संस्करण: 14 अक्टूबर-2013

तीसरे मोर्चे पर व्यर्थ की परेड

? हरे राम मिश्र

       न् 2014 में संपन्न होने जा रहे लोकसभा के आम चुनाव में देश की जनता के सामने गैर कांग्रेस तथा गैर भाजपा का मजबूत राजनैतिक विकल्प रखने के लिए माकपा नेता प्रकाश करात भले ही समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर लंबे समय से एक प्रयास करते हुए दिख रहे हों लेकिन, जिस तरह से मुलायम सिंह यादव ने यह कहकर कि आम चुनाव बाद ही तीसरे मोर्चे के गठन पर कोई बात हो सकती है, ने तीसरे मोर्चे के गठन की सारी संभावनाओं पर ही पूर्ण विराम लगा दिया है। यही नही, उनके इस कथन से सत्ता के लिए उनकी अवसरवादिता भी बेनकाब हो जाती है। वो चुनाव के पहले किसी किस्म का रिस्क नही लेना चाहते। वे चुनाव बाद नई परिस्थितियों पर नये सिरे से बात करेंगे। इसके पीछे भले ही वे सीट बंटवारे पर होने वाली असहमति को कारण बता रहे हों लेकिन ऐसा लगता है कि वे अपनी महत्वाकांक्षा के सूरज को अभी भी अस्त हुआ नही मानते है। वैसे भी पिछले आम चुनाव के ठीक पहले गठित तीसरे मोर्च का हश्र आज भी कोई भूला नही है। चुनाव के ठीक बाद ही वह ताष के पत्तों की तरह भरभरा कर ढह गया था। मौजूदा राजनैतिक परिदृष्य में इस बात की कोई संभावना नही दिख रही है कि आम चुनाव के बाद भी इस दिषा में कोई सार्थक काम हो पायेगा तथा कथित सेक्यूलर कहे जाने वाले लोग एक छतरी के नीचे आ सकेंगे। सीपीआईएम के प्रकाश करात भले ही दिल्ली में 30 अक्तूबर को धार्म निरपेक्षता के नाम पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन करने वाले है। लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम ही है कि इस सम्मेलन से मौजूदा राजनैतिक परिदृष्य के लिए कुछ भी सार्थक निकल पायेगा।

             दरअसल प्रकाश करात अभी से ही यह मानकर चल रहे हैं कि तीसरे मोर्च के गठन  और विस्तार में सपा बड़ी ताकत होने के साथ ही साथ एक प्रभावी भूमिका अदा कर सकती हैं। भले ही तीसरे मोर्चे का गठन ही देश में सेक्यूलरिज्म बचाने के नाम पर होगा। लेकिन जिन लोगों के साथ यह कोशिशें की जा रही हैं उनका सेक्यूलरिज्म ही सवालों के घेरे में है। करात जहां शरद यादव को सेक्यूलर मान रहे हैं वहीं यह सच्चाई है कि उन्होने बिहार में भाजपा के सहयोग से अपनी सरकार लंगे समय तक चलाई है। जहां तक मुलायम की बात है सेक्यूलररिज्म के नाम पर वे भी बेनकाब हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार है तथा प्रदेष में एक के बाद एक हालिया हुए दंगों में मुलायम सिंह यादव का सेक्यूलरिज्म भाजपा जैसी पार्टियों के साथ खुलकर सांप्रदायिकता का नंगा नाच पूरे प्रदेश में खेल रहा है। उत्तर प्रदेश में इस खेल में ही सपा को अपनी जीत नजर आ रही है। अब उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक धा्रुवीकरण सपा के जिंदा रहने की पहली शर्त बन चुका है। यह कटु सत्य है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को जिंदा करने के लिए सपा की सरकार ने डेढ़ साल के भीतर सौ से ज्यादा दंगे पूरे प्रदेश में करवाए हैं। लिहाजा मुलायम सिंह यादव के सेक्यूलरिज्म पर सवाल उठता ही हैं। माकपा के जमीनी विष्लेशण पर भी कई गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। यूपी में सांप्रदायिक धुरवीकरण के इस खेल का एक संदेष यह भी है कि मुलायम सिंह यादव अपने निजी स्वार्थ के लिए केन्द्र में भाजपा के साथ भी हाथ मिला सकते हैं। भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह यादव जैसा अवसरवादी राजनीतिज्ञ दूसरा कहीं नही है। मुलायम सिंह जैसे लोग अपने फायदे के लिए ही सेक्यूलरिज्म का कारोबार करते हैं। मुलायम का सेक्यूलरिज्म एक रंगा सियार है जो मौका पाकर किसी के भी साथ जा सकता है।

            बेशक सेक्यूलरिज्म इस देश की राजनीति के लिए एक बड़ा सवाल है लेकिन बेहतर होता कि प्रकाश करात जमीनी सच्चाइयों को समझते और तीसरे मोर्चे के गठन पर व्यर्थ की परेड की जगह अपने स्तर से सेक्यूलरिज्म के सवाल तथा  इस बात को चुनाव में फोकस करते कि बेरहम आर्थिक नीतियों, लूट, घोटाले, भ्रष्टाचार तथा बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर कांग्रेस तथा भाजपा दोनों को घेरा जायेगा। उन्हे नही भूलना चाहिए कि दोगले चरित्र के लोगों को लेकर लंबे समय तक लड़ाई नही लड़ी जा सकती। यह बहुत लंबी लड़ाई है। शायद वे अब आगामी चुनाव को भाजपा बनाम सेक्यूलरिज्म के बीच होता हुआ देख रहे हैं। लेकिन मुलायम जैसे लोगों के साथ खड़े होकर वे जाने अनजाने कांग्रेस के साथ भी खड़े दिखने लगते हैं। जो बेहद खतरनाक है।

            दरअसल आज के राजनैतिक परिदृष्य में आम जनता और उसके मौजूं सवाल जिस तरह से नदारद हो गये हैं वह चिंतनीय है। एक साजिश के तहत आज जिस तरह से देषी विदेशी आवारा पूंजी द्वारा नियंत्रित बाजार नरेन्द्र मोदी जैसे बेहद विवादास्पद व्यक्ति को भारत के उध्दारक के बतौर पेश कर रहा है, के पीछे के खेल को बेबाकी से समझना बहुत जरूरी है। मंदी से मरता बाजार नरेन्द्र मोदी के रूप में अपना पुर्नजीवन देख रहा है। मोदी फासीवाद के रथ पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश में है। सेक्यूलर ताकतों के सामने आज इस सांप्रदायिक फासीवाद से निपटना एक गंभीर चुनौती है। लेकिन बेरहम आर्थिक नीतियों, घपलो, भ्रष्टाचार को नजरंदाज नही किया जा सकता। आज मानवता पर कई गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं। इंसानियत और न्याय के हक में यह लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। सवाल संख्या का नही प्रतिबध्दता का है। क्या करात इसे नही समझ रहे हैं।  

   ? हरे राम मिश्र