संस्करण: 15 दिसम्बर- 2014

साजिश बनाम अंधविश्वासी आस्था

? विवेकानंद

                 बीजेपी सरकार बनने के बाद जिस तरह से धार्मिक आधार पर बयानबाजी और धर्मांतरण के कार्यक्रम चल रहे हैं वे कतई चैंकाने वाले नहीं हैं। चैंकाने वाली बात यह है कि इस साजिश को लोग समझ नहीं सके, और अब जबकि साजिश बेनकाब हो चुकी है तब सिवाए इंतजार के और कोई रास्ता नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि साजिशकर्ता समझ चुके हैं कि हम बेवकूफ हैं और जब अब तक साजिश को नहीं समझ सके तो आगे होने वाले उसके परिणामों को क्या समझेंगे? इसका प्रमाण सरकार ने संसद में तब दिया जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इस बात को स्वीकार कर रहा था कि हां हम धर्म परिवर्तन कराते हैं और सरकार विपक्ष की ओर से आरएसएस पर आरोप लगाए जाने का विरोध कर रही थी। संसद में केंद्रीय मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि धर्मांतरण की घटना से केंद्र सरकार का कोई लेना देना नहीं है। जब विपक्ष ने इस घटना का का कनेक्शन आरएसएस से जोड़ा तो नकवी ने कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि आरएसएस का नाम इस मामले से हटाया जाए। दूसरी ओर आरएसएस के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य कह रहे थे कि इसे धर्मांतरण नहीं घर वापसी कहिए। संघ कार्यकर्ता ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं। वे सबको सम्मानित करते रहते हैं। इससे साफ हो जाता है कि सरकार झूठ बोल रही है। क्या यह संभव है कि जो कुछ सरकार में चल रहा हो आरएसएस उससे अनभिज्ञ हो और जो कुछ आरएसएस में चल रहा है उसके कार्यक्रमों की सरकार को जानकारी न हो। कुछ अरसा पहले तक लोगों को ऐसा भ्रम हुआ करता था, लेकिन पिछले दिनों आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने जो किया और कहा उससे यह भ्रम समाप्त हो चुका है। सरकार को भलीभांति पता है कि आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन धार्मिक आधार पर समाज में जहर के बीच बोने में जुटे हुए हैं। चाहे बयानों के द्वारा हो या धर्मांतरण के सहारे। सरकार की ओर से एक मुस्लिम चेहरे ने जिस मासूमियत से कहा कि आगरा धर्मांतरण से सरकार का कोई लेना देना नहीं उसके पीछे उतनी ही गहरी साजिश छिपी हुई है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार धर्मांतरण पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी यूपी सरकार के सिर थोपने की बजाए संघियों और बजरंगियों को इस तरह के .त्य न करने का संदेश देती। दूसरी ओर सरकार की ओर से खुद बड़ी ही नफासत से ऐसे काम किए जा रहे हैं, जो यह संदेश देते हैं कि सरकार संघ का एजेंडा आगे बढ़ा रही है और अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए देश को हिंदू और मुस्लिमों में बांटने की कोशिश कर रही है। सबसे मजेदार बात यह है कि इनके पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं उनसे आम हिंदू असहमत तो हो ही नहीं सकता।

              बीजेपी, आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन बड़े ही शातिराना तरीके से समाज को बांटने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। इसके लिए दो तरफा कार्रवाई की जा रही है। एक ओर ऐसी आक्रामक बयानबाजियां हो रही हैं जो हिंदू को मुस्लिम के खिलाफ नफरत पैदा करती हैं, इसमें बीजेपी की बेलगाम ब्रिगेड मसलन योगी आदित्यनाथ, साक्षी महराज, गिरिराज सिंह, निरंजन ज्योति जैसे नेता शामिल हैं। दूसरी ओर बड़ी ही नफासत से आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने और ध्रवीकरण के जरिए पार्टी का आधार मजबूत करने में पार्टी के वरिष्ठ नेता जुड़े हैं। हाल ही में निरंजन ज्योति ने रामजादे और हरामजादे का तीर छोड़ा तो समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने ताजमहल पर दावा ठोक दिया। बीजेपी नेता उनसे एक कदम आगे चले और उन्होंने ताजमहल को मंदिर मंदिर करार दिया। इसी बीच केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने गीता का ज्ञान लेकर उपस्थित हुईं और उन्होंने गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग कर डाली। आजम खान अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखना चाहते हैं तो बीजेपी धु्रवीकरण के जरिए उत्तरप्रदेश समेत देशभर में अपनी उपस्थिति चाहती है। भला ऐसा कौन हिंदू होगा जो श्रीमद्भागवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने से इंकार करने वाला हो। वैसे भी गीता धार्मिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक ग्रंथ है, ऐसे तर्क दिए जा सकते हैं, जो सही भी हैं, इसलिए भी इसका विरोध लाजमी नहीं है। यद्यपि आध्यात्म की समझ रखने वाले कह सकते हैं कि गीता ज्ञान और कर्म का उपदेशक ग्रंथ है इसे किसी धर्म विशेष से जोडना ठीक नहीं है, फिर भी वह गीता के विरोध में नहीं जा सकता। अब जरा ध्यान दीजिए यदि गीता राष्ट्रीय ग्रंथ बन जाता है तो होगा क्या? क्या गीता को जो सम्मान आज मिलता है वह बढ़ जाएगा? नहीं, गीता का सम्मान वैसा ही रहेगा बस गीता को लेकर हमारे देश की स्थिति पाकिस्तान सरीखी हो जाएगी। पाकिस्तान में कठमुल्लाओं के दबाव में पाकिस्तानी सरकार ने ईशनिंदा कानून बनाया था, इस कानून के तहत ईश्वर या धार्मिक ग्रंथों की निंदा करने वाला कानूनन अपराधी होता है। ऐसी ही स्थिति भारत में होगी। अब तक भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। गीता के राष्ट्रीय ग्रंथ बनने के बाद संविधान की तरह इसका सम्मान करने के लिए लोगों को बाध्य किया जा सकता है, या अपमान करने वाले को सजा दी जा सकती है। इसका निशाना कौन बनेगा? जाहिर है इसका विरोध केवल मुसलमान या ईसाई ही कर सकते हैं, या यह मांग कर सकते हैं कि कुरान और बाइबल को भी इतना ही गौरव दिया जाए। यानि नफरत की सियासत जारी रखने का यह सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकता है। अब इसका दूसरा राजनीतिक लाभ भी देखिए। उत्तर प्रदेश में अयोध्या और मथुरा दोनों ही जन्म भूमियां हैं। अयोध्या का तीर फेल हो चुका है, अब बीजेपी इसे कोई खास तबज्जो भी नहीं दे रही है। इसलिए अब सारा जोर मथिुरा पर है। पर मथुरा पर बीजेपी की रणनीति अयोध्या से अलग है। अयोध्या में राम की तरह यदि मथुरा में कृष्ण का मामला उठाया जाता तो हो सकता है कि बीजेपी को इसका लाभ न मिले। लेकिन .ष्ण की गीता को सम्मान दिलाने के लिए मदूसूदन के ग्वाले बीजेपी के पीछे हो सकते हैं। और बीजेपी का लक्ष्य भी यही है। बीजेपी उत्तर प्रदेश और बिहार के यादव समाज को अपने से जोड़कर मुलायम सिंह और लालू यादव की जड़ेें कमजोर करना चाहती है। दूसरी ओर धर्मांतरण है। हिंदुओं के दिमाग में यह बात बैठाई जा रही है कि देश में रहने वाले सभी हिंदू हैं, जो समय-समय पर किसी कारण बस, मसलन दबाव में या लालच में मुसलमान बन गए। यह ऐसा तर्क है जिस पर कोई भी भारतवासी जो हिंदू धर्म से ताल्लुक रखता है असमंजस में पड़कर सही मान सकता है। क्योंकि ऐतिहासिक तथ्य यही है कि मुसलमान भारत के हैं नहीं भारत में आए थे। लेकिन सवाल यह है कि जिनके पुरखे मुसलमान थे या हिंदू से मुसलमान बन गए थे, उनकी संतानें इस बात को क्यों मानें? ऐसे लाखों मुसलमान होंगे जो इसे स्वीकार नहीं करेंगे, यही अस्वीकार झगड़े का जड़ बनेगी। और बीजेपी यही चाहती है कि हिंदू-मुसलमान जितना लड़ेंगे उसका वोट बैंक उतना पक्का होगा। देखना यह है कि अंधविश्वासी आस्था की आड़ में यह सियासी साजिश का यह खेल देश को किस दिशा में ले जाता है और बीजेपी इसमें कितनी कामयाब होती है?

 

? विवेकानंद