संस्करण: 15 दिसम्बर- 2014

गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की कवायद
सेक्युलर लोकतंत्र में पिछले दरवाजे से धर्मतंत्र कायम करने की कोशिश

?  सुभाष गाताड़े

               गवदगीता - जिसे हिन्दुओं का पवित्र ग्रंथ कहा जाता है और जिसमें दरअसल अपने आत्मीयों के खिलाफ युद्ध करने को लेकर मन में दुविधा रखनेवाले अर्जुन को श्रीकष्ण द्वारा युद्ध लड़ने के लिए तैयार करता हुआ दिया गया उदबोधन शामिल है, - वह इन दिनों सूर्खियों में है। वजह देश की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज्य द्वारा किसी गीता महोत्सव में दिया गया वह वक्तव्य है जिसमें उन्होंने गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग कर डाली है। उनके कथन के इस हिस्से से लोगों को और बेचैनी हुई है, जिसमें उन्होंने कहा है कि भगवदगीता की प्रति अमेरिकी राष्ट्रपति को देकर प्रधानमंत्री मोदी ने इसका संकेत दे दिया है और अब कुछ औपचारिकताएं बची हैं जिसे जल्द पूरा कर लिया जाएगा।

               जैसा कि उम्मीद की जा सकती है कि उनके इस बयान की संसद के पटल एवं बाहर जबरदस्त आलोचना हुई है, नेताओं एवं विद्धतजनों ने एक सुर से कहा है कि एक बहुधर्मीय, बहुआस्थाओं वाले मुल्क में ऐसा कोईभी कदम आत्मघाती साबित होगा, जो देश की धर्मनिरपेक्षता पर कुठाराघात करेगा। कईयों ने इसे संविधान की बुनियाद पर हमला घोषित किया है, जिसकी इजाजत नहीं दी जा सकती। इस सन्दर्भ में संविधान निर्माण के दौरान चली बहस को भी उदधत किया गया है। गौरतलब है कि संविधान सभा के किसी सदस्य की तरफ से यह सुझाव पेश किया गया था कि उसके प्राक्कथन/प्रीएम्बल में ईश्वर की दुहाई/इन द नेम आफ गाॅड दी जाए, तब संविधान सभा के कई सदस्यों ने उसकी मुखालिफत की थी, जिनमें से कई आस्थावान भी थे। एक सदस्य ने रखा कि विचारों, अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास और पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी करने वाले प्राक्कथन के साथ ऐसा उल्लेख असंगत होगा।

            कुछ ने कहा है कि नए निज़ाम में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज्य अपने आप को हाशिये पर पा रही हैं, इसलिए अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए या सूर्खियों में आने के लिए उन्होंने यह बयान दिया है। इसमें कोई दोराय नहीं कि प्रधानमंत्री कार्यालय में सारी सत्ताओं के केन्द्रीकरण की मोदीशैली ने उनके काबिना मंत्रियों में भी बेचैनी बढ़ रही है और इस शैली की अन्दर ही अन्दर आलोचना भी हो रही है, मगर एक वरिष्ठ नेत्री - जो विदेश मंत्रालय जैसे अहम महकमे को संभाल रही हों - उनके द्वारा जनसभा में दिए गए वक्तव्य को इन आपसी नाराजगियों तक, आपसी विवादों तक न्यूनीकत कर देना प्रस्तुत बयान की अहमियत को कम करना है। फिर इस बयान को कैसे समझा जा सकता है ?

           दरअसल हमें सुश्री सुषमा स्वराज्य के इस बयान को संघ परिवार की अन्य श्रेष्ठियों द्वारा प्रगट उदगारों या उनके आनुषंगिक संगठनों के लम्पट तत्वों द्वारा की जा रही हरकतों, अंजाम दी जा रही सरगर्मियों में ही सिचुएट करके देखना चाहिए, जिनका फोकस धर्मनिरपेक्ष भारत को एक हिन्दु राष्ट्र में रूपांतरित कर देना है। फिर चाहे आए दिन संघ सुप्रीमो द्वारा दिए जा रहे यह बयान हों कि भारत किस तरह हिन्दु राष्ट्र ही है क्योंकि यहां रहनेवाले सभी हिन्दु ही हैं, या मोदी की काबिना सहयोगी साध्वी निरंजना ज्योति द्वारा रामजादा बनाम हरामजादा के तौर पर दिया गया बयान हो या विश्व हिन्दू परिषद के लोगों द्वारा अन्य धर्मियों को घरवापसी के नाम पर हिन्दु धर्म में लाने की मुहिम हो तथा साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने की कोशिशें हों या अपनी खुशी से दूसरा धर्म स्वीकारनेवाले हिन्दुओं के आपराधीकरण की कवायद हो या इंडियन कौन्सिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च से लेकर अन्य अकादमिक संस्थानों के शीर्ष पर तैनात किए जा रहे संघ शाखाओं में पले बढ़े विद्वान हों जो मिथक और इतिहास को आपस में घालमेल करने में माहिर हैं। देश के एक अग्रणी अख़बार /द हिन्दू/ में संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक द्वारा दिया गया यह साक्षात्कार कि वह 2025 तक - जबकि संघ अपनी जन्मशती मना रहा होगा - देश को हिन्दू राष्ट बनाना चाहते हैं, उसी से उनकी तमाम सरगर्मियां स्पष्ट होती हैं।

             संघ परिवार में आपस में जो श्रम विभाजन विद्यमान है, उसमें एक संसदीय धड़ा गोया बिल्कुल संसद की चैहददी तक अपने आप को सीमित रखता दिखाई देगा, और गैरसंसदीय कहा जानेवाला तबका तरह तरह के प्रगट-अप्रगट हिंसाचार में लिप्त दिखाई देगा, मगर सभी मिल कर हिन्दुत्व के एजेण्डा को ही आगे बढ़ाते मिलेंगे, यही मेकनिजम यहां पर भी उदघाटित होता दिखता है।

             आखिर जब भाजपा को अपने बलबूते पूर्ण बहुमत मिला है तो संघ परिवारी संगठन भारतीय समाज में आपस में अधिक दुर्भावना पैदा करनेवाले, अपने विघटनकारी लगनेवाले एजेण्डा के साथ इतनी तेजी से क्यों दौड़ना चाहते हैं, यह सवाल उठना लाजिमी है। अगर विकास की बात कहते हुए मोदी नए वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब हुए हैं, तो इतनी जल्दी क्या है संघ का एजेण्डा लागू करने की।

            बात स्पष्ट है कि संघ के श्रेष्ठी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी - जिसके द्वारा तमाम गरीबोन्मुखी योजनाएं लागू करने एवम सामाजिक सदभाव कायम करने की कोशिशों के बावजूद - को महज कुप्रबंधन के चलते सत्ता से बाहर होना पड़ा है, उसी किस्म की स्थितियां मोदी सरकार पर भी अधिक जल्दी आ सकती है। संघ के कर्णधार यह भी जानते हैं कि मोदी सरकार बनने के पहले जहां संघ से जुड़नेवाले लोगों की तादाद काफी कम थी, उसमें आज गुणात्मक इजाफा हुआ है। और यह स्थिति हमेशा नहीं रहनेवाली है। वह भारतीय लोकतंत्र के इस इतिहास से भी वाकीफ हैं जहां अभूतपूर्व जनमत हासिल किए सत्ता पर आए राजीव गांधी की सरकार को या बांगलादेश की मुक्ति में अहम भूमिका निभाने के चलते देश में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंची इंदिरा गांधी की सरकार को भी जल्दही जनाक्रोश का सामना करना पड़ा था और उसकी वैधता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हुए थे। संकेत स्पष्ट है कि छह माह के अन्दर ही मोदी सरकार की छवि यही बनती दिख रही है कि वह यू टर्न अर्थात पलटी मारनेवाली सरकार है जिसने देखते ही देखते अपने तमाम नारों-वायदों पर पलटी मारने में महारत हासिल की है। दिलचस्प यह भी है कि स्वयं परिवार के अन्दर भी सत्ता के केन्द्रीकरण एवं कैबिनेट प्रणाली को ताक पर रखने की मोदी शैली के चलते असन्तोष के स्वर प्रगट होने लगे हैं। हाल में अरूण शौरी द्वारा एक्प्रेस को दिया गया इटरव्यू देंखे, जिसमें उन्होंने परोक्ष रूप से मोदी को इशारा किया है कि केन्द्र सरकार के संचालन एवं म्युनिसिपालिटी के संचालन में फरक होता है और ऐसी शैली नुकासानदेह है।

            भगवदगीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने का प्रस्ताव दरअसल भारतीय राजनीति एवं समाज के हिन्दुकरण के एजेण्डा को ही आगे बढ़ाने का प्रस्ताव है ताकि गैरहिन्दुओं तथा वैज्ञानिक चिन्तन पर यकीं रखनेवाले अहम हिस्से के दोयम दर्जे को आधिकारिक बनाया जा सके। यह एक तरह से अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के नक्शे कदम पर चलने का प्रस्ताव है, जिसने अपने मुल्क के निर्माण के केन्द्र में इस्लाम को प्रतिष्ठापित किया और जो आज अंतःस्फोट का शिकार होता दिख रहा है।

               ध्यान रहे कि आज़ादी के आन्दोलन में गीता से प्रेरणा लेनेवाले अग्रणियों की अक्सर बात होती है, मगर यह बात उल्लेखित नहीं होती कि संघ के दूसरे सुप्रीमो गोलवलकर ने गीता से यही सीखा था कि मुसलमान इस देश में पराये हैं जिनका हर कुछ माह पर जनसंहार लाजिमी है /देखें, माक्र्सिजम एण्ड भगवदगीता, एस जी सरदेसाई एण्ड दिलीप बोस, पेज 4, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, 2002/लेखकद्वय ने किताब में आगे लिखा था कुछ साल पहले पुणे में एक सभा ने शंकराचार्य ने यही घोषणा की थी कि महिलाओं और शूद्रों का तिरस्कार किया जाना चाहिए क्योंकि गीता के हिसाब से वह पापयोनि हैं अर्थात पाप से जन्मे हैं।

              हमें यहभी नहीं भूलना चाहिए कि गीता को राष्टीय ग्रंथ बनाने का प्रस्ताव एक तरह से पिछले दरवाजे से भारत के राज एवं समाज के संचालन में संविधान को दी गयी वरीयता को खारिज करने का प्रस्ताव है, जिसके लिए राष्टीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके आनुषंगिक संगठन लम्बे समय से सक्रिय रहे हैं। दरअसल डा अम्बेडकर की अध्यक्षता में संविधान सभा का हुआ गठन और लम्बे बहस मुबाहिसे से चली उसके निर्माण की प्रक्रिया के दिनों से ही हिन्दुत्ववादी जमातों के इन तमाम अग्रणियों ने - फिर चाहे गोलवलकर हों या सावरकर हों - अपनी असहमति लगातार प्रगट की है। आर्गनायजर के पुराने अंकों को पलट कर या सावरकर के समग्र साहित्य में इसके सन्दर्भ मिलते हैं कि किस तरह इन लोगों ने संविधान बनाने का विरोध किया था और मनुस्मृति को ही आजाद भारत का संविधान घोषित करने के लिए दबाव डाला था। वही मनुस्मृति जिसने शूद्रों अतिशूद्रों एवं स्त्रिायों को सैंकड़ों सालों तक तमाम मानवीय अधिकारों से वंचित रखा था। अपने मुखपत्रा आर्गेनायजर, (30 नवम्बर, 1949, पृष्ठ 3) में संघ की ओर से लिखा गया था कि हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन के बहुत पहले लिखी गयी थी। आज तक इस विधि की जो मनुस्मृति में उल्लेखित है, विश्वभर में सराहना की जाती रही है और यह स्वतःस्फूर्त धार्मिक नियम -पालन तथा समानुरूपता पैदा करती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।

             अगर हम सदियों में विकसित हुई हिन्दुओं की दार्शनिक-आध्यात्मिक परम्परा को देखें तो उसमें हमें एक स्थूल विभाजन श्रुतियों और स्मतियों के रूप में दिखता है, वेदों, उपनिषदों, तरह तरह के पुराणों आदि की बात होती है। हिन्दु धर्म की यही खासियत समझी जाती है जिसमें चार्वाकों जैसे भौतिकवादी दर्शन से लेकर वेदान्त तक शामिल है और इन अलग अलग धाराओं को माननेवाले सभी अपने आप को हिन्दु कहलाते हैं। फिर प्रश्न उठता है कि इसमें संघ परिवार द्वारा गीता को ही सबसे पवित्र ग्रंथ का दर्जा देने के पीछे का क्या तर्क है ?

              हम देख सकते हैं कि ईसाइयत या इस्लाम जैसे सामी धर्मों के बरअक्स जहां एक रहबर/प्रोफेट और एक पवित्र ग्रंथ फिर चाहे बाइबिल हो या कुराण का अस्तित्व दिखता है, हिन्दु धर्म का यह बहुविध स्वरूप दिखता है। और लम्बे समय से संघ परिवार की यह कोशिश रही है कि हिन्दु धर्म की भी एक पवित्र किताब हो या उसकी एक पवित्र नगरी हो। बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर निर्माण की उसकी मुहिम का फोकस ऐसे ही हिन्दुधर्म को गढ़ने पर रहा है जहां अयोध्या को मक्का की तरह पवित्र घोषित किया जा सके या राम को ऐसे देवता के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा सके। देशज हिन्दु धर्म से बुनियादी तौर पर प्रस्थान के रूप में हम गढ़े जा रहे इस धर्म को देख सकते हैं जो एकाश्म/मोनोलिथिक, समरूप है तथा सामी धर्मो की कई विशिष्टताओं को अपने में समाहित करता है। प्रख्यात इतिहासकार रोमिला थापर इस प्रक्रिया को सिंडिकेटेड हिन्दुइजम के तौर पर सम्बोधित करती है।

              भगवदगीता के प्रति संघ परिवारजनों के सम्मोहन को हम संविधान निर्माता डा अम्बेडकर की एक रचना को पलट कर समझ सकते हैं। अपनी अधूरी किताब रेवोल्यूशन एण्ड काउण्टर रेवोल्यूशन इन एन्शंट इंडिया /अध्याय 9, भाग तीन/ के अध्याय एस्सेज आन भगवदगीता: फिलोसोफिक डिफेन्स आफ काउण्टर रेवोल्यूशन: क्रष्णा एण्ड हिज गीता/ में वह इस पर रौशनी डालते हैं।

               उनके मुताबिक मेरा मानना है कि भगवदगीता न धर्म की किताब है ना ही दर्शन की विवेचना है। दरअसल वह धर्म की मान्यताओं की दार्शनिक आधारों पर हिमायत करती है। अगर इसी आधार पर कोई उसे धर्म की या दर्शन की किताब समझता है तो इसके लिए वह आज़ाद है। उसके दूसरे अध्याय के श्लोकों में हम युद्ध की दार्शनिक हिमायत देख सकते हैं, उसका एक तर्क है कि दुनिया तो नष्ट होने वाली है और मनुष्य भी मात्र है।.. एक दूसरी मान्यता जिसके लिए गीता दार्शनिक समर्थन प्रदान करती है, वह है चातुर्वण्र्य। निस्सन्देह भगवदगीता यह उल्लेख करती है कि चातुर्वण्र्य का निर्माण ईश्वर ने किया, इसलिए वह पवित्र है।

              भगवदगीता के निर्माणकाल को ईसा की दूसरी-तीसरी सदी बताते हुए वह बताते हैं कि किस तरह बुद्ध ने जिस सामाजिक क्रान्ति के बीज डाले उसकी प्रतिक्रिया के तौर पर गीता सामने आयी। चातुर्वण्र्य मया श्रष्टा, गुणकर्म विभागशः/ चातुर्वण्र्य का निर्माण मैंने गुणदोष के आधार पर किया है/ जैसी गीता की सीख को लेकर वह पूछते हैं कि आखिर भगवदगीता को प्रतिक्रांति के जडसूत्र की हिमायत क्यों करनी पड़ी ? मेरी समझ से जवाब स्पष्ट है। बौद्ध धर्म के हमले से बचने के लिए गीता का आविष्कार हुआ। बुद्ध ने अहिंसा का प्रचार किया। उसने न केवल प्रचार किया बल्कि -ब्राहमणों को छोड़ - सभी ने जीवनशैली के तौर पर अपनाया।..बुद्ध ने चातुर्वण्र्य के खिलाफ उपदेश दिए।..हालत यह थी कि चातुर्वण्र्य का ढांचा चरमरा गया था। वर्णव्यवस्था सर के बल खड़ी कर दी गयी थी। शूद्र और महिलाएं अब संन्यासी हो सकते थे, यह एक ऐसी स्थिति जिससे प्रतिक्राति ने हमेशा इन्कार किया था। बुद्ध ने कर्मकाण्ड और यज्ञों की भत्र्सना की, उसने हिंसा की बुनियाद पर उनकी भत्र्सना की। उसने इस आधार पर भी उनकी भत्र्सना की कि उनके पीछे का मकसद कुछ बोनस हासिल करना है। प्रतिक्रांतिकारियों का इसके प्रति लिए जवाब क्या था? यही कि यह सब वेदों में लिखा गया है, वेद अपौरूषेय हैं, इसलिए इन धारणाओं पर प्रश्न नहीं खड़ा किया जा सकता। बुद्ध का युग, जो ज्ञात भारत का सबसे प्रबोधनकारी और सबसे तार्किक दौर रहा है, वहां ऐसे मूर्खतापूर्ण, मनमाने, अतार्किक और कमजोर बुनियाद पर खड़ी धारणाएं कहां टिक पातीं।

              गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा देने का मकसद गीता की इसी भूमिका को महिमामंडित करना है, जो बात संघ परिवार के लिए भी बेहद मुफीद जान पड़ती है।
 

? सुभाष गाताड़े