संस्करण: 15 दिसम्बर- 2014

एम.पी.टी. एक्ट में संशोधन होगा महिलाओं के लिए घातक
 

? डा. गीता गुप्त

         भारत में गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित प्रसव हेतु न परिवार और समाज में पर्याप्त जागरूकता है और न सरकार सही मायनों में चिंतित जान पड़ती है। यहां आज भी बच्चे भगवान की देन माने जाते हैं और प्रायः दम्पतियों द्वारा गर्भाधान के पूर्व कोई मानसिक तैयारी नहीं की जाती और बाद में भी आवश्यक सावधानियां नहीं बरती जातीं। सरकारी योजनाओं का निर्माण भी भले ही स्त्री के हितों को ध्यान में रखकर किया गया हो, पर उनके क्रियान्वयन में यह हित-चिंतन कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। संभवतः इसीलिए भारत में मातृ मृत्यु दर के साथ-साथ नवजात शिशुओं के मृत्यु दर में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। और अब केन्द्र सरकार जिस तरह का बदलाव गर्भवती संबंधी नियमों में लाने जा रही है, उससे गर्भवती स्त्रियों का जीवन और भी खतरे में पड़ जाएगा।

                  केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा वर्तमान मेडिकल टर्मिनेशन आॅफ प्रेग्नेंसी एक्ट नर्स, एएनएम, दाइयों और परम्परागत चिकित्सकों (आयुर्वेदाचार्यों, होम्यौपैथी विशेषज्ञों, पैरा मेडिक्स, यूनानी चिकित्सकों आदि) को भी गर्भपात करने की अनुमति दे दी जाएगी। नये अधिनियम के अनुसार, पहले इन्हें गर्भपात के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। तदुपरान्त पात्रता हेतु पंजीकरण संख्या आवंटित की जाएगी। ध्यान रहे कि अभी केवल एम.बी.बी.एस. डाॅक्टर और स्त्री विशेषज्ञ चिकित्सक को ही गर्भपात करने की अनुमति है। गर्भपात कराने की समय सीमा भी तीन माह तक ही है। लेकिन अब गर्भपात कराने की अवधि में भी वृद्धि का प्रस्ताव है। अब महिलाएं तीन माह की बजाय छह माह के भीतर भी गर्भपात करवा सकेंगी। इस संदर्भ में जो कानूनी बाधाएं आती हैं, उन्हें भी दूर किया जाएगा। सरकार का मानना है कि अल्पशिक्षित और अशिक्षित महिलाएं गर्भ धारण के विषय में सही समय पर नहीं जान पातीहैं अतएव कई बार तीन माह का समय बीत चुका होता है और वे गर्भपात नहीं करवा पातीं।

           केन्द्र सरकार द्वारा एम.टी.पी.एक्ट में प्रस्तावित संशोधन से चिकित्सा-जगत में हड़कम्प मच गया है। इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन (आई.एम.ए.) के प्रतिनिधियों ने इसका विरोध करते हुए प्रधानमंत्री व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. हर्षवर्धन को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि प्रस्तावित विधेयक को तत्काल वापस लिया जाए क्योंकि यह बहुत ही खतरनाक कदम है। दरअसल प्रश्न परम्परागत चिकित्सकों एवं पैरामेडिक्स की योग्यता का नहीं है बल्कि तथ्य यह है कि ऐलोपैथी से संबंधित चिकित्सक व पैरामेडिकल स्टाफ भी अपने दम पर गर्भपात की प्रक्रिया सम्पन्न करवाने में सक्षम नहीं होते। इसलिए कि उन्हें गर्भपात संबंधी नाजुक चिकित्सा स्थितियों से निपटने का सम्पूर्ण प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। यहां तक कि प्रशिक्षित स्त्री रोग विशेषज्ञ भी जब गर्भपात करवाती हैं तो भी स्त्रियों की दशा चिंताजनक होती है। उनके सामने कई खतरे होते हैं, यहां तक कि संक्रमण के कारण वे स्थायी रूप से बांझपन अथवा मृत्यु का शिकार भी हो सकती है। इसी कारण क्लीनिकल स्टेब्लिसमेण्टस एक्ट के तहत गैर एम.बी.बी.एस. चिकित्सकों एवं पैरामेडिकल स्टाॅफ को भी गर्भपात करने की अनुमति नहीं है। उन्हें गर्भपात करने की अनुमति देना तो स्त्रियों के जीवन से खिलवाड़ करना होगा।

        प्रस्तावित संशोधनों में गर्भपात कराने की अवधि 24 सप्ताह तक बढ़ाने का प्रावधान भी सम्मिलित है। इसका एक पहलू यह है कि प्रति वर्ष लाखों महिलाएं अनचाहे गर्भ की समस्या से जूझती हैं। उन्हें विकृत गर्भ की विडम्बना का पता गर्भावस्था के आरम्भिक चरण में नहीं लग पाता। हृदय संबंधी विकृतियों का पता भी 22 सप्ताह बाद लगता है। गर्भ में घातक विकार की स्थिति में उक्त प्रावधान का लाभ महिला को होगा क्योंकि ऐसी दशा में गर्भपात की निश्चित अवधि का नियम लागू नहीं होगा। लेकिन गर्भपात की अवधि बढ़ाने के साथ-साथ सरकार को कुछ ठोस और कड़े नियम भी बनाने होंगे अन्यथा दूसरी जटिलताएं उत्पन्न हो जाएंगी। मसलन, अल्ट्रा सोनोग्राफी के माध्यम से भ्रूण का लिंग जान कर कन्या भ्रूण होने की स्थिति में गर्भपात न करा दिया जाए, यह आशंका बनी रहेगी। फिर तो लिंगानुपात का खतरा और बढ़ जाएगा।

          निस्सन्देह, सरकार का रुझान आयुर्वेद से प्रभावित प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति में है। इसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। यह भी सच है कि देश में एम.बी.बी. एस. चिकित्सकों की बहुत कमी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सरकार पारम्परिक चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञों को गर्भपात करने की अनुमति दे दे। ऐसा करना नीम हक़ीम खतरे जान को बढ़ावा देना होगा। एलोपैथी चिकित्सकों के अभाव में आयुष चिकित्सकों को यह दायित्व सौंपना महिलाओं के जीवनाधिकार की अवहेलना करना है। इससे अवैध गर्भपात का कारोबार ही पनपेगा और बेटियों से जीवन का अधिकार छिनता चला जाएगा। नीम हकीमों को गर्भपात करने का अधिकार मिल जाने से कन्या भ्रूण हत्या पर विराम लगना असम्भव हो जाएगा। सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि यह गर्भपात के अधिकार और बेटियों के जीवन के अधिकार में संतुलन का समय है। गर्भपात संबंधी कानून को उदार बनाने के लिए संशोधन करना गलत नहीं है, मगर आधी आबादी की जिंदगी और मौत से जुड़े मामलों पर राष्ट्रीय बहस और आम सहमति के बाद ही कोई कदम उठाया जाना चाहिए।
                
? डा. गीता गुप्त