संस्करण: 14 अक्टूबर-2013

खदान घोटालों में मध्यप्रदेश ने

कर्नाटक को पीछे छोड़ा

? एल.एस.हरदेनिया

       दानों के मामले में मध्यप्रदेश, कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार से प्रतियोगिता करते नजर आ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 08 अक्टूबर 2013  को पारित आदेश से स्पष्ट रूप से ऐसा ही प्रतीत होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने खदानों के आवंटन में यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से शिवराज सिंह चौहान की सरकार की प्रतिष्ठा को गहरा धाक्का लगा है। इसके अतिरिक्त, मेडीकल कालेजों में प्रवेश के मामले में भ्रष्ट तरीके अपनाने के जो सनसनीखेज मामले उजागर हुए हैं वे भी भाजपा सरकार के खाते में ही जायेंगे। इन सब रहस्योद्धाटनों से ऐसा लगता है जैसे मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार करने के लिए पूरी तरह से अनुकूल वातावरण है।

              प्रशासनिक क्षेत्र के इन रहस्यों के उद्धाटन के साथ मध्यप्रदेश की सत्ताधारी पार्टी को राजनैतिक स्तर पर भी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उम्मीदवारों के चयन को लेकर भाजपा के अंदर तूफान आ गया है। एक के बाद एक पार्टीजनों के समूह भोपाल आ रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि वर्तमान विधायकों को फिर से उम्मीदवार न बनाया जाए। वे चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ऐसे विधायकों को उम्मीदवार बनाया जाता है तो उनकी हार सुनिश्चित होगी।

             चुनाव आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले, मध्यप्रदेश सरकार ने मात्र 900 मिनट में खदानों के आवंटन के 1200 आवेदनों पर सुनवाई पूरी कर ली। यानी कि हर तैंतालीस सेकेंड में करोड़ों रूपए की एक खदान की सुनवाई पूरी हुई। खनिज विभाग को डेढ़ सौ खदानों का आवंटन करना था। तीन हजार पांच सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैली इन खदानों, की कीमत हजारों करोड़ों रूपये है। भाजपा और कांग्रेस के कई नेताओं के रिश्तेदारों के नाम भी इन खदानों की फाइलों में हैं। खदानों के इस गोरखधंधे में कई निजी कम्पनियां भी शामिल हैं। भास्कर, जागरण, सांध्य प्रकाश, बंसल और राज ग्रुप की खदानों की भी सुनवाई हुई। इसके अलावा, भाजपा नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा की भी खदानें हैं। ये खदानें आयरन, मैंगनीज, बाक्साइट और लेटेराइट की हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि बाबुओं ने एक साल का काम महज 900 मिनटों में निपटा दिया। मध्यप्रदेश में आचार संहिता लगने वाली थी और इसलिए खनिज मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने तीन दिन में सालों से लंबित बारह सौ फाइलों की सुनवाई कर ली, जिसके चलते खनिज विभाग सवालों के घेरे में आ गया है। इस सुनवाई के जरिए मध्यप्रदेश सरकार ने तीन हजार पांच सौ हेक्टेयर की वन और राजस्व भूमि खदानें, कारोबारियों को बांटने की तैयारी कर ली है। इस सुनवाई में प्रमुख सचिव अजातशत्रु श्रीवास्तव व अपर सचिव एस के शिवानी भी शामिल थे। इससे साफ है कि खदानों की इस बंदरबांट की तैयारी में नेताओं से लेकर अफसर तक शामिल हैं। अधिवक्ता एससी गोधा और सुनील गोधा ने इस संबंध में सरकार को नोटिस देकर सभी आवंटन निरस्त करने की मांग की है।

             खदानों के आवंटन से संबंधित कुछ तथ्य निम्न प्रकार हैं:-

             1) आचार संहिता लागू होने से पहले खदानों की बंदरबाट की गई।

             2) 900 मिनटों में हुई 1200 फाइलों की सुनवाई।

             3) महज 43 सेकेंड में हुई एक फाइल पर सुनवाई।

             4) डेढ़ सौ खदानों का हुआ आवंटन।

            5) मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने की सुनवाई।

            6) प्रमुख सचिव अजातशत्रु श्रीवास्तव भी थे शामिल।

            7) अपर सचिव एस.के. शिवानी भी सुनवाई में।

            8) 3500 हेक्टर वन, राजस्व भूमि लीज पर देने की तैयारी।

            9) हजारों करोड़ों की हैं ये खदानें।

           10) भाजपा, कांग्रेस नेताओं के रिश्तेदारों की खदानें।

           11) निजी कम्पनियों की भी हैं खदानें।

           12) भास्कर, जागरण, सांध्यप्रकाश, राज व बंसल ग्रुप की भी खदानें।

           13) भाजपा नेता सुधीर शर्मा की भी खदानें।

           14) 1 साल का काम बाबुओं ने निपटाया मात्र 3 दिन में।

           15) 20 और 27 अगस्त और 3 सितम्बर को हुई सुनवाई।

           इस अवैधानिक कार्यवाही के दोष खदान मंत्री राजेन्द्र शुक्ल पर डाला जा रहा है। परन्तु क्या यह संभव है कि एक जूनियर किस्म का मंत्री अपने अपने बूते इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कर पायेगा? क्या मुख्यमंत्री की सहमति के बिना अरबों का खेल हो सकता है?

            जब केन्द्रीय सरकार का कोयले खदानों का मामला सामने आया तो भारतीय जनता पार्टी ने जोरशोर से यह मांग उठाई कि इस घोटाले के लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं और इसलिये उन्हें इस्तीफा देना चाहिए। बाद में जब कोयले के आवंटन से संबंधित फाइलें गायब हो गईं तब भी प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की गई। प्रधानमंत्री ने इस संबंध में स्पष्ट किया कि वे इस के लिए कदापि जिम्मेदार नहीं हैं। फाईलों के गुमने के मामले में मनमोहन सिंह ने सवाल किया कि क्या प्रधाानमंत्री फाईलों की रखवाली करते हैं। खदानों के आवंटन के मामले में मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग अवश्य उठेगी और शायद मुख्यमंत्री वैसा ही जवाब देंगे जैसा कि प्रधानमंत्री ने दिया। उस हालत में, मुख्यमंत्री की पार्टी की क्या प्रतिक्रिया होगी, इसका हम सबको इंतजार रहेगा।

             इस समय मेडीकल कालेजों में प्रवेश से संबंधित भ्रष्टाचार की चर्चा जोरों पर है। मधयप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने मेडीकल कालेजों में प्रवेश देने के लिये प्री मेडीकल टेस्ट बोर्ड बनाया था। यह बोर्ड इस प्रवेश के लिये इच्छुक उम्मीदवारों के लिए पीएमटी का आयोजन करता था। उम्मीदवारों की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच, अत्यधिाक गुप्त तरीके से होती थी। परिणाम घोषित होने के बाद प्राप्त अंकों के आधार पर मेरिट सूची बनती थी। उसी सूची के आधार पर कालेजों में प्रवेश दिया जाता था। यही प्रक्रिया दंत चिकित्सा महाविद्यालयों और इंजीनियरिंग कालेजों में प्रवेश के लिये भी अपनाई जाती थी। इस सूची के आधार पर जिन्हें प्रवेश मिलता था, वे वास्तव में प्रतिभावान छात्र होते थे। डिग्री लेने के बाद वे योग्य डाक्टर बनते थे। मेडीकल क्षेत्र में अयोग्य लोगों के डाक्टर बनाने का अर्थ लगभग कातिलों को डाक्टर बनाने जैसा है।

              रिश्वत लेकर अवैध तरीके से जिन लोगों ने प्रवेश लिया वे भी उतने ही अपराधी हैं जितने रिश्वत लेने वाले। जिन लोगों ने रिश्वत देकर अपने बच्चों को मेडीकल कालेजों में प्रवेश दिलवाया, उनमें कुछ डाक्टर भी शामिल हैं। ऐसे ही एक नागपुर के डाक्टर ने बताया कि उन्होंने अपने लड़के के प्रवेश के लिये 27 लाख रूपये ही रिश्वत दी थी। इस तरह की घटिया हरकत जिन डाक्टरों ने की है उन्हें तो सख्त सजा देने की जरूरत है। इन डाक्टरों ने स्वयं मेडीकल प्रोफेशन में रहते हुए उसे गंदा करने का प्रयास किया है।

            मेडीकल कालेजों में प्रवेश के गोरखधंधे में सैंकड़ों लोग शामिल हैं। ये सभी करोड़पति बन गये हैं। इस तरीके से जिनका प्रवेश हुआ है उसे न सिर्फ निरस्त किया जाना चाहिए वरन् इस रेकेट की जांच के लिये एक उच्चस्तरीय जांच आयोग गठित किया जाना चाहिये। आयोग न सिर्फ अपराधियों को सजा दिलवाये परन्तु उसके साथ ही ऐसी नीति निर्धारित करे ताकि आगे चलकर ऐसे घोटाले न हो सकें।

            मेडीकल में प्रवेश के अतिरिक्त, अभी हाल में ट्रांसपोर्ट के क्षेत्र में भी एक बड़े घपले का पता चला है। इंदौर के एआरटीओ के यहां आयकर छापे में अकूत संपत्ति का खुलासा हुआ है। मंहगी कारें, हीरे-जवाहरात की ज्वेलरी, आलीशान होटल, मकान, पॉश इलाके में प्लाट, कई एकड़ जमीन के अलावा प्रापर्टी में करोड़ों रूपए के निवेश के कागजात मिले हैं। 8-10 डायरियों में मंत्रियों व अफसरों से लेकर कई नेताओं के नाम दर्ज हैं। इसके अलावा तकिया, गद्दे से लेकर तिजोरी तक में से लाखों रूपए नगद बरामद हुए हैं।

            आयकर अन्वेषण ब्यूरो की टीम ने एआरटीओ सुनील तिवारी समेत इंदौर के कई नामी लोगों के यहां छापा मारा था। सर्च की कार्रवाई तीन दिन तक जारी रही। कार्रवाई के दौरान महज एआरटीओ तिवारी की संपत्ति के बारे में जो जानकारी मिली, वह चौंकाने वाली है। उनकी पत्नी डाक्टर है। उनके परिवार की अधिकृत रूप से कुल कमाई महीने में महज डेढ़-दो लाख लाख रूपए के आसपास है, किंतु जिस हिसाब से दस्तावेज आदि बरामद हुए हैं, इससे पता चला है कि एआरटीओ हर दिन इससे ज्यादा की अवैध कमाई कर रहा था। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसकी कुल सपंत्ति कितनी है। जमीनों के दस्तावेज व अन्य प्रापर्टी की पड़ताल अभी चल रही है। कुल मिलाकर, आयकर विभाग का अनुमान है कि तिवारी की संपत्ति करीब डेढ़-पौने दो सौ करोड़ रूपए से ज्यादा की होगी। तिवारी के आवास आदि से कुल 92 लाख की चल संपत्ति व आठ लाख रूप्ए नकद मिले हैं जबकि 65-70 लाख रूपए के हीरे-जवाहरात व सोने की ज्वेलरी मिली है। ज्वेलरी का वैल्यूवेश्न अभी पूरा नहीं हुआ है।

            यह भी दिलचस्प है कि प्रदेश में जिस लोकायुक्त व ईओडब्ल्यू को सरकारी अधिकारियों पर कार्रवाई में अव्वल माना जाता है, इन दोनों एजेंसियों की कार्रवाई यहां भी बौनी साबित हुई। इससे इन एजेंसियों की कार्यक्षमता पर भी प्रश्नचिन्ह लगा है। एआरटीओ तिवारी के ठिकाने से आयकर को इल दोनों एजेंसियों में हुई दर्जनों शिकायतों की फोटो कॉपी प्राप्त हुई हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि तिवारी के हाथ कितने लंबे हैं। दस्तावेजों का संबंध मंत्रियों, नेताओं से लेकर तकरीबन हर उस प्रभावशाली व्यक्ति से था, जो कहीं न कहीं उसे डैमेज कर सकता था। डायरी में ऐसे सभी लोगों के नाम दर्ज हैं। तिवारी के यहां से जब्त तीन लॉकरों का खुलना अभी बाकी है। लॉकरों से भी काफी संपत्ति मिलने की संभावना है। फिलहाल शुरूआती जांच में आयकर अन्वेषण विंग को बड़ी कामयाबी मिली है। एक द्वितीय श्रेणी के सरकारी अधिकारों के यहां से इतनी बड़ी संपत्ति मिलने से आयकर अफसर आश्चर्यचकित हैं।

            कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश सरकार का कोई ऐसा विभाग नहीं है जिसमें भ्रष्टाचार न हुआ हो। इसके अतिरिक्त सत्ता में बैठे लोग अनेक विधायक और यहां तक कि संघ परिवार से जुड़े लोग दिनरात धन बटोरने में लगे हुए हैं। स्थिति भयावह है। इसके बावजूद यदि फिर से भाजपा सत्ता में आती है तो यही कहा जायेगा कि व्यवस्था में ही जंग लग गया है।  

? एल.एस.हरदेनिया