संस्करण: 15 दिसम्बर- 2014

बलात्कार के संस्कारों की पड़ताल

? .पी.शर्मा

             दिल्ली में टैक्सी से जा रही युवती के साथ उसी टैक्सी के ड्राइवर द्वारा कार में बलात्कार किये जाने की घटना के मीडिआ में आने से एक बार फिर देश शर्मसार है। पूरा देश इस घटना के बाद एक बार फिर उस "निर्भया" को स्मरण करने को विवश है जिसके बलिदान ने देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक आक्रोश की लहर पैदा कर दी थी। देश की संसद में इसपर गंभीर चर्चाये हुयी और महिला उत्पीड़न के खिलाफ कठोर कानून बनाये गए। उन पर अमल भी हो रहा है। लेकिन प्रश्न यह है यह है कि कानून बनाने और उसका कठोरता से पालन करवाने पर भी ऐसी घटनाएं क्यों नहीं थम रही है? फिर भी बलात्कार क्यों हो रहे है?

               यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम प्रत्येक समस्या का समाधान "कानून" में ढूंढते है। प्रत्येक अपराध को रोकने के लिए पुलिस पर निर्भर रहते है लेकिन इस बात पर विचार नहीं करते कि पुरुषों में यह मानसिकता पैदा कैसे होती है। यह बात सही है कि "काम अर्थात सेक्स" तत्व इस श्रष्टि का मूलभूत कारण है। यह न सिर्फ मनुष्यों बल्कि जंतुओं और वनस्पतियों में भी सामान रूप से पाया जाता है। श्रष्टि के संचालन के लिए यह उतना ही आवश्यक है जितना जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन। लेकिन यही काम वृत्ति जब "अनियंत्रित" हो जाती है तो उसके समक्ष सामजिक नियम और वैधानिक व्यवस्थाये तुच्छ हो जाती है।

                 ऐसा कामुक व्यक्ति यदि धनी और प्रभावशाली है तो वह अपनी वासना को शांत करने के लिए अपने धन और प्रभाव का इस्तेमाल कर लेता है। गरीबी या मजबूरी से ग्रस्त स्त्री ही ऐसे लोगों का शिकार होती है तथा वह इसे चुपचाप सहन कर लेती है। यदि यही उच्छृंकल कामवृत्ति रोटी, कपडा, मकान, स्वास्थ्य और सुरक्षा से वंचित व्यक्ति में अनियंत्रित हो जाये तो वह अपना शिकार वैसे तो किसी को भी बना सकता है लेकिन सामान्यतया उच्च, संभ्रांत वर्ग या उससे श्रेष्ठ जीवन जी रहे वर्ग की महिलाओं को बनाता है। इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि वह ऐसा करके वह अपनी अंधी "काम वासना" को तो तृप्त करता ही है, साथ ही "संभ्रांत" पर विजय का भाव भी महसूस करके की अपने मन को तुष्ट करता है। ऐसा बलात्कारी किसी कानून से नहीं डरता क्योंकि वह अपने आप को न्याय के लिए संघर्ष करता हुआ महसूस करता है। जब बलात्कारी अपनी इस मनोवृत्ति के साथ बलात्कार करता है तो उसे जेल जाना वैसा ही लगता है जैसे "सविनय अवज्ञा आंदोलन" करने पर गांधी जी गए थे। यदि ऐसे दुराचारियों को फाँसी की सजा भी दे दी जाये तो उनका मन उन्हें उनके "भगत सिंह" होने का अहसास करवाकर फांसी को भी सहजता से स्वीकार कर लेता है। ऐसे लोगों पर कितने भी कठोर कानून का ज्यादा असर नहीं पड़ता है।

                  व्यक्ति में ऐसी अंधी काम वासना पैदा होने के पीछे उसका बचपन होता है। उसके माता -पिता का आचरण और रहन-सहन होता है तथा सबसे बढ़कर वह आसपास का वातावरण होता है जिसमे वह पलता है। छोटी-छोटी झुग्गियों में रहने वाले लोग स्थानाभाव और विवशताओं के कारण अपने निजी पलों को उतना गोपनीय नहीं रख पाते जितना साधारण या संभ्रांत वर्ग के लोग रखते है। यही कारण है कि इन घरों में पलने वाले छोटे बच्चे अक्सर उन चीजों के साक्षी बन जाते है जो उनमे अंधी काम वासना के बीज बचपन से ही बो देती है। जैसे ही वे किशोरावस्था में पंहुचते है, अपने मानस पटल पर अंकित उन दृश्यों को साकार करने का प्रयत्न करते है तथा इसके लिए सबसे पहले अपने ही वर्ग, समुदाय और वातावरण की लड़कियों को निशाना बनाते है। ये घटनाएं अधिक चर्चित नहीं होती क्योंकि पीडि़त वर्ग भी समान वातावरण का होने के कारण इन्हे अधिक तूल नहीं देता। बलात्कारी को भी यह साधारण सा लगने लगता है। परिणामस्वरूप ऐसे बलात्कारी आगे चलकर संभ्रांत वर्ग की महिलाओं को अपना निशाना बनाते है और स्वयं को उनके बराबरी का या कहे अधिक ताकतवर महसूस करते है।

                ऐसा नहीं है कि "संभ्रांत वर्ग" के पुरुष बलात्कार नहीं करते। किन्तु उनके द्वारा किये गए अधिकाँश बलात्कार की खबरे चारदीवारी से बाहर नहीं आती है। यदि ऐसी घटनाओं पर ध्यान दिया जाये तो हमें पता चल जायेगा कि ऐसे लोग धनी होते है एवं कमजोर को अपना निशाना बनाते है, ऐसे अनेक मामले है जिनमे विरोध करने पर बलात्कार पीडि़ता को कुछ रुपये देकर चुप करा दिया जाता है। धनी वर्ग के पुरुषों में नारी के शोषण की वृत्ति जिन कारणों से पैदा होती है उनमे प्रथम कारण है, उनका यह सोचना कि गरीबों के लिए पहले रोटी है और बाद में सम्मान। वे सदैव रोटी की कीमत पर सम्मान को खरीदना चाहते है और ऐसा करते भी है। इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध पोर्न सामग्री भी ऐसे वर्ग के लोगों में बलात्कार की भावना विकसित करती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे देश में इंटरनेट पर ऐसी सामग्री को लेकर कोई कानून नहीं है।

                बहरहाल, यदि हम कानून और पुलिस के ही भरोसे रहते है तो बलात्कार को कभी नहीं रोक पाएंगे। जरुरी यह है कि इन अपराधों को प्रत्यक्ष रूप से रोकने के लिए कानून और पुलिस तो अपना काम करे ही। सरकार उस वर्ग को रोटी, कपडा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा और निजता का अधिकार भी उपलब्ध करवाये, जिस वर्ग में बलात्कारियों का पोषण होता है। इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध अश्लील और पोर्न सामग्री पर रोक लगाई जाये तो बलात्कार की मनोवृत्ति को काफी हद तक बदला जा सकता है। दंड अल्प समय के लिए अपराध को रोक सकता है, लेकिन अपराध समाप्त करने के लिए तो अंदर से बदलाव लाना होगा।

? .पी.शर्मा