संस्करण: 15 जुलाई -2013

फासीवादी राजनीति के उभार को समझना

बहुत जरूरी है

? दिग्विजय सिंह

               फासीवादी ताकतें अपने आपको महिमामंडित करने और अपनी विचारधारा को जनता की राष्ट्रीय भावना बताने का कोई अवसर नहीं चूकतीं। पूरी दुनिया में यही परम्परा है। अपने देश में सक्रिय फासीवादी ताकतें अपने महिमामंडन के लिए विदेशी पी आर कंपनियों तक का सहयोग लेने में संकोच नहीं करतीं। इनके पूर्व भी फासीवाद की यही प्रथा रही है। जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने जर्मनी को यहूदीमुक्त कराने का नारा दिया था। जब वह पूरी तरह से निरंकुश सत्ता में आया तो उसने अपने देश में रहने वाले यहूदियों को राष्ट्रविरोधी के रूप में घोषित करने एक लिए बाकायदा अभियान चलाया और उनको शोषक के रूप में चिन्हित कर दिया। इस काम में हिटलर को उस दौर के मीडिया ने भी बहुत मदद पंहुचायी। हिटलर के साथी गोयबल्स ने उसी दौरान यह सिध्दांत सफलतापूर्वक प्रतिपादित किया था कि अगर किसी झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच हो जाता है। आज भी फासीवादी शासक और पार्टियां सारे विश्व में इस नियम का पालन करती हैं। जर्मनी में यहूदी धर्म मानाने वालों को हिटलर ने इसी तरकीब का प्रयोग करके शोषक और देशद्रोही साबित करने की कोशिश की थी जिसके बाद उनकी प्रताड़ना का अभियान शुरू हुआ। हिटलर और उनकी पार्टी ने इस प्रताड़ना को राष्ट्रवाद का नाम दिया था। प्रताड़ना का यह अभियान दूसरे विश्वयुध्द के दौरान बहुत ही खूंखार रूप में पूरी सभ्यता को शर्मसार कर गया था ।

               राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक , एम एस गोलवलकर ने अपनी किताब , वी  ऑर  आवर नेशनहुड डिफाइण्ड ( We Or Our Nationhood Defined )  में हिटलर की उसके इन्हीं गुणों के कारण भूरि भूरि प्रशंसा की है ।आर एस एस के संस्थापक  के बी हेडगेवार के गुरु डॉ बी एस मुंजे भी फासीवादी दर्शन से बहुत प्रभावित थे ।डॉ मुंजे लन्दन भी गए थे जहां वे गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए थे। लन्दन के बाद उन्होंने यूरोप के अन्य देशों की यात्रा की। वे इटली गए जहां वे इटली के तानाशाह मुसोलिनी के मेहमान रहे। मुसोलिनी ने उन्हें सेना के शिक्षा के केन्द्रों को दिखाया। इस यात्रा का विवरण डॉ मुंजे की अपनी डायरी में मिलता है जहां उन्होंने तेरह पृष्ठों में मुसोलिनी का गुणगान किया है। आर एस एस के सभी नेता दुसरे विश्वयुध्द के पहले बहुत ही गर्व से स्वीकार करते थे कि उनकी विचारधारा पर जर्मनी के हिटलर और इटली के मुसोलिनी का भारी प्रभाव है ।उन दिनों यह खुले आम स्वीकार किया जाता था कि आर एस एस पर इन फासीवादी शासकों का प्रभाव है । यह सच है क्योंकि मुसोलिनी और हिटलर की राजनीतिक सोच की बुनियाद में इटली के राजनीतिक दार्शनिक माजिनी का भारी असर  है और  आर एस एस  की स्थापना के समय इस्तेमाल की गयी । वी डी सावरकर की किताब ' हिंदुत्व' लगभग पूरी तरह से माजिनी के प्रभाव में लिखी गयी है । बताते हैं कि हिटलर ने भी अपने लेखन में भारत की सांस्कृतिक संस्था , आर एस एस की कई बार तारीफ की थी ।अपनी इसी विरासत के कारण संघ न तो लोकतंत्र में विश्वास  करता है और न ही साम्प्रदायिक सद्भाव के पक्ष में कोई बात करता है।

               जिस तरह से हिटलर ने जर्मनी में यहूदियों की प्रताड़ना को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ा था उसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में भारतीय मुसलमानों की प्रताड़ना को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का लक्ष्य बना दिया है ।इसी सोच को आगे बढाने के लिए उन्होंने नारा दिया था कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान होता है। यह काम बहुत ही सोची समझी नीति और कार्यक्रम के अनुसार चल रहा था लेकिन  इस बीच कुछ ऐसा हुआ कि आर एस एस बैकफुट पर आ गया और इनकी योजना असफल हो गयी। महाराष्ट्र पुलिस के उच्च अधिकारी स्व हेमंत करकरे ने आतंकवादी हमलों के कुछ ऐसे मामलों की जांच शूरू कर दी जिसके बाद संघ से जुड़े कुछ लोग आतंकवादी घटनाओं में अपराधी के रूप पकडे गए। उसके बाद संघ के लोगों का आतंकवादी घटनाओं में पकडे जाने का सिलसिला शुरू हो गया। अब सबको मालूम है की संघ से जुड़े कुछ अति साम्प्रदायिक लोगों ने मालेगांव,  मोडासा, हैदराबाद , अजमेर और समझौता एक्सप्रेस में बम धमाके किये थे। यह बात अब साबित हो गयी है कि आर एस एस का एक ऐसा विभाग है जो आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देता है । इस सब के बाद क्या मैं संघ के लोगों से पूछ सकता हूँ कि यह तो पक्का है की हर हिन्दू आतंकवादी नहीं होता लेकिन जो भी हिन्दू आतंकवादी पकड़ा जाता है वह संघ से जुडा हुआ क्यों  होता है ? गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी संघ के प्रचारक रहे हैं । उन्होंने भी उसी फासीवादी विचारधारा को अपनाया है जिसके आधार पर संघ की स्थापना हुयी थी ।गुजरात पुलिस के कई अधिकारियों ने बताया है की गुजरात पुलिस ने नरेन्द्र मोदी को महिमा मंडित करने के लिए कई फर्जी इनकाउंटरकिया था। अब सबको मालूम है की नरेंद्र मोदी । प्रवीण तोगडिया और लाल कृष्ण आडवानी की कथित ह्त्या करने आ रहे जितने भी लोगों को इनकाउंटर में मारा गया सब गलत था ।उस अपराध की जब ठीक से जांच हुयी तो गुजरात पुलिस के कई अधिकारी जेलों में बंदहैं और कुछ फरार हैं ।जब से यह लोग जेलों में बंद हैं ऐसा एक भी मामला प्रकाश में नहीं आया जहां लोग मोदी की ह्त्या करने आ रहे हों और मार दिए जाएँ या पकडे जाएँ। क्या जब से यह अफसर पकडे गए हैं तब से इन लोगों की ह्त्या के इरादे से आने वाले लोगों ने गुजरात जाना बंद कर दिया है  ?

                इशरत जहां के पूरे प्रकरण में कुछ तथ्य उजागर करना जरूरी है। इशरत जहां प्रकरण में आई बी के अफसर राजेन्द्र कुमार का नाम बार बार आ रहा है । क्या श्री राजेन्द्र कुमार मिजोरम के पूर्व राज्यपाल स्वराज कौशल के सुरक्षा सलाहकार नहीं थे ? क्या श्री राजेन्द्र कुमार चंडीगढ़ में आई बी के उप निदेशक नहीं थे जब नरेन्द्र मोदी बीजेपी की ओर से हिमाचल प्रदेश के राष्ट्रीय प्रभारी थे ? क्या राजेन्द्र कुमार जी की पदस्थापना नरेन्द्र मोदी के कहने पर तत्कालीन गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवानी ने गुजरात में नहीं की थी ? 

               इशरत जहां और उनके साथ जिन तीन लोगों की हत्या की गयी थी उनके आतंकवादी होने या न होने के बारे में जांच चल रही है ।लेकिन यह प्रश्न उठ रहा है की किस कानून के तहत गुजरात पुलिस को उनकी हत्या का अधिकार मिल गया। जब यह सिध्द हो चूका है कि उन सबको गिरफ्तार किया गया था तो उन्हें न्यायालय के सामने क्यों नहीं पेश किया गया ।

               स्वयं गुजरात सरकार के मजिस्ट्रेट एस पी तमांग ने उपलब्ध सामग्री की जांच के आधार पर इशरत जहां के इनकाउंटर को फर्जी पाया था। अदालत के आदेश पर इशरत जहां प्रकरण की जांच का काम सी बी आई को दिया गया था। सी बी आई ने हाई कोर्ट की निगरानी में इस जांच के काम को पूरा किया है। गंभीरता पूर्वक और बारीकी से जांच करके ही सी बी आई ने अपनी प्रथम चार्जशीटदाखिल किया है जिसमें गुजरात पुलिस के अधिकारियों के साथ साथ आई बी के संयुक्त निदेशक राजेन्द्र कुमार के भी षडयंत्र में शामिल होने का उल्लेख है ।इस तथ्य से भाजपा और संघ क्यों विचलित हैं कि  सी बी आई सही काम कर रही है ? जब पवन बंसल और नवीन जिंदल के रिश्तेदारों के घरों पर सी बी आई के छापे पड़ रहे थे तब तो भाजपा के नेता उसकी प्रशंसा करते थे और उसके आधार पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकते थे और जब आंच भाजपा के नेताओं के ऊपर आती है तो उसी सी बी आई के खिलाफ बयानबाजी करते हैं ।

               यह भी जाँच का विषय है की गुजरात हाई कोर्ट में जिस दिन इशरत जहां का प्रकरण आने वाला था उसके एक दिन पहले एक न्यूज चौनल ने एक सी डी का आधार लेकर इशरत जहां को आतंकवादी साबित करने का अभियान चला दिया । उसी समय आई बी के निदेशक का एक पत्र भी उस चैनल के एंकर ने दिखाना शुरू कर दिया ।मैंने गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से इस बात का जाँच करने का अनुरोधा किया है कि यह पता लगाया जाए की वह सी डी प्रामाणिक है या नहीं । यह भी जांच किया जाय कि  आई बी के निदेशक महोदय का पत्र अगर इस तरह से लीक किया गया है तो उसको किसने लीक किया। यह भी समझने का विषय है कि यह मामला आफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के अधीन जांच का विषय बनता है कि नहीं।

               एन आई ए की के अनुसार हेडली ने अपने बयान में जो कुछ भी कहा है उसमें इशरत का नाम नहीं है। अब यह भी जांच का विषय है कि हेडली से पूछताछ करने जो तीन सदस्यीय दल अमेरिका गया था उसमें से किसी ने तीसरे दिन ही मीडिया  को यह लीक कर दिया कि हेडली ने इशरत जहां का जिक्र किया था। इस मामले में यह देखा गया है की आई बी, सी बी आई और एन आई ए में मौजूद सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट कर रहा है और कई बार तो काल्पनिक बातें भी रिपोर्ट की जा रही हैं,इन सूत्रों के बारे में सरकार और देश को एक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाया जाना चाहिए ।

               मैं मीडिया से और सभी राजनीतिक दलों से अपील करता हूँ कि जब तक जांच पूरी न हो जाए तब तक किसी प्रकार से ,बिना किसी प्रमाण के काल्पनिक सूत्रों का हवाला देकर किसी भी एक समुदाय को टारगेट न करें। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप भी उसी विचारधारा का समर्थन कर रहे होंगें जिसने आज के युग में हिटलर की राजनीति को सम्मानित बनाने का अभियान छेड़ रखा है। यह वही विचारधारा है जिसने महात्मा गांधी की हत्या की थी।

? दिग्विजय सिंह

(महासचिव, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी)