संस्करण: 15 दिसम्बर- 2014

दमन नहीं, संवाद से सुलझेगी नक्सल समस्या

? सूर्यकान्त धस्माना

          भारत में नक्सलवाद का मौजूदा परिदृष्य दिन प्रति दिन अत्यन्त भयावह होता जा रहा है। छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने एक बार फिर से बड़ा हमला किया है। सोमवार को सुकमा जिले के चिंतागुफा क्षेत्र में सीआरपीएफ के गश्ती दल पर घात लगाकर किए गए नक्सली हमले में डिप्टी कमांडेंट और असिस्टेंट कमांडेंट समेत 14 जवान शहीद हो गए हैं और दर्जनों जवान हीद घायल हुए हैं। नक्सली हिंसा की व्याधि छत्तीसगढ़ में तो लगता है कि लाइलाज हो चुकी है। बार-बार वही सुकमा और बार बार वही नक्सली हमला। इस ताज़ातरीन घटना ने एक बार फिर से इस विषय पर बहस छिड़ गई है कि आखिरकार इस समस्या का निपटारा कैसे किया जाए? कोई कह रहा है कि इस समस्या से निपटने के लिए वार्ता का हल ढूंढा जाए तो कोई इस बात पर बल दे रहा है कि नक्सलियों के ख़ात्मे के लिए सैन्य बलों का प्रयोग किया जाए। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से 60 के दशक में शुरू हुआ नक्सल आंदोलन आज छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा समेत कुल नौ राज्यों में फैला हुआ है। लाल आतंक ने देश के 160 जिलों को अपनी चपेट ले लिया है। इन चार-पांच दशकों में नक्सलियों ने अपने नेटवर्क का खासा विस्तार कर लिया। कुल 92 हजार वर्ग किमी. भूमि इनके कब्जे में है और कमोबेश 70 हजार प्रशिक्षित कार्यकर्ता इनके विभिन्न गुटों में शामिल हैं। इनके संबंध आईएसआई से होने के भी संकेत मिल रहे हैं। उन्हें चीन से भी मदद मिलने की बातें यदा कदा सामने आती रहती हैं। इन हालातों में यदि हम नक्सलियों को लेकर थोड़ी भी लापरवाही और बरते तो आंतरिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। बीते कुछ सालों में प. बंगाल, आंध्र प्रदेश व ओडि़सा में तो नक्सली हमलों पर कुछ हद तक तो काबू पाया जा सका है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह अभी भी गंभीर चुनौती बना हुआ है। नक्सलवाद मूलरुप से माक्र्सवाद के वर्ग संघर्श के सिद्धान्त पर आधारित है। इसके तहद शोषित, उपेक्षित एवं दलित वर्ग अपनी संघर्शषक्ति से पूंजीपतियों , जमींदारों, साहूकारों एवं शासकों को शिकार बनाते हैं और शासकवर्ग की राजसत्ता को लूटना अपना अधिकार मानते हैं। नक्सलवादियों के इस अधिकार प्राप्त करने में जो बाधा पहुंचाता है, उसे समाप्त कर देना चाहिए तभी सर्वहारा शासन-तन्त्र की स्थापना हो सकेगी , ऐसी उनकी धारणा है। यद्यपि इसका वास्तविक उद्देश्य सामाजिक , राजनीतिक एवं आर्थिक समानता स्थापित करना है, किंतु अकारण हिंसा , अपराध एवं उग्रवाद अपनाने के कारण यह हमारे समाज के लिए एक बड़ी चुनौती एवं सुरक्षा की दृ्टि से एक सामयिक समस्या के रुप में उभरा है। वास्तव में गरीब, दलित ,शोशित , आदिवासी, मजदूर और किसान ही नक्सलवाद के प्रमुख रुप से अनुयायी हैं। इनके संघर्ष का प्रमुख उद्देष्य इन लोगों की सत्ता में सहभागिता को सुनिश्चित करना है। इसमें कोई शक नहीं है कि नक्सली गुटों का साध्य तो उत्तम है, लेकिन इसके लिए उन्होंने जो साधन चुने हैं उन्हें कतई भी उचित नहीं कहा जा सकता। नक्सलियों को यह समझना चाहिए कि हिंसा से कभी भी किसी को कुछ हासिल नहीं होता। इस तरह के आतंक से राज्य व्यवस्था किसी भी कीमत पर नहीं बदली जा सकती । नक्सलवादी हिंसा की समस्या तीन दशक से भी अधिक समय से चली आ रही है, किंतु इन समस्याओं को जड़ से उखाड़ फेंकने का सार्थक प्रयास अभी तक नहीं किया गया है, जिनके कारण यह चुनौती उत्पन्न हुई है। भूमि सुधार नियमों का बे-मन से अमल , आदिवासी जनकल्याण योजनाओं के लाभ से वंचित जर्जर आम जनता फिर भोल-भाले आदिवासियों की जमीनों को औने-पौने दामों में खरीदने की गैर-आदिवासियों की कोषिष , जबकि संविधान में इस तरह के क्रय-विक्रय पर पूरी तरह रोक का प्रावधान है। यही हाल आदिवासी जनकल्याण योजनाओं का भी है, जहां बिचैलियों ने तीन तिकड़म से योजनाओं का नाममात्र लाभ ही जरूरतमंद आदिवासियों के हाथों तक जाने दिया । इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि धोखाधड़ी से आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा करके उनके सामने रोजी-रोटी का विकराल सवाल खड़ा कर दिया गया। इन प्रमुख कारणों ने नक्सलवादी आन्दोलन को हवा-पानी प्रदान किया। नक्सलवाद पनपने का एक प्रमुख कारण समाज में व्याप्त वर्गभेद के साथ गरीबी एवं बेरोजगारी भी है। अतः आवश्यक है कि भूमि सुधार कार्यक्रमों पर ईमानदारी और तेजी के साथ अमल हो , क्योंकि गरीब एवं गरीब एवं बेरोजगार नवयुवकों को अतिवादी गुट बड़ी आसानी से गुमराह करते हैं और उन्हें सिखाते हैं कि प्रशासन , पुलिस व समाज के समृद्ध लोगों को अपना शत्रु समझें अराजकतावादी तत्व बेरोजगार युवकों को गुमराह कर मनचाही हिंसा एवं आतंक की ओर प्रेरित करते हैं। स्वाधीनता के पश्चात् एक बड़े पैमाने पर नक्सलवाद ने अपने आन्दोलन के प्रभाव क्षेत्र में छात्रों एवं नौजावानों को संगठित किया है। सामाजिक व्यवस्था बदलने की भावना से एक बड़ी संख्या में हजारों युवकों ने अपने अमूल्य जीवन की आहुति दे डाली। जिन मुद्दों पर नक्सल आन्दोलन आरम्भ हुआ था, वे मुद्दे यानि जमीन के अधिकार , भूख का मर्म व दर्द आज भी जिन्दा है। जहां तक नक्सलवादी गुटों की प्रकृति का प्रश्न है तो वे अलगाववादी हैं न ही आतंकवादी है और न ही उन्हें यही रुप में उग्रवादियों की श्रेणी में रखा जा सकता है उनका विश्वास अवश्य ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं है। घोषित तौर पर वे क्रांति करने निकले हैं, लेकिन वे स्वयं इस सवाल का जवाब नहीं दे सकते कि कुछ निर्दोष लोगों की हत्या करके वे लोग कौन सी क्रान्ति कर लेंगे। उन्हें यह भी नजर नहीं आता कि वे जिन पुलिस वालों की हत्या कर रहें हैं वे भी समाज के गरीब तबकों से ही आते हैं और रोजी रोटी के लिए ही नौकरी कर रहें हैं। जिन निर्दोश लोगों की हत्या हो रही है , उन्होंने इनका क्या बिगाड़ा है ? नक्सलवादियों की नजर में वह हर व्यक्ति दुश्मन है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिंसा के द्वारा न तो क्रान्ति उत्पन्न कर सकेंगें और न ही अपने उद्देश्य की पूर्ति। अतः इस समस्या के समाधान हेतु संतुलित तरीके से समन्वित प्रयास करने की आवश्यता है। नक्सलवादी हिंसा का रास्ता छोड़े सम्बन्धित राज्य प्रशासन भूमि सुधारों को सत्यनिष्ठा से लागू करे, सामाजिक विषमता दुर करे और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी उन सभी लोगों को प्राप्त करवाए जो उसके असली हकदार हों यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि इस असंतोष की आग जब भी जमीन में दिखाई देती है राजनेता इसे कानून और व्यवस्था की समस्या बताकर दमन द्वारा समाधान करते हैं। नक्सलवाद वहीं पनपता है जहां सामाजिक आर्थिक मतभेद गहरे होते हैं इस सामयिक समस्या के समाधान के लिए सामाजिक , आर्थिक व राजनीतिक आदि सभी महत्वपूर्ण पहलुओं की समग्र रुप से मीमांसा करनी होगी, व्यवस्था में बदलाव , समझाने का कार्य एवं जरूरत पड़ने पर सस्त्र कार्यवाही समन्वित एवं रुप से करके ही नक्सलवाद पर नकेल कसी जा सकेगी। वस्तुतः सिर्फ सुरक्षा बलों के बूते पर नक्सल समस्या का समाधान नहीं हो सकता। लोकतंत्र संवाद का दर्न है, न कि सशस्त्र युद्ध का। संवाद ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जिस पर चलते हुए दोनों पक्ष एक दूसरे के नजरिये को समझ सकेंगे। राज्य और जनजातीय समूहों के बीच बढते अविश्वास और अलगाव को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बडी चुनौती मानते हुए तत्काल संवाद षुरू किये जाने की जरूरत है और इस दिशा में सबसे पहले पहल सरकार को ही करना होगा।

? सूर्यकान्त धस्माना