संस्करण: 15 दिसम्बर- 2014

राजनैतिक प्रहसन में बदलती आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई

? मसीहुद्दीन संजरी

             ह राजनीति ही क्या जो सत्ता संघर्ष (युद्ध) में सब कुछ जायज़ न कर दे। पश्चिम बंगाल के लिए अगले वर्ष चुनाव होने हैं। केंद्र में सत्ता पर कब्ज़ा करने के बाद से भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं का उत्साह और आत्म विश्वास बढ़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल में एक बड़ी रैली को सम्बोधित करते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जहां एक तरफ ममता सरकार को उखाड़ फेंकने की बात कही, वहीं यह आरोप भी लगाया कि सारदा चिट फंड घोटाले के पैसों का उपयोग बर्दवान धमाके में किया गया है, बर्दवान धमाके में शामिल टीएमसी के नेताओं को बचाने के लिए एनआईए द्वारा की जा रही जांच में बाधा उत्पन्न की जा रही है। इससे पहले भी धमाके पर राजनीतिक बयानबाज़ी और आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला चलता रहा है। मोदी सरकार और भाजपा ने ममता पर आतंकवादियों को बचाने और आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया तो ममता बनर्जी ने जवाबी हमला करते हुए कहा कि बर्दवान धमाका भाजपा ने प्रदेश में हिंदू मुस्लिम दंगे करवाने के लिए करवाए थे। धमाके के दो बिंदु हैं एक राजनीतिक बयानबाज़ी एंव आरोप प्रत्यारोप और दूसरा जांच में अभूतपूर्व तेज़ी और उसमें सूराख।

           जहां तक राजनीतिक बयानबाज़ी का मामला है और जिस तरह के बयान नेताओं की तरफ से आए हैं उसमें आतंकवाद जैसी संवेदनशील समस्या पर राजनीतिक दलों की गम्भीरता दिखाई नहीं देती। आभास यह होता है कि देश की आंतरिक सुरक्षा इनकी प्राथमिक्ता में ही शामिल नहीं है। इस मामले में भाजपा और त्रिनमूल कांग्रेस दोनों एक ही पंक्ति में नज़र आती हैं। अमित षाह 30 नवम्बर को कोलकाता में भाजपा की रैली में जब यह आरोप लगा रहे थे कि राज्य सरकार एनआईए की जांच में बाधा डाल रही है, उससे पहले ही एनआईए और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड दोनों की तरफ से राज्य सरकार और राज्य पुलिस की तरफ से असहयोग के आरापों का खण्डन किया जा चुका था। 28 नवम्बर को एमसीसी चैम्बर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री के एक कार्यक्रम में एनएसजी के डायरेक्टर जे एन चैधरी ने साफ शब्दों में कहा था कि राज्य सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों के साथ असहयोग नहीं किया और न ही कोई ढिलाई दिखाई। उन्होंने यह भी कहा कि विस्फोट में आरडीएक्स का इस्तेमाल नहीं किया गया था। इसके बाद अमित शाह का यह बयान बम धमाके पर राजनीतिक रोटी सेकने के अलावा और कुछ नहीं है। ममता बनर्जी द्वारा खगरगढ़ में धमाका करवाने का आरोप भाजपा पर जवाबी हमला था। लेकिन राज्य सरकार के मुखिया होने के नाते उनसे और ज़्यादा जि़म्मेदारी की आषा की जानी चाहिए। यदि उनके पास इस तरह का कोई सबूत है तो उसके साथ उन्हें सामने आना चाहिए। यह बात अपनी जगह सही है कि इस धमाके को आतंकवादी धमाका साबित करने और इसे जिहादी आतंक से जोड़ कर साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाने की अमित शाह और भाजपा की कोशिशों की निंदा की जानी चाहिए। इस पूरे मामले में भाजपा की भूमिका यह साबित करती है कि उसकी प्राथमिक्ता आतंकवाद का समूल नाश नहीं बल्कि उसे सत्ता की सीढ़ी बनाना है।

             जैसे जैसे खगरागढ़, बर्दवान धमाके के रहस्यों से परदा उठता जा रहा वैसे वैसे अब तक की जांच पर भी सवाल उठने लगे हैं। बम बनाते समय होने वाले इस धमाके में दो लोगो की मौके पर ही मृत्यु हो गई थी। एनआईए के अनुसार शकील अहमद जिसने मकान किराए पर लिया था और करीम शेख की इस धमाके मे मौत हो गई। यह धमाका आतंकी धमाका था और मरने वालों का सम्बंध बंगलादेश स्थित आतंकी संगठन जमीअतुल मुजाहिदीन से था। लेकिन कुछ अन्य खुलासे एनआईए की जांच को ही संदेहास्पद बना देते हैं। अंग्रेज़ी की एक प्रतिष्ठित पत्रिका आउटलुक में प्रकाशित अजीत साही की रिपोर्ट में करीम शेख के पिता जमशेद शेख के हवाले से कहा गया है कि उसने अपने बेटे की लाश नहीं पहचानी थी बल्कि एनआईए ने उसे इसके लिए मजबूर किया था। उसका यह भी कहना है कि गांव में भी कोई उस लाश को नहीं पहचान सका था। पहचान का मामला इसलिए बहुत अहम हो जाता है क्योंकि 2, अक्तूबर को धमाके के बाद मरने वालों के नाम शकील अहमद और स्वप्न मंडल बताए गए थे। लेकिन जांच जिस तरह से आगे बढ़ती गई स्वप्न मंडल पहले सुवान मंडल फिर सुबहान मंडल और अंत में चालीस दिन बाद करीम शेख बन गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि धमाके के बाद पहली रिपोर्ट में कहा गया कि युवक ने अपना नाम स्वप्न मंडल बताया था जिसका मतलब यह हुआ कि वह हिंदू था। लेकिन बाद में कहा गया कि युवक ने अपने आपको सुवान मंडन या सुबहान मंडल कहा था। घटना स्थल से मात्र आधा किलोमीटर दूर रहने वाले पुलिस मुखबिर परवेज़ खान का कहना था कि वह घटना स्थल पर पुलिस के साथ पहुंचा था। वही स्वप्न मंडल को अस्पताल लेगया। उसने बताया कि स्वप्न मंडल का खतना नहीं हुआ था। करीम शेख का बचपन में ही खतना हो चुका था। इस आधार पर भी मृतक करीम शेख नहीं हो सकता। करीम के पिता जमशेद ने बताया कि एनआईए ने जो फोटो मोबाइल पर उसे दिखाया था वह लाश से मेल नहीं खाता। फोटो देखने के बाद इस बात की पुश्टि खुद परवेज़ खान ने भी की है।

             पश्चिम बंगाल में अपराधियों और राजनीतिक प्रतिद्वन्दियों द्वारा हिंसक संघर्षों में बम के प्रयोग का अपना एक इतिहास है। इसी वजह से बम बनाने और बेचने का कारोबार करने वाले भी प्रायः किराए की जगह का इस्तेमाल करते हैं और जगह बदलते भी रहते हैं। राजनीतिक दल ही इस तरह से बनाए गए बमों के सबसे बड़ खरीदार होते हैं। कहीं यह विस्फोट इसी तरह के कारोबार से जुड़ा हुआ तो नहीं है? मुस्लिम मजलिस मशावरत के एक प्रतिनिधिमंडल ने क्षेत्र का दौरा करके जो रिपोर्ट जारी की है वह इस बात की पुश्टि भी की है।

               केंद्र की भाजपा सरकार ने जिस तेज़ गति से इस कम तीव्रता वाले धमाके की जांच में हस्तक्षेप का माहौल बनाया था और जिस तरह से एनआईए की जांच पर सवाल उठाए जा रहे हैं निश्चित रूप से यह दुर्भाग्यपूर्ण है। एनआईए की जांच के अनुसार विस्फोट के तार जमीअतुल मुजाहिदीन से जुड़े हुए हैं और यह संगठन कुछ बड़े धमाके अंजाम देने की योजना बनाने के साथ ही बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की भी हत्या करना चाहता था। समझौता एक्सप्रेस धमाके के बाद लष्कर-ए-तैय्यबा पर आरोप लगाने के बाद भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। इसलिए मामले की गम्भीरता और संवेदनशीलता को समझना होगा। अगर एनआईए को अपनी विश्वसनीयता कायम रखना है तो इन सवालों के संतोषजनक उत्तर के साथ उसको सामने आना होगा और राजनीतिक दलों को भी सत्ता संघर्ष की सीमा तय करनी होगी।


? मसीहुद्दीन संजरी