संस्करण: 15जून-2009

 

14 जून : विश्व रक्तदान दिवस के अवसर पर
रक्तदान से आप भी घबराते हैं क्या ?
सवा अरब आबादी और रक्तदाता महज 0.5 फीसदी
 

 सुभाष गाताड़े

राजधानी दिल्ली - जो विश्लेषकों की निगाह में रफ्ता-रफ्ता एक मिनी इण्डिया की शक्ल धारण करती जा रही हो - उसकी धाड़कन से एक तरह से शेष मुल्क के बारे में बहुत कुछ अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। और यह बात सिर्फ सियासी मामलों में ही नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक मामलों में भी उसी तरह लागू दिखती है।

अब यही देखिये ना कि दिल्ली की सरकार भले ही तमाम दावे करे, लेकिन ख़बर यही है कि यहां स्वैच्छिक रक्तदान करनेवालों की तादाद बढ़ नहीं पा रही है। आंकड़ों के मुताबिक यहां हर साल 350 लाख रक्त यूनिट की आवश्यकता रहती है, लेकिन स्वैच्छिक रक्तदाताओं से इसका महज 30 फीसदी ही जुट पाता है। (जागरण, 7 जून 2009) जो हाल दिल्ली का है वही शेष हिन्दोस्तां का है। यह अकारण नहीं कि हिन्दोस्तां की आबादी भले ही सवा अरब पहुंच गयी हो, रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का एक प्रतिशत भी नहीं पहुंच पाया है। रक्तदान की इस परिघटना का एक जेण्डर पहलू भी है, दरअसल चिन्ता की बात यह है कि रक्तदाताओं की इस संख्या में महिलाओं की हिस्सेदारी महज छह प्रतिशत है।

दिलचस्प है कि भारत में जहां कुल रक्तदान का 53 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान से प्राप्त होता है, वहीं तीसरी दुनिया के कई सारे देश हैं जो इस मामले में भारत को काफी पीछा छोड़ देते हैं। मालूम हो हाल में राजशाही के जोखड़ से मुक्त होकर गणतंत्र बने नेपाल में कुल रक्त की जरूरत का 90 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान से पूरा होता है तो श्रीलंका में 60 फीसदी, थाईलेण्ड में 95 फीसदी, इण्डोनेशिया में 77 फीसदी और अपनी निरंकुश हुकूमत के लिए चर्चित बर्मा में 60 फीसदी हिस्सा रक्तदान से पूरा होता है।

आखिर दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में लोग रक्तदान से इतना संकोच क्यों करते हैं ? कारण स्पष्ट है कि दिल्ली हो या शेष हिन्दोस्तां हो, यह मिथक टूट नहीं पा रहा है कि रक्तदान करने से लोग कमजोर हो जाते हैं और उस रक्त की भरपाई होने में महिनों लग जाते हैं। इतनाही नहीं यह गलतफहमी भी व्याप्त है कि नियमित खून देने से लोगों की रोगप्रतिकारक क्षमता कम होती है और उसे बीमारियां जल्दी जकड़ लेती हैं।

प्रश्न उठता है कि इस सम्बन्धा में चिकित्सा विज्ञान क्या कहता है :  कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच हो, जो 45 किलोग्राम से अधिक वजन का हो और जिसे जो एचआईवी, हेपाटिटिस बी या सी जैसी बीमारी न हुई हो, वह रक्तदान कर सकता है। एक बार में जो 350 मिलीग्राम रक्त दिया जाता है, उसकी पूर्ति शरीर में चौबीस घण्टे के अन्दर हो जाती है और गुणवत्ता की पूर्ति 21 दिनों के भीतर हो जाती है। दूसरे, जो व्यक्ति नियमित रक्तदान करते हैं उन्हें हृदयसम्बन्धी बीमारियां कम परेशान करती हैं। तीसरी अहम बात यह है कि हमारे रक्त की संरचना ऐसी है कि उसमें समाहित रेड ब्लड सेल तीन माह में स्वयं ही मर जाते हैं, लिहाजा प्रत्येक स्वस्थ्य व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है। जानकारों के मुताबिक आधाा लीटर खून तीन लोगों की जान बचा सकता है।

वर्ष 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान नीति की नींव डाली है। डाक्टरों के मुताबिक रक्तदान के बारे में कुछ बातें गौरतलब हैं : एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि रक्त का लम्बे समय तक भण्डारणा नहीं किया जा सकता है। वैसे रक्तदान को लेकर विभिन्न गलतफहमियों का शिकार लोगों के लिए सुरेश कामदास, जिनकी उम्र फिलवक्त 75 साल है, एक जीता जागता जवाब हैं। 1962 से शुरू करके वर्ष 2000 तक वह 150 बार रक्तदान कर चुके हैं। यह अकारण नहीं कि बीते जून माह में विश्व रक्तदान दिवस (14 जून) पर वे उन गिनेचुने लोगों में शामिल थे, जिन्हें सम्मानित किया गया। वैसे अब चूंकि डाक्टरों ने खुद उन्हें रक्त देने से मना किया है, उन्होंने अपने स्तर पर एक अलग किस्म की प्रचार मुहिम हाथ में ली है, लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करने की। बहुत कम लोग जानते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए 14 जून को ही विश्व रक्तदाता दिवस के तौर पर क्यों चुना ! दरअसल कार्ल लेण्डस्टाइनर (14 जून 1868 - 26 जून 1943) नामक अपने समय के विख्यात ऑस्ट्रियाई जीवविज्ञानी और भौतिकीविद की याद में उनके जन्मदिन के अवसर पर दिन तय किया गया है। वर्ष 1930 में शरीर विज्ञान में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उपरोक्त मनीषि को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने खून में अग्गुल्युटिनिन की मौजूदगी के आधार पर रक्त का अलग अलग रक्तसमूहों - ए, बी, ओ -में वर्गीकरण कर चिकित्साविज्ञान में अहम योगदान दिया।

वैसे सुरेश कामदास जैसे लोग अकेले नहीं हैं जिन्होंने रक्तदान के प्रचार का बीड़ा उठाया है। रामपुरा फुल एक छोटासा कस्बा है जो वहां की मण्डी के लिए मशहूर है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पंजाब के भटिण्डा शहर के इस कस्बे में आज से लगभग तीस साल पहले एक अलग किस्म के संगठित प्रयास की नींव पड़ी, जिसका प्रभाव न केवल समूचे जिले में बल्कि आसपास की अन्य मण्डियों में भी पहुंचा है। और इसका ताल्लुक किसी लेन-देन से नहीं है बल्कि एक अलग किस्म के दान से है, जिसके बारे में शेष हिन्दोस्तां के लोग बहुत उत्साहित नहीं रहते हैं। दरअसल आम हिन्दोस्तानी भले ही रक्तदान करने से हिचकते हों, लेकिन भटिण्डा में आज दस हजार से अधिक स्वैच्छिक रक्तदानकर्ता हैं जो नियमित तौर पर रक्तदान करते हैं। रक्तदान के लिए लोगों के इस बढ़ते उत्साह का ही परिणाम है आम तौर पर अपनी क्षमता से कम रक्त संग्रहित कर सकनेवाले ब्लड बैंकों की देशभर की स्थिति के विपरीत यहां के ब्लड बैंकों को अपने यहां एकत्रित खून को आसपास के शहरों - फरीदकोट, पटियाला के मेडिकल कालेजों में भेजना पड़ता है ?

टाईम्स आफ इण्डिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि रक्तदान के बारे में व्याप्त तमाम मिथकों के टूटने के बाद लोगों में इसे लेकर इतना उत्साह का वातावरण रहता है कि लोग शादी के मण्डप के बाहर रक्तदान शिविर रखते हैं या किसी श्रध्दांजलि सभा के स्थान पर रक्तदान शिविर का आयोजन करते हैं। रक्तदान को अभियान के तौर पर लेने के रामपुर फुल के इस प्रयास की शुरूआत आम भाषा में साधारण कहे जानेवाले व्यक्ति ने की थी, जिनका नाम था हजारीलाल बन्सल। बताया जाता है कि उनकी बेटी किसी गम्भीर बीमारी से पीड़ित थी और रक्त की अचानक जरूरत पड़ी। अन्तत: खून का इन्तजाम किसी तरह हुआ और बेटी बच भी गयी, लेकिन इस छोटी सी घटना ने गोया हजारीलाल के जीवन को एक नया मकसद प्रदान किया और वह रक्तदान की महत्ता लोगो को बताने के काम में जुटे और लोग भी जुड़ते गए। अन्त में, क्या आनेवाले 14 जून को आप रक्तदान को लेकर उन्हीं मिथकों के गुलाम बने रहेंगे या बगल ब्लड बैंक में जाकर डाक्टर से कहेंगे कि मैं अब तैयार हूं इस महादान के लिए।

 

 सुभाष गाताड़े