संस्करण: 15 दिसम्बर- 2014

क्या सभी भारतीय रामजादे हैं?
 

?  राम पुनियानी

             भारत में साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन के दौरान, महात्मा गांधी देश के शीर्षतम नेता के रूप में उभरे और उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया। गांधीजी के लिए राष्ट्रपिता शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले सुभाषचंद्र बोस ने सन् 1944 में अपने एक रेडियो भाषण में किया था। बाद में, बहुसंख्यक भारतीयों ने इस नामकरण को स्वीकार किया और अपनाया। कहने की आवश्यकता नहीं कि मुस्लिम और हिंदू सांप्रदायिक तत्वों ने गांधीजी को कभी राष्ट्रपिता नहीं माना। उन अधिकांश भारतीयों ने गांधीजी को राष्ट्रपिता के रूप में स्वीकार किया जो उनके नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन में भागीदार थे और जो देश के सभी लोगों को एक करने में गांधीजी की भूमिका से प्रभावित थे।
भारत को निर्माणाधीन राष्ट्र निरूपित किया गया न कि सदियों से अस्तित्व में रहा राष्ट्र, जैसा कि धार्मिक राष्ट्रवादी मानते थे। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों के लिए मुस्लिम राष्ट्र स्थापित हुआ था 8वीं सदी ईस्वी में सिंध में मोहम्मद-बिन-कासिम के शासनकाल में। हिंदू सांप्रदायिक तत्वों की दृष्टि में भारत हमेशा से हिंदू राष्ट्र था। गांधीजी ने सभी भारतीयों के बीच बंधुत्व का भाव विकसित करने के लिए महती प्रयास किए और इसलिए हिंदू-मुस्लिम एकता उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। यह तार्किक भी था, क्योंकि तत्कालीन भारत में ये ही दो मुख्य धार्मिक समुदाय थे। गांधीजी ने सभी धर्मों के नैतिक मूल्यों को अपनाया और वे विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोगों को भारतीय पहचान के झंडे तले लाने में सफल रहे। उनके प्रयासों का सांप्रदायिक ताकतों ने पूरी ताकत से विरोध किया और इस विरोध की अंतिम परिणिति थी सन् 1948 में उनकी हत्या।

                उनकी हत्या के बाद भी संप्रदायवादियों का घृणा-आधारित प्रचार और देश को बांटने वाली गतिविधियां जारी रहीं। हां, समय के साथ उनका रूप बदलता गया। अधिकांश मुस्लिम संप्रदायवादी पाकिस्तान चले गए। जो भारत में रह गए, उनमें से उभरे अकबरउद्दीन ओवैसी जैसे लोग, जो हिंदुओं के खिलाफ घृणा फैलाने का काम करते रहे। इसके समानांतर, हिंदू सांप्रदायिक संगठनों ने इतिहास का सांप्रदायिकीकरण करना जारी रखा। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लिखित भारत के इतिहास को मान्यता दी, जिसमें मुस्लिम राजाओं का दानवीकरण किया गया था और मुसलमानों को विदेशी बताया गया था। इसको आधार बनाकर कई मिथक खड़े किए गए। इस दानवीकरण का चरम था यह नारा कि बाबर की औलाद, जाओ कब्रिस्तान या पाकिस्तान। इसी श्रृंखला में एक ताजा बयान यह है कि जो लोग अपनी पहचान को भगवान राम से जोड़कर नहीं देख सकते वे हरामजादे हैं और यह देश केवल रामजादों का है। सभी अन्य लोगों के साथ अजनबियों जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।

                इस बयान को आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत के उस हालिया वक्तव्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने फरमाया था कि हम सब हिंदू हैं और यह देश हिंदुस्तान है। इसका अर्थ यह है कि भगवान राम, हिंदुस्तान अर्थात भारत के प्रतीक हैं और शायद इसलिए, केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने कहा कि मोदी ने यह मंत्र दिया है कि न तो हम रिश्वत लेंगे और न दूसरों को लेने देंगे। अब आपको यह तय करना है कि आप किसे चुनेंगे-रामजादों को या हरामजादों को। यहां यह याद रखना प्रासंगिक होगा कि भारतीय संविधान इस देश को केवल इंडिया या भारत कहता है।

               जहां विपक्ष ने साध्वी को मंत्रिमंडल से हटाए जाने की मांग की और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही पर जोर दिया वहीं भाजपा यह कहकर उनका बचाव किया कि उन्होंने अपने कथन के लिए माफी मांग ली है और वे अभी-अभी मंत्री बनी हैं और दलित परिवार से हैं। विपक्ष का तर्क यह है कि उन्होंने भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली है और उनका बयान, न केवल घृणा फैलाने वाला और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच बैरभाव बढ़ाने वाला है वरन् वे भारतीय संविधान का उल्लंघन करने की दोषी भी हैं। विपक्ष का कहना है कि उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस धारा के अंतर्गत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक के कारावास की सजा हो सकती है। इस धारा के अंतर्गत मुकदमा चलाने के लिए सरकार की अनुमति आवश्यक है। यद्यपि हमारे देश में सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है परंतु यह स्वतंत्रता किसी को भी घृणा फैलाने की इजाजत नहीं देती। धारा 153-ए उन लोगों को अपराधी ठहराती है जो धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देते हैं या ऐसे कार्य करते हैं जिनसे देश की एकता पर विपरीत प्रभाव पड़ता हो। इस धारा के अंतर्गत हमारे देश के कई नेताओं पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इनमें से कुछ हैं अकबरउद्दीन ओवैसी, राज ठाकरे, प्रवीण तोगडि़या और वरूण गांधी। ये सभी समय-समय पर दूसरे समुदाय के विरूद्ध अनर्गल प्रलाप करते रहे हैं। इस तर्क में कोई दम नहीं है कि चूंकि साध्वी ज्योति दलित हैं इसलिए उन्हें क्षमा कर दिया जाना चाहिए। दरअसल, वे संघ की विचारधारा में पूरी तरह घुलीमिली हैं। इस तर्क की भी कोई प्रासंगिकता नहीं है कि सोनिया गांधी ने मौत के सौदागर शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने इस शब्द का प्रयोग, सांप्रदायिकता के राजनैतिक इस्तेमाल की ओर इशारा करते हुए किया था न कि किसी विशेष धार्मिक समुदाय के संदर्भ में।

            यद्यपि ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि भाजपा नेतृत्व साध्वी के इस बयान से सहमत नहीं है परंतु सच यह है कि इस तरह के विचार और बयान, संघ परिवार की राजनीति से ही उपजते हैं और वही राजनीति, भाजपा को सत्ता में लाई है। भाजपा, संघ परिवार के हिंदू राष्ट्रवाद के एजेण्डे को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह की घृणा फैलाने वाली बातों और विभाजनकारी एजेण्डे का मुकाबला हम कैसे करें? हम सब को याद है कि अकबरउद्दीन ओवैसी को अपने भड़काऊ भाषणों के कारण कड़े विरोध और निंदा का सामना करना पड़ा था। इस सिलसिले में डाक्टर प्रवीण तोगडि़या कुछ दिनों के लिए जेल की मेहमानी भी कर चुके हैं। डाक्टर तोगडि़या उत्तेजक और भड़काऊ भाषा के इस्तेमाल में सिद्धहस्त हैं। एक वीडियो में उन्होंने यह बताया है कि कैसे अपने मुस्लिम पड़ोसियों पर टमाटर फेंककर उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। परंतु वे अब तक सजा से बचते आए हैं। साध्वी ज्योति के वक्तव्य से मिलतीजुलती बात उत्तरप्रदेश के भाजपा नेता रामप्रताप चैहान ने आगरा में 21 नवंबर 2013 को आयोजित शंखनाद रैली में कही थी परंतु उस पर मीडिया ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। इस सबसे यही पता चलता है कि साध्वी का वक्तव्य, संघ परिवार की सोच को ही प्रतिंबिबित करता है।

            भाजपा का नेतृत्व दुविधा में है। संसद में और दुनिया को दिखाने के लिए उसे विकास का मुखौटा पहनना पड़ता है। दूसरी ओर, अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए उसे अपने पितृसंगठन व उससे जुड़े अन्य संगठनों और पार्टी के भीतर के कई तत्वों के विघटनकारी एजेण्डे पर भी चलना पड़ता है। इसलिए बहुत होशियारी से पार्टी एक ओर साध्वी से माफी मंगवा देती है तो दूसरी ओर इस तरह की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए कुछ नहीं करती। जहां भी चुनाव होने वाले होते हैं वहां पार्टी अपने इस विभाजनकारी एजेण्डे का इस्तेमाल वोट पाने के लिए करती है।

                प्रश्न यह है कि भारतीय राष्ट्र का पिता कौन है-गांधी या राम? राम एक पौराणिक चरित्र हैं जिनपर बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धा करते हैं। वे अयोध्या के राजा थे। रामकथा के प्रचलित संस्करण की डॉक्टर अंबेडकर द्वारा की गई आलोचना, साम्प्रदायिक जुनून के शोरगुल में गुम सी हो गई है। अपनी पुस्तक रिडल्स ऑफ हिन्दुइज्म में अंबेडकर ने कहा है कि राम लैंगिक और जातिगत ऊंचनीच के समर्थक थे। राम ने शंबूक का वध किया था जोकि एक शूद्र था और तपस्या कर रहा था। इसकी अंबेडकर ने कड़ी आलोचना की है। इसी तरह, राम द्वारा अपनी गर्भवती पत्नी सीता को घर से निकालने का प्रसंग भी अत्यंत गंभीर है। अंबेडकर, राम द्वारा बलीराजा की हत्या का मुद्दा भी उठाते हैं। बली, दलित-बहुजनों के लोकप्रिय राजा थे और उन्हें राम ने पीछे से हमला कर मारा था। राम के बारे में इसी तरह के कई मुद्दे पेरियार रामासामी नाईकर ने भी उठाए थे।

           जहां यह दावा किया जाता है कि हम हमेशा से हिंदू राष्ट्र रहे हैं वहीं सच यह है कि भारत, गांधीजी के नेतृत्व में चलाए गए साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन के कारण राष्ट्र-राज्य के रूप में उभरा। इसलिए यह कहना कि सभी भारतीय रामजादे हैं कोरी बकवास है। निःसंदेह, अनेक हिन्दू राम के पूजक हैं परंतु भारतीय के रूप में गांधी हमारे राष्ट्रपिता हैं। राम, हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं जबकि गांधी भारतीय राष्ट्रवाद के।

          सन् 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से आरएसएस बैखोफ होकर अपना एजेन्डा लागू कर रहा है। उन लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है जो भारतीय संविधान और स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों के पैरोकार हैं। रामजादे को भारतीयता का पर्यायवाची बताने के प्रयास, दरअसल, उन ताकतों को मजबूती देने की कोशिश है जिन्होंने गांधीजी की हत्या की और इस दुष्टतापूर्ण कार्य का जश्न मनाया। वह हमारे स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों पर पहला हमला था।(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

  

? राम पुनियानी