संस्करण: 07 अक्टूबर-2013

मध्यप्रदेश में

जिन्दगी की जंग हारते बच्चे

?  अमिताभ पाण्डेय

      यप्रदेश में चुनावी रैलियों पर करोड़ों रूपए खर्च करने वाली भाजपा सरकार भूख, गरीबी और विभिन्न बिमारियों के कारण लगातार हो रही बच्चों की मौत पर धयान नहीं दे रही है। शायद यही कारण है कि मधयप्रदेश में जन्म के एक वर्ष के भीतर मरने वाले बच्चों की मृत्यदर पूरे भारत में सबसे अधिक है। यहां सरकार के पास चुनावी तमाशों पर खर्च करने के लिए तो करोड़ों रूपए है लेकिन भूख और बिमारी से बच्चों को बचाने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं है। बच्चों के कल्याण के दावे कागजी साबित हो रहे है।

            उल्लेखनीय है सरकार और समाज का यह घोषित प्रयास होता है कि बच्चों को उनके जन्म के समय से ही ऐसा अनूकूल वातावरण मिलें जिससे उनका अबाधित शारीरिक -मानसिक विकास सुनिश्चित हो सके। हर बच्चे का स्वास्थ्य बेहतर हो,उसे पलने बढने के लिए पर्याप्त पोषण से भरपूर भोजन के साथ ही अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हों। बच्चों के हित में योजनाओं का क्रियान्वयन करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार प्रतिवर्ष अपने बजट में बडी रकम का प्रावधान करती है। इस रकम का उपयोग बच्चों को विभिन्न बीमारियों से बचाकर स्वस्थ बनाये रखने ,उनके लिए पोषक तत्वों से भरपूर पोषण आहार का इंतजाम करने में किया जाता है।

            यह पोषण आहार प्रत्येक गॉव,शहर में पहॅुचें इसके लिए मधयप्रदेश में महिला बाल विकास विभाग के अन्तर्गत समेकित बाल विकास सेवा योजना का संचालन किया जा रहा है। राज्य सरकार का दावा है कि इस योजना के तहत प्रदेश में 453 बाल विकास परियोजनाएं कार्यरत हेैं। प्रदेश में 80 हजार 160 आगंनवाडी और 12 हजार70 मिनी आंगनवाडी केन्द्रों के माधयम से प्रदेश के सभी गॉव -शहरों में 0 से 6 वर्ष आयु समूह के सभी बच्चों को पोषण आहार नियमित दिये जाने के साथ ही बच्चों के स्वास्थ्य की जॉच भी की जा रही है। अधिाकारिक जानकारी के मुताबिक बच्चों को पर्याप्त पोषण आहार उपलब्ध करवाकर स्वस्थ बनाये रखने पर अलग अलग कार्यक्रमों के माधयम से साढे तीन हजार करोड से ज्यादा की रकम खर्च किये जाने की प्रक्रिया जारी है। इस बडी रकम के खर्च से यह माना जा सकता है कि मधयप्रदेश का हर बच्चा स्वस्थ,मस्त होगा। सही भी तो है,भला 3 करोड से ज्यादा की रकम खर्च की जा रही है तो भूखे,कमजोर,बीमार बच्चों के लिए इस प्रदेश में कोई जगह नहीं होना चाहिये।

            अफसोस इस बात है कि बच्चों को तदंरूस्त बनाये रखने की तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद मध्यप्रदेश में बच्चों की एक बडी संख्या भूख,बीमारी,कमजोरी,से संघर्ष कर रही है। देश ही नहीं दुनिया में सर्वाधिक कमजोर,कुपोषित बच्चे हमारे ही प्रदेश में जिदगीं और मौत से संघर्ष कर रहे हैं। बल्कि संघर्ष करते करते मौत में मुॅह में चले जा रहे है। भूख, कमजोरी, बीमारी,कुपोषण से मरने वाले बच्चों की अब तक इतनी मौतें इस राज्य में हो चुकी है कि यह गंभीर मामला अब अखबारों की सुर्खियॉ भी नहीं बनता । इसकी एक बडी वजह शायद यह है कि मरने वाले ज्यादातर बच्चे कमजोर,गरीब समुदाय के है। यह समुदाय आदिवासियों ,मजदूरों का है जिनकी मुसीबत जंगल से बेदखल कर दिये जाने के बाद बढ गई है। उनके सामने पेट भरने का संकट गहरा गया है। जब तक आदिवासी समुदाय जंगल पर आश्रित रहकर अपना जीवन गुजारते रहे तब तक उनकों पेट भरने की चिन्ता नहीं थी। जगंल से मिलने वाले फल,भाजी,कोदो,कुटकी,बाजरा सहित अन्य खाघान्न ने उनका पेट भरते हुए जीवन के लिए जरूरी पोषक तत्वों की पूर्ति भी की।याद कीजिए आज से पॉच-छह दशक पहले किसी ने आदिवासी समुदाय को भूख,कुपोषण से जूझते नहीं देखा था। वन से मिलने वाली उपज ने उन्हें कुपोषण से सदैव बचाये रखा। अब जगंल से बेदखल किये जाने के बाद रोजी रोटी के चक्कर में पोषक तत्वों से भरपूर खाघान्न तो दूर रोजाना भरपेट रोटी मिल जाना भी बडी बात हो गया है। ऐसे में जब आदिवासी समुदाय के महिला पुरूष खुद ही भूखे कमजोर रहेगें तो उनके बच्चों को कमजोर,बीमार,कुपोषित होने से कौन बचा सकेगा।

            हाल ही में  भारत सरकार के राष्टीय पोषण संस्थान ने देश में सर्वेक्षण के बाद जो आंकडें जारी किये हैं वे बतातें है कि मधयप्रदेश में 60 प्रतिशत से अधिाक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। इन कुपोषित बच्चों में लगभग 72 प्रतिशत बच्चे आदवासी समुदाय से हैं। इस समुदाय की 60 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं में एनीमिया की बीमारी पाई गई जिसके कारण उनके शरीर में खून की कमी हो जाती है। जब मॉ के शरीर में खून की कमी होगी तो बच्चे को कुपोषण का शिकार होने से कौन रोक पायेगा? सर्वेक्षण के अनुसार मधयप्रदेश के सहरिया आदिवासियों के बच्चे सर्वाधिक कुपोषण के शिकार हैं। यह कुपोषण इथोपिया और चाड देशों में होनेवाले कुपोषण से ज्यादा है। श्शायद इसी कारण सहरिया आदिवासियों के बच्चों की शिशु मृत्यु दर 123 दशमलव 28 है जो कि मधयप्रदेश की औसत शिशु मृत्यु दर से दुगनी है। नेशनल सेम्पल सर्वे के आंकडे बताते है कि मधयप्रदेश में आज भी 0 से 6 वर्ष आयु समूह के बच्चों की  शिशु मृत्यु दर प्रति हजार बच्चों पर 56 है जो कि अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है। शिशु मृत्यु दर का राष्टीय औसत प्रति हजार बच्चों पर 44 है जो कि मधयप्रदेश में मरनेवाले बच्चों से 15 कम है।

           सवाल यह है कि जब सरकार भरपूर बजट,पोषण तत्वों से भरपूर पोषण आहार की व्यवस्था कर रही है तो फिर बच्चे मर क्यों रहे हैं ? बच्चों की मोत और सरकार की व्यवस्था, बच्चों के स्वास्थ्य ओर पोषण के लिए किये गये इंतजाम और खर्च की गहराई से निष्पक्ष जॉच किये जाने की मांग करती है।  

           सवाल यह भी है कि निष्पक्ष और गहराई से जॉच करे कौन ?  मरने वाले बच्चे किसी प्रभावशाली समुदाय के तो नहीं हैं। सरकार के आंकडें ही उठाकर देख लीजिए जिनसे यह जाहिर होता है कि धार, झाबुआ, बडवानी, अलीराजपुर, डिण्डोरी, मण्डला,शिवपुरी, श्योपुर, विदिशा,अशोकनगर सहित अन्य जिलों में आदिवासी समुदाय के 45 प्रतिशत से अधिाक बच्चे अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते । मतलब यह कि वे एक वर्ष की आयु पूरी हाने के पहले ही दम तोड देते है। यदि हम विदिशा जिले के गजंबासौदा और नटेरन विकासखण्ड के अन्तर्गत आने वाले गॉव खेजडा तिला, जौहद, गुरोद, उदयपुर, सायबा सहित अनेक गॉव में पिछले 6 वर्ष के दौरान हुई बच्चों की मौत के मामलों का आंकलन करें तो पता चलता है कि इन गॉवों में रहनेवाले सहरिया समुदाय के 180 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई। ये सभी बच्चे कुपोषण भूख गरीबी के कारण मारे गये।  यदि सहरिया बस्ती में स्वास्थ्य सुविधाएं पोषण आहार समय पर पहॅुचते तो बच्चों की बेवक्त मौत को रोका जा सकता था। आज भी मधयप्रदेश के किसी भी जिले में रहने वाले सहरिया आदिवासी समुदाय की बस्ती में जाकर देख लीजिए । भूख, गरीबी, कमजोरी, कुपोषण की कहानी वहॉ रहने वाले पुरूष, महिलाओं, बच्चों के चेहरे उनके आसपास माहौल से अपने आप समझ आ जायेगी। सहरिया समुदाय की यह दुर्दशा अब भी उनके बच्चों को कुपोषण का शिकार होकर मरने से नहीं रोक पा रही है।

            कुपोषण के कारण हुई बच्चों की मौत मधयप्रदेश विधानसभा में भी चर्चा का विषय बन चुकी है। पूर्व सांसद, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ कॉग्रेस विधायक महेन्द सिंह कालूखेडा के अनुसार मधयप्रदेश में वर्ष 2005 के बाद से प्रतिदिन 71 बच्चों की मौत कुपोषण से हो रही है। श्री सिंह का आरोप है कि वर्ष 2005 से 2009के बीच 1 लाख 30 हजार से अधिक बच्चे कुपोषण के कारण मारे गये। वर्ष 2012 तक कुपोषण से मारे गये बच्चों की संख्या 1 लाख 80 हजार को पार कर गर्इ्र है। उन्होंने कहा कि कुपोषण रोकने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से मधयप्रदेश को 1 हजार 282 करोड रूपये स्वीकृत किये । इसके बाद भी बच्चों को कुपोषण के कारण मरने से नहीं रोका जा सका। आज भी सहरिया आदिवासी समुदाय के बच्चे कुपोंषण से संघर्ष करते हुए जिदंगी लडाई हार रहे हैं। उनकी लगातार मौत हो रही है। दूसरी ओर कुपोषण रोकने के नाम पर कागजी जमा खर्च अधिाक और मैदानी स्तर पर कम काम हो रहा है।


? अमिताभ पाण्डेय