संस्करण: 08 दिसम्बर- 2014

छुआछूत का दानव अभी जिंदा है

? राजीव कुमार यादव

               से भारतीय लोकतंत्र के विकास के लिहाज से शर्मनाक ही माना जाएगा कि संविधान द्वारा छुआ-छूत को समाप्त किए हुए भले ही 64 साल बीत हो गए हों, लेकिन भारतीय समाज में यह अब भी बड़े पैमाने पर जिंदा है। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर)और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैरिलैंड द्वारा करीब 42हजार भारतीय घरों में किए गए सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि देष में हर चैथा व्याक्ति छुआछूत को किसी न किसी रूप में मानता है। सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश के 53 फीसदी लोगों ने कहा है कि वे छुआछूत को मानते हैं। इस तरह छुआछूत को मानने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश पूरे देश में शीर्ष पर है। जहां तक उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों का हाल है, वे इस सूची में मध्य प्रदेश से पीछे हैं, लेकिन स्थिति यहां भी र्मनाक है। सर्वे में बताया गया कि छुआछूत के मामले में राज्यों में 50 फीसदी के साथ हिमाचल प्रदेश दूसरे स्थान पर है, जबकि छत्तीसगढ़ 48 फीसदी, राजस्थान और बिहार 47 फीसदी, उत्तर प्रदेश 43 फीसदी और उत्तराखंड 40 फीसदी के साथ छुआछूत के अक्षम्य अपराध को जिन्दा रखे हुए हैं। राजस्थान में तो हर जाति के लिए अलग अलग ान घाट तक हैं। जिन राज्यों में बेहतर स्थिति देखी गई उनमें पश्चिम बंगाल पहले स्थान पर रहा। यहां केवल एक फीसदी लोगों ने कहा कि वे छुआछूत मानते हैं। इसके बाद दो फीसदी के साथ केरल, महाराष्ट्र 4 फीसदी और अरुणाचल प्रदेश 10 फीसदी पर हैं।

             गौरतलब है कि इस सर्वे में जिन लोगों ने छुआछूत की बात को स्वीकारा है वे सभी धर्म या जाति से हैं। इसमें मुस्लिम, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लोग भी शामिल हैं। अगर जाति की बात की जाए तो इस सर्वे से यह बात भी सामने आई है कि सबसे ज्यादा छुआछूत ब्राह्मण समाज में माना जाता है। वहीं, धर्म की श्रेणी में सबसे पहले हिंदू फिर सिख और जैन धर्म का नाम आता है। व्यापक स्तर पर हुए सर्वे के नतीजों में पूरे भारत में करीब 27 फीसदी लोगों ने यह माना कि वे किसी न किसी प्रकार छुआछूत को मानते हैं, जिसमें 52 फीसदी लोग ब्राह्मण समाज से हैं। प्रमुख शोधकर्ता डॉ अमित थौरात के मुताबिक नतीजे इस बात का संकेत देते हैं कि भारतीय समाज में अभी भी जाति को प्राथमिकता दी जाती है।

               जहां तक धर्मांतरण द्वारा इस अभिाप से मुक्ति का मामला है, बेहद निराा ही हाथ आती है। सर्वे से यह साफ हुआ कि धर्मातरण से भी जातिगत अस्पृश्यता के मामले में लोगों की मानसिकता नहीं बदलती, क्योंकि जातिगत पहचान से पल्ला छुड़ाना अत्यंत कठिन होता है। ऐसे में ईसाई या मुसलमान बने दलित भी अस्पृश्यता के शिकार होते हैं, जबकि सरकार केवल हिंदू, सिख व बौद्ध दलितों को ही आरक्षण का लाभ देती है। इस तरह से इस सर्वे ने दलित से ईसाई और मुसलमान बनने वालों को भी आरक्षण का लाभ देने की मांग को एक बार फिर से बहस के केन्द्र में ला दिया है।

            लेनिन ने कहीं लिखा है कि मानव के लिए मानव ही सर्वोच्च तत्व है। इंसान और इंसान के बीच भेद करने वाली हर उस परंपरा को मिटना होगा, क्योंकि बेहतर कल की यह मांग है। भारत में जब तक जाति जिंदा है इसके दुष्प्रभाव भी जिंदा ही रहेंगे। जरूरत है जाति को मजबूत करने वाली चीजों का निर्ममता पूर्वक खात्मा। जाति व्यवस्था पर आधारित वर्णवाद, जो इस मुल्क की तबाही का एक बड़ा कारण रहा है, को समूल न्ट किए बिना इन समस्याओं का खात्मा नही किया जा सकता। इतिहास गवाह रहा है कि इस देश में दलितों को कभी इन्सान समझा ही नहीं गया बल्कि उनके साथ जाति के कारण पशुओं जैसा ब्यवहार किया गया। आज भी इन आंकड़ो से कमोवेश वही स्थिति दिखाई देती है। एक तरफ देश आधुनिकता और तरक्की की उचाइयां छूने को बेताब हैं। समानता की बातं की जाती है, शिक्षित होने का दंभ भरा जाता है। परन्तु दूसरी तरफ देश वासियों की मानसिकता अब भी सड़ी-गली है। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

            जहां तक इस समस्या के पीछे का सवाल है वह यह कि आजादी के 64 साल बीत जाने के बाद भी आज तक छुआछूत जैसे मानवता के प्रति अक्षम्य अपराध का खात्मा क्यों नही किया जा सका? इसके लिए पूरी तरह से दे का राजनीतिक तंत्र जिम्मेदार है। जब जाति राजनीति का आधार बन जाती है तो फिर जातिगत बुराइयां खत्म होने के बजाए मजबूत होने लगती हैं। पहले एक दलित को चमार कहने का मतलब था उसके मानवाधिकारों का हनन करना। लेकिन अब वह चमार कहलाए जाने में गर्व का अनुभव करता है। यह स्थिति राजनीतिक वजहों से बदली है जिसे अस्मिता की राजनीति कहते हैं।

               वैसे भी, छुआछूत के इस दानव को राजनीति ने ही अपने वोट बैंक के लिए पोषित किया है। देश में जाति एक सच्चाई है लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए जातिवाद के आधार स्तंभों जैसे वर्ण व्यवस्था को बाकायदा मजबूत किया गया है। दलित और पिछड़ी राजनीति के वाहक भी इसे मजबूत करने में पीछे नही रहे। जातिवादी राजनीति के उभार ने इस अभिाप को और मजबूत करने में महत्वपूर्ण भमिका अदा की है। क्योंकि अस्मिता की राजनीति जातिवादी तानेबाने के अंदर ही आधार पाती है। यही नहीं, अब तो छुआछूत का आधार स्तंभ रही वर्ण व्यवस्था को संघ के वैचारिक संगठन इस आधार पर मजबूत करने में लगे हैं कि दे के नागरिकों को इससे कोई िकायत नही रही है लिहाजा इसे अभिाप न मानते हुए बनाए रखा जाए। दीना नाथ बत्रा जैसे लोगों का यह मानना कि भारतीय सामाजिक ताने बाने के लिए वर्ण व्यवस्था अभिाप नही थी, यह साबित करता है कि इस दानव के खात्मे का सवाल ही नहीं है। जब कोई चीज राजनैतिक फायदा पहुंचाने लगती है तो भला राजनीति उसके खात्मे में दिलचस्पी क्यों दिखाएगी? जातिवाद और उसके आधार स्तंभ वर्णव्यवस्था के खात्मे के बिना छुआछूत के दानव का खात्मा नही किया जा सकता। क्या दे की राजनीति इस ओर जाने का साहस रखती है? अब तक का उसका चरित्र दर्ाता है कि कतई नहीं।
 

? राजीव कुमार यादव