संस्करण: 14 अक्टूबर-2013

बाहुबलियों की तरह व्यवहार करते भाजपा नेता

? वीरेन्द्र जैन

       देश की आंतरिक सुरक्षा और जाँच एजेंसियों की स्थापना सुरक्षा और जाँच के लिए ही की गयी है और उन एजेंसियों ने जिन  महत्वपूर्ण कार्यों को किया है उनकी सूची बहुत लम्बी है। पिछले कुछ वर्षों से इन एजेंसियों का काम बहुत ही कठिन हो गया है क्योंकि उन्हें उन लोगों की जाँच करना पड़ रही है जो अवैधा ढंग से एकत्रित धन के सहारे या तो राजनेता बन गये हैं या धार्मिक वेषभूषा में घूम सरल स्वभाव लोगों को बरगला कर अटूट सम्पत्ति खड़ी कर चुके  हैं। ये दोनों ही तरह की ढालें उन सन्दिग्धों ने कानून से अपनी सुरक्षा के लिए लगा रखी हैं। उल्लेखनीय है कि सदनों के प्रतिनिधित्व में सम्पत्तिाशालियों और अपराधों के आरोपियों की संख्या दिनों दिन बढ रही है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट को सजा प्राप्त राजनीतिकों को चुनाव लड़ने से वंचित करना पड़ा व जन भावनाओं को समझते हुए इस फैसले की काट के लिए लाया जाने वाला अध्यादेश वापिस लेना पड़ा। चिंता का विषय यह है कि समाज के सारे नैतिक आदर्शों के विपरीत होने के बाद भी उपरोक्त लोग धर्म, जति, भाषा, क्षेत्र आदि के सहारे राजनीति में अपना स्थान बनाये हुए हैं, और सुरक्षा पा रहे हैं।

             आपराधिक रिकार्ड वाले 33: राजनेता तो जन प्रतिनिधि हैं ही पर इनके अलावा बहुत सारे आरोपी इनके सहयोगी हैं या पंचायती राज, निगमों व नगर निकायों के पदों पर कार्यरत होकर सुरक्षा पा रहे हैं। यही लोग व्यवस्था में भ्रष्टाचार भी फैलाये हुए हैं। इनसे जनता किस तरह से परेशान है इसका प्रमाण गत वर्षों में अन्ना हजारे व अरविन्द केजरीवाल आदि के बिखरे बिखरे आन्दोलन को जागरूक समाज की ओर से मिले व्यापक समर्थन से मिलता है। यही संकेत चुनावों में नोटा खनन ओफ दि एबोव, का कमजोर सा निरर्थक विकल्प मिलने के निर्देश पर हुए स्वागत से भी मिलता है। आंकड़े बताते हैं कि आपराधिाक रिकार्ड के नेता सभी प्रमुख दलों में हैं किंतु भाजपा को छोड़ कर बाकी दलों में सम्बन्धित व्यक्ति अपने अपराधों के लिए स्वयं जिम्मेवार होते हैं। भाजपा ऐसी पार्टी है जो आरोपियों के पक्ष में खड़े होकर इस बात का सबूत देती है कि वे यह अपराध पार्टी की ओर से संगठित रूप में करते हैं।

             गत दिनों भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अधयक्ष एम. वैंकैया नायडू ने कोलकाता में कहा कि ''भाजपा कांग्रेस पार्टी को चेतावनी देती है कि अगर उसकी योजना गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके सहयोगियों के खिलाफ सीबीआई का स्तेमाल करने की है, तो यह आग से खेलने के समान होगा और इस प्रयास का उलटा उन पर ही असर होगा।''

       यह सीधी सीधी सरकार को उसकी वैधानिक जिम्मेवारियों के खिलाफ धमकी है। इससे पता चलता है कि भाजपा ने एनडीए और पार्टी के अन्दर मोदी का इतना विरोधा होने पर भी उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी इसीलिए घोषित किया है ताकि उसकी ओट में जाँच एजेंसियों के काम को राजनीतिक बता कर मोदी को सुरक्षा दी जा सके। न्यायालय से दण्ड मिलने से पहले हर अपराधी अपने को निर्दोष बताता है और सबूत तथा गवाहों से छेड़छाड़ कर के बचने या फैसला टालने की कोशिश करता है। अगर जाँच एजेंसियां कोई भूल या पक्षपात करती हैं तो उसके लिए देश में न्यायिक व्यवस्था है जिसके सहारे उन्हें गलत करने से रोका जा सकता है किंतु किसी बाहुबली की तरह सार्वजनिक रूप से आग से खेलने की हिंसक चेतावनी देना एक अपराधा है। स्मरणीय है कि मोदी के खिलाफ सम्भावित जाँच कांग्रेस के कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है अपितु देश के अधिाकांश गैर भाजपा राजनीतिक दल ही नहीं अपितु एनडीए के अनेक दल भी गुजरात में हुयी घटनाओं की उचित जाँच चाहते रहे हैं। अभी हाल ही में जनता दल ख्यू, ने केवल मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनाये जाने के इकलौते कारण से एनडीए का परित्याग कर दिया। अपने राजनीतिक नुकसान का खतरा देख कर भी उन्होंने यह कदम इसलिए नहीं उठाया कि उन्हें मोदी की सूरत पसन्द नहीं थी अपितु इसलिए उठाया कि वे इतने बड़े आरोपी को देश के प्रधाानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में नहीं देखना चाहते थे। उन्हें मोदी का बिहार विधानसभा चुनावों में गठबन्धन के प्रचारक के रूप में आना तक पसन्द नहीं था और किसी कार्यक्रम में मिलाये गये हाथ को पोस्टर के रूप में दिखाया जाना तक पसन्द नहीं था। गठबन्धन सरकारों के इस युग में एक बड़ी पार्टी के एक नेता के साथ इतनी नफरत अकारण नहीं हो सकती।

             जब बड़े बड़े बड़े हत्याकांडों से जुड़े पुलिस अधिाकारी अपने इकबालिया बयान का पत्र लिख रहे हों और उसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री का संज्ञान स्पष्ट झलक रहा हो, तब देश की चुनी हुयी सरकार की जाँच एजेंसी को क्या करना चाहिए? क्या उसे जाँच इसलिए बन्द कर देना चाहिए क्योंकि आरोपी का नाम एक पार्टी ने आधे अधूरे पार्टी समर्थन के साथ प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में उछाल दिया है। हमारी न्याय व्यवस्था वैसे भी किसी निर्दोष को सजा देने के पक्ष में नहीं है और नेता जेल में रहते हुए भी चुनाव लड़ते और जीतते रहे हैं। उन्हें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर पीड़ितों को न्याय मिलने की आस टूटना देश की एकता को टूटने की ओर ले जाती है। श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने अपनी जान की बाजी लगा कर भी देश के संविधान की रक्षा की थी और देश की एकता को तोड़ने वालों के खिलाफ गम्भीर रूप से अलोकप्रिय कदम उठाने से भी नहीं चूकी थीं।

             विडम्बनापूर्ण यह है कि कस्बे के बाहुबलियों जैसे ये बयान उस पार्टी की ओर से आ रहे हैं जिसका मीडिया मैनेजमेंट देश में सबसे प्रभावशाली है और जो काले को सफेद करने तक में सिध्दहस्त है। अगर उनके पक्ष में दम है तो वे उसे देश के सामने रख सकते हैं न्यायालय के सामने रख सकते हैं, प्रमाण सहित देश के राष्ट्रपति को ज्ञापन दे सकते हैं, आन्दोलन कर सकते हैं, धरना दे सकते हैं, किंतु अगर सत्य की जाँच में आग से खेलने की धमकी देंगे और नासमझों को उकसाने का काम करेंगे तो सारे फैसले ही हिंसा की सम्भावना के आधार पर ही होने लगेंगे। ऐसी दशा में जो जिस क्षेत्र में जितना हिंसा सक्षम होगा वहाँ उसका राज चलने का आदिम युग आ जायेगा। भाजपा को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हमारा देश विविधिताओं से भरा हुआ है और भाजपा देश के आध हिस्से में भी प्रभावी पार्टी नहीं है।

? वीरेन्द्र जैन