संस्करण: 15 जुलाई -2013

क्या शरिया अदालतों का गठन ही विकल्प है मुस्लिम महिलाओं के लिए ?

? अंजलि सिन्हा

                पारिवारिक मामलों में मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न तथा उसके खिलाफ न्याय की लड़ाई में अक्सर ही इस बात की चर्चा रहती है कि वे इसके लिए कहां जाएं? समुदायविशेष के होने के नाते पर्सनल कानूनों का सहारा लें या एक नागरिक होने के नाते संविधनप्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानूनों का सहारा लें। पिछले दिनों अहमदाबाद में आयोजित एक सम्मेलन ने इस सवाल को नए सिरे से मौजूं किया है।

               भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन ने घोषणा की है कि देश में शरिया अदालतों का गठन किया जाएगा, जिसकी शुरूआत अहमदाबाद, मुंबई, पुणे तथा तमिलनाडु के डिंडीगुल से होगी, फिर देश के अन्य हिस्सों - यूपी, बिहार, उडिसा, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, मधय प्रदेश तथा कर्नाटक आदि में इसका गठन होगा। संगठन की कर्ताधर्ता जकिया सोनम एवं नूरजहां साफिया ने कहा है कि ये महिला शरिया अदालतें पूरी तरह से कुरान के आयतों के आधार पर चलेंगी। उनका कहना था कि कट्टरपंथियों तथा रूढिवादियों के कारण पीड़ित महिलाओं को इन्साफ नहीं मिल पाता तथा मुती एवं काजी स्त्री के खिलाफ फैसले देते हैं। उनका यह आरोप सही भी है क्यों कि यहां पर्सनल लॉ के नाम पर पुरूषवादी सोच और सत्ता हावी है तथा महिलाएं न्याय की लड़ाई नहीं लड़ पाती हैं। ऐसे उदाहरण सामने आते रहते हैं जहां मुफ्ती ने पुरूष से घूस खाकर एक तरफा फैसला दिया।

                चर्चित गुड़िया-आरिफ मामले में भी गुड़िया की अपनी राय जानने की कोई जरूरत नहीं मानी गयी थी और गुड़िया को अपने वर्तमान पति से छुड़वाकर - जिसकी सन्तान उसके कोख में पल रही थी - उस पुराने पति के पास भेज दिया गया जो पिछले पांच साल से 'लापता' था अर्थात पाकिस्तान के जेल में बन्द था। अन्तत: गुड़िया इस दुनिया में ही नहीं रही।

             कुछ समय पहले सामने आयी शीरीं एव उसकी दो बहनों की कहानी इसी बात का एक उदाहरण है। इन तीनों महिलाओं के पतियों ने जो तीनों भाई थे अपनी पत्नियों को एक तरफा तलाक दे दिया और मुती ने भी घूस लेकर तलाक का सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया। बाद में इन तीनों महिलाओं ने मुफ्ती की अच्छी खबर ली तथा उसकी पिटाई भी की। इस मामले में स्थानीय महिला संगठनों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने तथा मीडिया ने भी उनका साथ दिया। किन्तु आम तौर पर अकेले संघर्ष करनेवाली औरत हार कर बैठ जाती है। अक्सर मुस्लिम पुरूष महिलाओं के पक्ष में बने किसी भी कानून को पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप बता कर लागू नहीं होने देते हैं। घरेलू हिंसा विरोधी कानून जब पास हुआ तब भी उन्होंने कहा कि यह उनके ऊपर लागू नहीं होता और बताया कि हमारे समुदाय में पहले से ही महिलाओं के लिए शरिया कानून मौजूद है। आखिर वे महिलाओं को यह छूट क्यों नहीं देना चाहते कि वे जहां चाहे, जैसे चाहे अपनी लड़ाई लड़े। भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन की यह घोषणा तात्कालिक रूप से हो सकता है कि ऐसे मर्दवादी हस्तक्षेप से मुक्ति दिलाए किन्तु वह भी कुल मिला कर महिलाओं के लिए दायरे को विस्तारित करने के बजाय पहले से चली आ रही सीमाओं को मजबूत बनाएगा। इन अदालतों के फैसले कितने प्रभावी होंगे और दूसरे मुती तथा रूढिवादी उन्हें कितनी छूट देंगे यह भी सन्देह के घेरे में है। पीड़क पुरूष क्यों नहीं फिर अपने पक्ष में फैसले के लिए पहले से मौजूद शरिया अदालतों के पास ही जाएगा।

              जकिया और साफिया कहती हैं कि भारत में मुस्लिम महिलाओं के विवाह कानून अलग हैं तथा उनकी स्थिति दयनीय है, उन्हें भी हिन्दू महिलाओं सरीखे अधिकार मिलने चाहिए। यह मुद्दा गम्भीर है कि आजादी के पैंसठ साल बाद भी हिन्दू महिलाओं को हिन्दू और मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम कानून के मातहत रखा गया है, उन्हें सिर्फ एक व्यक्ति, एक नागरिक के रूप में किसी भी अन्य पुरूष जैसे समान हक प्राप्त क्यों नहीं है ? महिलाओं के मुद्दे पर पुरूष क्यों वकालत करते हैं कि ''हमारी महिलाओं'' पर क्या कानून लागू हो? वे कब तक किसी की जागीर मानी जाती रहेंगी?

                उधर मद्रास हाईकोर्ट में एडवोकेट बदर सईद की याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है, जिसमें तीन तलाक को चुनौती देते हुए मांग की गयी है कि ''तलाक तलाक तलाक'' कह कर औरत को तलाक देने के तरीके को मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से हटाया जाए। धयान रहे कि मद्रास हाईकोर्ट ने ही कुछ ही समय पहले एक केस में लिव इन रिलेशन में रह रहे एक दम्पति जो दोनों मुस्लिम थे,उन्हें पति पत्नी माना और कहा कि पति अपनी जिम्मेदारियों से मुकर नहीं सकता। पति ने कहा कि चूंकि उसकी शादी नहीं हुई है लिहाजा वह उसकी पत्नी नहीं है, इन दोनों के तीन बच्चे भी हैं। बदर सईद उच्च न्यायालय में महाधिवक्ता हैं तथा जानीमानी शख्सियत भी। अपनी सफाई में उन्होंने कहा कि वे मुस्लिम पर्सनल लॉ को खतम करने की बात नहीं कर रही है।' सवाल यह है कि ऐसी सफाइयां पेश करने की क्या जरूरत पड़ जाती है ? दरअसल उन पर जबरदस्त दबाव है कि वे इस याचिका को वापस ले लें। उन्होंने अदालत में कई ऐसे केस के सबूत पेश किए हैं जो तीन तलाक प्रथा की शिकार हुई हैं। यह बार बार देखने में आता है कि तमाम काजियों ने एक तरफा तलाक को मान्यता दी है। ध्यान रहे कि अलवरपेट स्थित बदर सईद के घर पर भीड़ ने घेराव किया तथा उनके खिलाफ नारेबाजी भी हुई। शहर में उनके विरोध में पोस्टरिंग भी हुई। मुस्लिम संगठनों के लोगों ने उनसे मिल कर उन्हें याचिका वापस लेने का 'अनुरोध'किया अर्थात दबाव डाला। बदर सईद कहती हैं कि तलाक के मामलों में भले शरिया कानून लागू हो लेकिन इन मामलों में काजियों के बजाय कोर्ट द्वारा प्रमाणित किया जाए।

                मुस्लिम महिलाएं अपने हालात से खुद लड़ेगी और उसे बदलेंगी भी लेकिन इससे यह बात नहीं निकलती कि शेष समाज के स्त्री या पुरूष इन संघर्षों में कोई पक्ष न लें और तटस्थ बने रहें। समाज में किसी भी प्रकार के सही परिवर्तन या हक की लड़ाई में पक्षधारता बनाने का समय भी संघर्ष के बीच ही होता है और भूमिकाएं अदा करने का भी। यह समझने की जरूरत है कि मामला सिर्फ किसी विशेष धर्म का नहीं बल्कि किसी न किसी रूप में सभी धर्मों में महिलाओं की कमोबेश एक जैसी स्थिति को दिखाता है। सभी की तरफ से भरसक यही कोशिश की गयी है कि वे बराबरी पर आकर न खड़ी हो जाएं।  हमेशा ऊपर वाले का भय खड़ा किया गया। सारे आख्यानों की व्याख्या करने का ठेका सभी धर्मों के पुरूषों ने ले रखा है। महिलाएं उसे मानने के लिए सिर्फ इसलिए बाधय हैं क्योंकि वह बाते खुदा या ईश्वर के हवाले से कही जाती है। यह सब कौन कह रहा है क्यों कह रहा है इसके द्वारा वह क्या हासिल कर रहा है, कुछ छिपा नहीं रहा, फिरभी वही सत्तासम्पन्न ताकतवर और निर्देश देनेवाला है। चुनौती यही है कि महिलाएं जब तक स्वयं चुनौती देने की स्थिति में न आएं तब तक इनकी अन्तरात्मा स्वयं प्रकाश प्रज्वलित नहीं होनेवाली है।

? अंजलि सिन्हा