर और मेड़म ने उसे व उसकी कक्षा के बच्चों को गृहकार्य करके न लाने या अनुशासन बनाए न रखने के लिए छडी या मुक्के से पीठ पर कई बार मारा है। इस कारण वह स्कूल छोड़ रहा है और इसी कारण उसके कई दोस्तों ने भी स्कूल से अपना नाम कटवा लिया है।

                ये परिस्थितियां बहुत ही कठिन है और हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि हमें चिंतन की शुरुआत कहां से करनी होगी?हालांकि यह बात नहीं है कि सज़ा देने का तरीका नया है या इससे पहले किसी भी विद्यार्थी को उसकी उद्दंडता के लिए सज़ा न मिली हो । पहले शिक्षा के मायने ही दूसरे थे, और उसी तरह दी जाने वाली सज़ा का रुप भी दूसरा था। लेकिन जिस तरह आज शिक्षा और शिक्षक दोनों ही बदल गए है,उसी तरह विद्यार्थी भी अब पहले जैसे नहीं रहे!मुझे अच्छी तरह अपनी पढ़ाई के दिन याद हैं। शायद ही कभी हममें से किसी ने शिक्षक के सामने ऐसी कोई हरकत की हो जिससे हमें सज़ा के दौर से गुजरना पड़ा हो। यदि हमसे कभी कोई गलती हो भी गई हो, जैसे हमने गृहकार्य ना किया हो, शाला देर से पहुॅचे हों आदि, ऐसा होने पर आज की तरह हमें कड़ी धूप में अपने आप को सेंकना नहीं पड़ता था बल्कि कारण जानने के बाद आइंदा ऐसी गलती ना हो हिदायत दी जाती थी। हिदायत भी ऐसी की उसमें शिक्षक का प्यार और गुस्सा इतना कि हम अंदर तक दहल जाते थे।

                यह हिदायत हमें आगे गलती न करने के लिए हमेशा प्रेरित करती, ना कि आज की तरह मिलने वाली सज़ाएं जो आगे भी गलतियां करने का हौसला और शिक्षक के प्रति अपने मन में विद्रोह की भावना को बल दें या फिर हमें अपने आप में ही हिंसक बना दें।

                शिक्षा जगत में हिंसा व क्रुरता को कोई स्थान नहीं है, परंतु हाल की इन घटनाओं के बारे में सोचकर दिमाग में सवाल पैदा हुआ कि कही हमारे शिक्षक समुदाय शिक्षक बालक संबंधों को ताक पर रखकर हिंसा व कट्टरता के रास्ते पर तो अग्रसर नहीं हो रहा है। उक्त घटना यह सोचने पर विवश करती है कि सभ्यता के इस युग में विद्यार्थियों को शाला में दंड देना कितना उचित है ?

               छोटी - छोटी गलती करने, शाला देर से पहुंचने, गृहकार्य न करने और गुरूजनों की आज्ञा का पालन न करने पर बच्चों को ऐसी सजाएं दी जाती है कि संवेदनशील बच्चों के मन में पिटाई और विद्यालय का हौव्वा बैठ जाता है। उनका मनोबल क्षीण होता है और वे विद्यालय से डरने लगते है। कुछ लोगों का बल्कि यहां तक अभिभावको का भी मानना है कि बिना दण्ड या भय के बालकों में अपेक्षित सुधार असंभव है या उनमें अनुशासन विकसित नहीं हो सकता जैसे - ''भय बिना प्रीत नहीं''। परंतु यह कोई जरूरी नहीं कि भय से प्रीत का निर्माण हो अर्थात बालक सुधारे ही। कभी कभी इसके विपरीत प्रभाव पड़ने लगते हैं। जैसे धूप में खड़े होने से मेरी बेटी स्कूल जाने से कॉफी दिन तक डरी और गृहकार्य को भूख प्यास से ज्यादा अहमियत देकर सज़ा से खुद को दूर भी किया।

                इन घटनाओं से शिक्षकों का गैर जिम्मेदारना व्यवहार स्पष्ट परिलक्षित होता है। यदि हम यह मान भी लें कि बच्चे शरारती होते हैं, तो भी उन्हें दंड देना कितना न्यायोचित हो सकता है। बच्चों को अपना मनविज्ञान है जिसमें मनचाहा सुधार करना जितना मुश्किल समझा जाता है, उनता ही आसान हो सकता है उन्हें ठीक से समझा जाए। क्या यह आज की सच्चाई नहीं कि दूर दराज के जिन स्कूलों में गांवों  के जरूरतमंद बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं, वहां पढ़ाई का स्तर जितना बेकार है उतनी ही ज्यादा प्रताडना बच्चे झेलते हैं और दोहरे शोषण का शिकार होते हैं ?

               विद्यार्थी जीवन व्यक्तिगत निर्माण का महत्वपूर्ण काल होता है। इस समय प्राप्त  अनुभूतियों की स्पष्ट छाप भावी जीवन में दिखाई पडती है। विद्यार्थी काल में कठोर दंड अथवा भय के द्वारा बच्चों के बचपन को कुंठित करने का अर्थ है पूरे समाज को कुंठित करना। बच्चे तो मिट्टी की तरह हैं, जिन्हें शिक्षक चाहे जिस रूप और आकार में ढाल सकते हैं। प्रेम और अपनेपन से उसके कोमल मन में अपनी छबि को मधाुर करके उसे अच्छा इंसान बना सकते हैं। इसके विपरित दंड या भय युक्त वातावरण में बालक किसी भी बात को बिना अपनी समझ बनाए स्वीकार कर लेते है, जो कि आज के युग में अनुशासनहीनता का एक बड़ा कारण हो सकता है।

               शिक्षक व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। घर के बाद सबसे अधिक प्रभाव बच्चों पर शाला का ही पडता है। विद्यालय में दी जाने वाली सजाएं आम हैं, जिन्हें बच्चों के अभिभावक गंभीरता से नहीं लेते हैं। उक्त सजाओं से बच्चों का कितना आत्म विश्वास टूटता है, उन्हें मानसिक और शारीरिक कष्ट होता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। कुल मिलाकर यह एक परिदृश्य है, एक विकलांग और खोखला दृश्य जो शिक्षा जगत की दिशा दर्शाता है कि हम कहां जा रहे हैं। ये जो परिदृश्य हमारे सामने है उनमें कमजोर विद्यालय प्रणाली तो है ही लेकिन शिक्षकों द्वारा दी जाने वाली अदृश्य सजाएं भी हैं। निष्कर्षत: बालकों को किसी भी रूप में प्रताडित करने पर दोषी अध्यापकों को दंड दिये जाने का प्रावधन तो है, लेकिन अधिक आवश्यकता इस दिशा में सामाजिक जागरूकता की है। हम सब को खास कर स्कूल जा रहे बच्चों के अभिभावको को मिलकर चिंता करनी होगी कि विद्यालय की चार दीवारी के अंदर बच्चों का बचपन सुरक्षित है या नहीं। निर्माण काल की इस अवस्था के दौरान बच्चों में कौन सा निर्माण हो रहा है और क्या ऐसे निर्माण के लिए दंड और सजा को उसका एक जरूरी हिस्सा मान लिया जाए!

? राखी रघुवंशी