संस्करण: 15 दिसम्बर- 2014

शिविरों में आपरेशन
स्वास्थ्य के अधिकार का सवाल कब हकीकत बनेगा ?
 

?  अंजलि सिन्हा

                भी छत्तीसगढ़ में शिविर में नसबन्दी आॅपरेशन के दौरान 13 महिलाओं की मौत का मामला ताजा ही था कि पंजाब के गुरूदासपुर में गुरूनानक मल्टीस्पेशालिटी अस्पताल में शिविर लगा कर किए गए मोतियाबिन्द के आपरेशन में कइयों के आंखों की रौशनी चली जाने की ख़बर आयी है। ऐसे 33पीडि़तों की बात प्रशासन ने मानी है,लेकिन अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक साठ लोगों के आंखों की रौशनी चली गयी है। यह शिविर गैरसरकारी संस्था द्वारा लगाया गया था।

              बताया गया है कि 31 अक्तूबर से चार नवम्बर के बीच 157 लोगों के आंखं के मोतियाबिन्द का आॅपरेशन किया गया था। नियम के मुताबिक एक डाक्टर एक दिन में 25 आॅपरेशन कर सकता है, लेकिन डा विवेक अरोड़ा ने एक दिन में 49 आपरेशन किए। अब जैसा कि ऐसी घटनाओं के घट जाने के बाद तथा हल्ला मचने पर जांच के आदेश तथा मुआवजे की घोषणा होती है, वह हो चुका है, दोषियों के पकड़े जाने के नाम पर सम्बधित डाक्टर को गिरफ्तार किया जा चुका है, एनजीओ का संचालक फरार बताया जा रहा है , पीडि़तों को एक एक लाख रूपए मुआवजे का ऐलान हो चुका है और जांच चल रही है।

              सख्त सज़ा, सख्त कानून आदि की बात ऐसे समय में सभी करेंगे तथा कोई इस बात से इंकार नहीं करेगा कि जवाबदेही सुनिश्चित हो। उधर महिलाओं के नसबन्दी वाले आॅपरेशन में भी उस डाक्टर के खिलाफ कार्रवाई हुई - जिसने एक तरह से नसबन्दी आपरेशन का रेकार्ड कायम किया गया था - तथा जांच में यह भी सामने आया था कि आपरेशन के बाद दी गयी दवा मिलावटी थी। गुरूदासपुर के उपरोक्त शिविर को लेकर यह ख़बर भी आयी थी कि वहां इंतजाम ठीक नहीं थे।

               यदि मान लिया जाए कि यह सारी तकनीकी गड़बडि़यां - जैसे प्रशासन से इजाजत लेना, शिविर को थोड़ा बेहतर रखना तथा एक दिन में नियम के अनुसार 25 आपरेशन ही एक डाक्टर द्वारा करना आदि का पालन किया गया होता तो क्या लोगों का इलाज ऐसे शिविर लगा कर थोक भाव से करने को सही मान लिया जाता ? ध्यान रहे कि नसबन्दी वाले मामले में भी कहा गया था कि डाक्टर ने एक दिन में निर्धारित संख्या से अधिक महिलाओं का आपरेशन किया था।

               मोतियाबिन्द के फ्री आपरेशन शिविर में करवाने का प्रचार अक्सर आता रहता है, दो दशक पहले किसी डाक्टर का उल्लेख आता रहता था कि उसने कितने हजार लोगों के आंखों के मोतियाबिन्द का आपरेशन किया है। धर्मार्थ संस्थाएं ऐसा करती रहती हैं और बड़ी तेजी से फैल रहे एन जी ओ भी ऐसे शिविर करते रहते हैं। पुराने समय में भी ऐसा होता था लेकिन तब न तो मेडिकल साइंस इतना तरक्की किया था और न ही नवस्वाधीन देश से यह उम्मीद की जा सकती थी कि सरकारी अस्पतालों का नेटवर्क हर जगह पहुंचे, जहां पर्याप्त मात्रा में डाक्टर भी तैनात हों।

                पिछड़े समाज में जहां लोगों में जागरूकता की कमी हो वहां अपने स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए तो ऐसे कैम्प लगाए जा सकते हैं या अन्य तरीकों से आगाह तो किया जा सकता है, लेकिन अपने आप को विश्व की महाशक्ति बनने का इरादा रखनेवाले भारत जैसे देश में ऐसे शिविरों का आयोजन होने लगे तथा इलाज चलने लगे तो इस पर क्या प्रश्न खड़े नहीं होने चाहिए। और फिर इन शिविरों में कोई अनहोनी होती है तो मसला यह नहीं है कि उसमें क्या क्या लापरवाहियां थी बल्कि सरकार इतना लापरवाह क्यों थी कि लोगों का इलाज अच्छे अस्पतालों में होने के बजाय जहां स्थायी रूप से सभी ढांचागत सुविधाओं के साथ विशेषज्ञ मौजूद हों वहां ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है।

                  दरअसल असली सवाल आवंटन का है, भारत उन देशों में शुमार है जहां सरकारी बजट में स्वास्थ पर बहुत कम खर्च होता है। वर्ष 2011 के बजट के आंकड़ों को देखें तो वह महज 26,750 करोड़ रूपए था, जो सकल घरेलू उत्पाद का महज 1.2 फीसद था। अगर वास्तविक असर डालना हो तो स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के हिसाब से यह खर्च सकल घरेलू उत्पाद का कमसे कम 2-3 फीसदी होना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि वह सकल घरेलू उत्पाद का कमसे कम 5 फीसदी हो। ध्यान देने योग्य मसला है कि विगत तीन साल में इसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है। उल्टे हम यह भी देख रहे हैं कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन की सरकार बनने के बाद जिस तरह सामाजिक कल्याण के अन्य मदों में कटौती हो रही है, वह खतरा यहां पर भी मंडरा रहा है।

                ध्यान रहे कि इन शिविरों में अपने आपरेशन करवाने के लिए अमीरों की सन्तानें, अधिकारीगणों के परिवारजन या नेतागण स्वयं नहीं पहुंचते हैं। उन्हें अपना इलाज करवाने के लिए शहरों के पांच सितारा अस्पताल मौजूद हैं, जहां की व्यवस्था किसी अच्छे होटल से कम नहीं होती। अगर नेतागणों को अपना मामूली इलाज भी करवाना हो तो सरकारी खर्चे पर विदेश भी भेजा जा सकता है। पिछले दिनों दिल्ली में महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ नेता के घर में फिसल कर पैर में फ्रैक्चर की ख़बर आयी थी, मगर उन्हें उनके इलाज के लिए स्पेशल एयर टैक्सी द्वारा मुंबई ले जाया गया, जहां के एक चर्चित अस्पताल में उनका इलाज हुआ। ऐसे शिविर तो गरीबों के लिए ही होते हैं।
आखिर असल मुद्दे से कब तक सरकार भागती रहेगी और कुछ व्यक्तियों को सज़ा देकर जवाबदेही से बचती रहेगी ? स्वास्थ्य का सवाल और इलाज का हक एक गम्भीर समस्या का रूप यहां ले चुका है। चाहे जितनी प्रगति की बात हो लेकिन बीमार इंसान चाहे वह किसी भी प्रकार की बीमारी हो उसे सबसे पहले अपना इलाज चाहिए। और हमारे देश में अभी भी आलम यह है कि स्वास्थ्य नागरिकों का मूल अधिकार तो छोडि़ए, कानूनी अधिकार भी नहीं है। कानूनविदों के मुताबिक स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जीवन के अधिकार से उद्धृत माना जाता है। जहां तक उच्चतम न्यायालय का सवाल है उसने इस विचार को आंशिक स्वीकृति दी है, मगर इसे लेकर स्पष्ट प्रावधान न होने के चलते कोई नागरिक यह दावा नहीं कर सकता कि स्वास्थ्य सुविधाएं पाना उसका बुनियादी अधिकार है।

               ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि भारत के पास संसाधनों की कमी है, यह दरअसल राजनीतिक इच्छाशक्ति का सवाल है। अगर एक छोटासा देश क्यूबा - जो खुद उसी तरह आर्थिक संकट एवं अमेरिकी घेराबन्दी की मार झेलते हुए - हर नागरिक को स्वास्थ्य का अधिकार दिलाने में तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन के हिसाब से दुनिया के लिए नज़ीर बनने में सम्भव हो सकता है तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता !
 

?   अंजलि सिन्हा