संस्करण: 14 अक्टूबर-2013

मोदी, हिटलर और प्रचार

? अल्का गंगवार

        क्या नरेन्द्र मोदी और एडॉल्फ हिटलर के बीच कोई समानता है? यह बुध्दिजीवी लोगों के मन में पैदा होने वाला सवाल है। यदि आप यह सवाल खुद मोदी या उनके अनुयायियों से पूछे तो आपको इसका जवाब न तो सकारात्मक मिल सकता है और न ही नकारात्मक। गोधरा के दंगों की घटना के पूर्व मोदी का व्यक्तित्व और प्रभामण्डल न तो गुजरात की राजनीति में ज्यादा प्रभावकारी था और न ही गुजरात के बाहर बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण था। सिर्फ गोधरा की घटना के बाद ही नरेन्द्र मोदी हिन्दुओं के मसीहा के रूप में उभरे। उन्होने कुछ दिनों पूर्व ही समाचार एजेंसी रायटर को दिये साक्षात्कार में खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी घोषित किया है। अब सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मोदी को आज की राजनीति में उसी प्रकार सबसे अधिक करिश्माई एवं ऊर्जावान व्यक्ति बताया गया है जैसा कि एडोल्फ हिटलर को 1936 में टाईम्स मेगजीन द्वारा चुना गया था।

              हिटलर के अनुसार राष्ट्र को सिर्फ एक प्रजाति के रूप में दर्शाया जा सकता है जो लोगों की शुध्द नस्ल हो। एडोल्फ हिटलर के अनुसार नस्ल भाषा से नही बल्कि रक्त से बनती है। इन शब्दों को हिटलर की पूरी आत्मकथा ''मेरा संघर्ष'' (मीन काम्फ) में बार-बार दोहराया गया है। उसमे वह मानता है कि राष्ट्र एक कट्टर गैर यहूदी क्षेत्र है जो जिसका निर्माण ही आंतरिक और बाह्य खतरों के विरूध्द देश को एकजट करने के लिये गैर यहूदी क्षेत्र की मूल भावना के साथ हुआ है। हिटलर के अनुसार तो राज्य शुध्द जर्मन नस्ल के संरक्षण और विकास का मात्र एक उपकरण है। वह मानता था कि राज्य का काम नस्लीय विशेषताओं का संरक्षण और उन्हे बचाना है और इसके आधार पर उसने ''हम और तुम'' की संवाद शैली विकसित की जो नस्लीय राष्ट्रवाद की एक विशेषता है।  राष्ट्रवाद का यह स्वरूप रक्तपात और नस्लीय श्रेष्ठता पर आधारित था और जब साधारण मूल्यों और विश्वास पर आधारित सामान्य राष्ट्रवाद के समक्ष इसकी तुलना की जाती है, तो इसे एक अलग के रूप में देखा जाता है।

             हिटलर की तरह ही मोदी ने आर.एस.एस. जैसे संगठन के साथ अपना सामीप्य घोषित किया है जो अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को सर्वोच्च एजेण्डा मानने पर गर्व करता है। हिन्दुत्व एक राष्ट्रवादी राजनीतिक विचारधारा है जिसे सर्वप्रथम अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) ने के.बी. हेडगेवार और एम.एस. गोलवलकर (आर.एस.एस. के प्रथम और द्वितीय सरसंघचालक) के साथ मिलकर परिभाषित किया था। वे एडोल्फ हिटलर की आत्मकथा ''मेरा संघर्ष '' के बहुत प्रशंसक थे। हिन्दुत्व नाजीवाद की ही भाँति एक फासिस्ट सिध्दान्त के अतिरिक्त कुछ नही है। इसलिये जब मोदी खुद के हिन्दू राष्ट्रवादी होने का दावा करते है तो उनके राष्ट्रवाद और हिटलर के राष्ट्रवाद में कोई फर्क नही रह जाता है।

             आगामी 2014 के आम चुनावों में भाजपा ने जीत हासिल करने के लिये मोदी को कांग्रेस के विरूध्द  मीडिया अभियान प्रारंभ करने की संपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी है। अब वे पार्टी की मीडिया विंग के प्रभारी है। उनके अनुयायियों का उनमें बहुत विश्वास है, क्योंकि वे जानते है कि मोदी प्रचार करने की कला में निपुण है। हिटलर का मानना था कि सतत एवं कुशल प्रचार से कोई भी व्यक्ति स्वर्ग को नर्क की तरह दिखा सकता है या नारकीय दुखों से भरे जीवन को स्वर्गमय दिखा सकता है। कुशल प्रचार द्वारा हिटलर ने जर्मन लोगों के मन में यह भयंकर डर बिठा दिया था कि जर्मन राष्ट्र का पतन हो रहा है और देश को पतन से बचाने के लिये एक मजबूत नेता की जरूरत है। इसी तरह मोदी इन दिनों यू.पी.ए. सरकार को सभी समस्याओं के लिये कोस रहे है और वर्तमान नैतृत्व को भी गूंगा और बहरा तथा देहाती औरत कहकर या चोर कहकर कोस रहे है। कुछ महीनों पहले वे पुण्ो में युवाओं के सामने भारत की तस्वीर एक असफल राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत कर चुके है। मोदी अपने अभियान में सुशासन और विकास के मुद्दों पर कम जोर दे रहे है जबकि वे राष्ट्रीयता के मुद्दों पर ज्यादा केन्द्रित है। जैसे प्रत्येक स्तर पर हिन्दू राष्ट्रीयता और हिन्दू गौरव।

            जानेमाने इतिहासकार डॉ. विपिन चंद्र ने साम्प्रदायिकता को कुछ खास नीतियों जैसे अयोधया में मंदिर का निर्माण या समान नागरिक संहिता के समुच्चय के रूप में परिभाषित नही किया है बल्कि उनके अनुसार साम्प्रदायिकता मूल रूप से एक विचारधारा, एक विश्वास प्रणाली एवं समाज और राजनीति को देखने का एक नजरिया है। (डॉ. विपिन चन्द्र : भाजपा की विचारधारा) यदि आप नस्लीय समस्या पर आर.एस.एस. संस्थापक गोलवलकर के विचारों को पढ़ेंगे तो आपको बहुत कुछ पता चलेगा। उनका दृढ़ विश्वास था कि हिन्दुस्तान में लंबे समय से रह रहे गैर हिन्दू लोग अपनी नस्लीय, धार्मिक और सांस्कृतिक भिन्नताओं को बनाये रख सकते है किन्तु ऐसे में वे देश के नागरिक की तरह नही बल्कि सिर्फ विदेशी की तरह रह सकते है। गोलवलकर मानते है कि विदेशी तत्वों के लिये सिर्फ दो रास्ते खुले है, या तो वे स्वयं को राष्ट्रीय नस्ल में विलीन कर लें, या फिर उनकी दया पर तब तक जियें जब तक कि राष्ट्रीय नस्ल उन्हें जीने की इजाजत देती है और जब उनसे देश छोड़ने को कहा जाये तो वे देश को छोड़ दें।  यदि आप धाार्मिक आजादी के मामले में हिटलर के विचारों को देखें जिन्हें उसके 25 सूत्रीय कार्यक्रम में दर्शाया गया है; तो उसमें साफ साफ कहा गया है कि सभी धार्मों के लिये आजादी उसी स्थिति में मान्य होगी जब ''वे राज्य के अस्तित्व के लिये खतरा नही हों और न ही वे जर्मन नस्ल के लोगों की नैतिक भावनों को नुकसान पंहुचाते हों।'' आर.एस.एस. के विचार हिटलर के विचारों की छायाप्रति है। अब आप भाजपा के वास्तविक प्रचार का अंदाजा लगा सकते है। यदि भाजपा 2014 में स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आ जाती है तो वे न सिर्फ साम्प्रदायिक सौहार्द्र को नष्ट कर देंगे बल्कि प्रजातंत्र को भी समाप्त कर देंगे जैसा कि हिटलर ने 1933 में प्रजातांत्रिक तरीके से ही चुने जाने के बाद किया था।

             मोदी की शासन शैली में प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति उसी प्रकार कोई प्रतिबध्दता नही है जिस प्रकार हिटलर के मन में पश्चिमी प्रजातंत्र की धीमी गति के कारण उसमें कोई विश्वास नही था। उसका मानना था ''जैसा कि राष्ट्रीय सोशलिस्ट सरकार द्वारा अपनाये गये नैतृत्व की मूल भावना शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है।'' हिटलर का इरादा था कि सत्तारूढ़ दल के नेता का ही राष्ट्र पर संपूर्ण अधिाकार और नियंत्रण होना चाहिये। उसके अनुसार ''सत्तारूढ़ दल का नेता ही राष्ट्र का सर्वोच्च न्यायाधीश है, नाजी जर्मनी में सरकार के प्रमुख की इच्छा के इतर संवैधानिक कानूनों का कोई मूल्य नही है।'' इसी तरह मोदी भी यू.पी.ए. सरकार पर निर्णय नही लेने और अप्रभावकारी होने का आरोप लगा रहे है। वे यह विचार किये बगैर त्वरित निर्णय लेने में विश्वास करते है कि उस निर्णय में सब शामिल है या नही।

            आर.एस.एस. के पुराने प्रचारक मोदी का प्रचार की ताकत में वैसा ही दृढ़ विश्वास है जैसा कि हिटलर का था। हिटलर मानता था कि ''प्रचार व्यवस्थित तरीके से होना चाहिये तथा मौजूदा सभी समस्याओं  के प्रति एकतरफा रवैया अपनाना चाहिये। प्रचार ऐसा हो जो स्वयं को फायदा पंहुचाता हो न कि सत्य को उजागर करने वाला।'' इसलिये हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने प्रचार के परिणामों के बारे में हमें सचेत किया था। उनके शब्दों में -''वयस्क मताधिकार के इस आधुनिक प्रजातांत्रिक तरीके से चुने जाने वाले लोगों में प्रचार के शोर के कारण  धीरे-धीरे गुणवत्ता और सोच क्षीण होती जाती है............वह (मतदाता) धवनि और शोरगुल के प्रति प्रतिक्रिया करता है, वह पुनरावृत्ति पर प्रतिक्रिया करता है। ऐसा मतदाता या तो एक अधिनायक पैदा करता है या एक मूर्ख राजनेता, जो असंवेदनशील हो। ऐसा राजनेता ही दुनिया के सारे शोरगुल में अपने दोनों पैरों पर खड़ा रह सकता है और इसलिये वह अंत में चुन लिया जाता है क्योंकि अन्य तो शोरगुल के बीच समाप्त हो चुके होते है।''  

? अल्का गंगवार