संस्करण: 15 जुलाई -2013

मप्र में मनमर्जी का राज

 

? महेश बाग़ी

                स्वर्णिम मध्यप्रदेश का सब्जबाग दिखाने वाली शिवराज सरकार ने प्रदेश को खोखला कर दिया है। एक ओर जहां नौकरशाहों के भ्रष्टाचार पर पर्दा डाला जा रहा है,वहीं दूसरी ओर ईमानदार अफसर सरकार की तानाशाही के शिकार हो रहे हैं। अवैध खनन के मामले में तो जैसे सरकार ने आंखें ही मूंद ली हैं। नतीजतन प्रदेशभर में जहां खनिज संपदा का अवैध दोहन हो रहा है,वहीं सरकारी खजाने को करोड़ों-अरबों की चपत लग रही है। गले-गले तक कर्ज मे डूबे प्रदेश को इस दलहन से उबारने की बजाय शिवराज सरकार उसे और रसातल में ले जा रही है। इससे प्रशासनिक ढांचा चरमराने के साथ-साथ भ्रष्ट अफसरान के हौसले बुलंद हो रहे हैं। प्रतिपक्ष द्वारा इस मतामले में सबूत पेश करने के बाद भी जिम्मेदार मुंह ढंककर सोए हुए हैं।

                भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद का ऐलान करने वाली शिवराज सरकार भ्रष्ट अफसरान की पोषक बन गई है। मनरेगा में हुए निर्माण कार्यों में खुलेआम भ्रष्टाचार किया गया। प्रारंभिक जांच में भ्रष्टाचार होना पाया भी गया, मगर बाद में उच्च स्तरीय जांच के नाम पर ये भ्रष्टाचार फाइलों में ही कैद होकर रह गए। आलम यह है कि अभी भी भ्रष्टाचार की 1777 शिकायतों को इंसाफ का इंतजार है। इनमें से कई शिकायतें तो पांच से छह साल पुरानी हैं। इसमें कई रसूखदारों की शिकायतें भी हैं, जो फाइलों में दबकर रह गई हैं। प्रदेश में मनरेगा की शुरुआत ही भ्रष्टाचार से हुई। इनमें से 58 फीसदी शिकायतों का निराकरण आज तक नहीं किया गया। मनरेगा में मार्च-2013 में 3060 शिकायतें आई थीं, जिनमें से 1777 शिकायतों को फाइलों में दबा दिया गया है। वर्ष 2009-10 में कुल 837 शिकायतें दर्ज की गई थी। प्रदेश कांग्रेस के बडे नेताओं ने भी इस मामले में सरकार का ध्यानाकार्षण किया था, परंतु सरकार ने उन पर ध्यान नहीं दिया। इसके अलावा प्रधनमंत्री,कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय से भी कई शिकायतें फारवर्ड होकर आईं, जो आज तक इंसाफ का इंतजार कर रही हैं। भ्रष्टाचार रोकने और भ्रष्टों को कडे दंड देने के संबंध में शिवराज सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम को और कड़ा बनाने की दिशा में कैबिनेट में मंथन किया था, किंतु जब इसे लागू करने की बारी आई, तो सरकार ने जांच की समय सीमा लागू करने संबंधी प्रस्ताव अधिनियम से विलोपित कर दिया। जाहिर है कि सरकार भ्रष्ट नौकरशाही का हित संरक्षण कर रही है। इसका प्रमाण खुद सरकार ने ही दे दिया है। गौरतलब है कि आईएएस निशात बरबडे ने जब रीवा जिला पंचायत के सीईओ थे, तब उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने बगैर निविदा आमंत्रित किए अपने रिश्तेदार के एनजीओ को लाखों के काम दे दिए थे। सूचना के अधिकारी के तहत मंत्रालय इस मामले की जानकारी देने में आनाकानी कर रहा है। इसकी द्वितीय अपील मुख्य सूचना आयुक्त कार्यालय में भी की गई थी, जिस पर तत्कालीन कलेक्टर को नोटिस जारी किया गया था और उन्होंने माफी भी मांगी थी। इसके बावजूद भ्रष्टाचार का यह मामला पांच साल से फाइलों में कैद है। रोचक तथ्य यह है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफसर को मुख्यमंत्री सचिवालय में उप सचिव बना दिया गया है। इससे साफ है कि सरकार भ्रष्ट नौकरशाहों का न सिर्फ बचाव कर रही है, बल्कि उनका संरक्षण-उत्थान भी कर रही है। अब इसी अफसर को राजधानी में कलेक्टर बना कर उपकृत किया गया है। आईएएस आरएन सक्सेना का मामला भी ऐसा ही है, जो खुलेआम भ्रष्टाचार करने के बाद मलाईदार पोस्टिंग पाने में सफल रहे।

                  इसके विपरीत जो अफसरान अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाह करते रहे, वे हत्या (कथित हादसे) के शिकार हुए या उन पर जानलेवा हमले किए गए। इसमें राजनीतिक दखल की बात भी प्रकाश में आई, किंतु शासन-प्रशासन पर इसका कोई असर नहीं हुआ। ताजा मामला ऑस्ट्रेलिया की ब्लैक लिस्टेड कंपनी रियो टिंटो का है, जिसने पूर्वेक्षण के नाम पर न सिर्फ अवैध हीरा खनन किया, बल्कि वन संरक्षण अधिनियम को धता बताते हुए जंगल भी साफ कर डाले। इस मामले में आईएएस अफसर राजेश बहुगुणा ने एफआर्इाआर दर्ज कराने की पहल की, तो उनका रातों-रात तबादला कर दिया गया। कहने की जरूरत नहीं कि सरकार उक्त कंपनी के हाथों अपना जमीर गिरवी रख चुकी है। ऐसा ही एक मामला जबलपुर का है, जहां एक अखबार समूह अवैध भवन में अधिवास की अनुमति दिलाने के लिए पशुपालन मंत्री अजय विश्नोई ने जबलपुर नगर निगम महापौर पर दबाव बनाया और उनके साथ बंद कमरे में घंटेभर तक चर्चाएं की। भ्रष्टाचार, अवैधानिकता और अनियमितता के मामलों की जांच की समय सीमा तय न होने के कारण लक्ष्मीकांत शर्मा अब तक मंत्री पद पर कायम हैं और पिस्तौल मामले की जांच अधर में लटकी है। शिवराज सरकार के ऐसे एक दर्जन से अधिक मंत्री हैं, जिनके विरुध्द भ्रष्टाचार के मामले की जांच लंबित है।

                 चुनावी साल में जनता को कल्याणकारी योजनाओं के सब्जबाग दिखाने वाली शिवराज सरकार यदि वास्तव में भ्रष्टाचार के विरुध्द लड़ने में सक्षम होती तो ऐसे मामले सामने नहीं आते। जाहिर है भ्रष्टाचार के मामले में सरकार की कथनी और करनी में अंतर है। ऐसे में प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है और सरकार खजाने की हालत खस्ता होती जा रही है। आम जनता पर करों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है और विकास के नाम पर सरकार कागजी योजनाओं की डुगडुगी बजा रही है। ऐसी सरकार को सबक सिखाने के लिए जनता कमर कस चुकी है और उसे उस समय का इंतजार है, जब वह उसे सबक सिखाए।

? महेश बाग़ी