संस्करण: 14 अक्टूबर-2013

16 अक्टूबर विश्व खाद्य दिवस पर विशेष

सबके मुंह में हो निवाला

? डॉ. गीता गुप्त

            संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की एक रपट के अनुसार, समूचे विश्व में पिछले दो सालों में भुखमरी घटी है परन्तु आज भी हर आठवां व्यक्ति भूख से पीड़ित है। वर्ष 2000में संयुक्त राष्ट्र ने कई लक्ष्य निधर्ाारित किए थे। पहला लक्ष्य था वर्ष 2015 तक अत्यधिक गरीबी और भूख को आधा कम कर देने का। और सचमुच, वर्ष 1991-92 के बाद दुनिया में भूख में 91 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसमें सबसे अधिक योगदान चीन और वियतनाम का है। ज्ञातव्य है कि वर्ष 2011 से 2013 के बीच विश्व की 84 करोड़ 20 लाख आबादी को पर्याप्त भोजन नहीं मिल सका है, यह आबादी विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 12 प्रतिशत है। यद्यपि यह आंकड़ा 2010 से 2012 के आंकड़ों की तुलना से कम है। उक्त अवधि में 86 करोड़ 80 लाख लोग पर्याप्त भोजन से वंचित रहे। जबकि 2009 में यह संख्या एक अरब से अधिक थी।

            रपट के अनुसार, भुखमरी के शिकार लोगों की सर्वाधिक संख्या 14.3 प्रतिशत विकासशील देशों में हैं। अफ्रीकी महाद्वीप में गंभीर खाद्य संकट है। वहां पांच में से एक व्यक्ति भूख से पीड़ित रहा है। पिछले दो दशक में अफ्रीका के उप सहारा क्षेत्र में स्थिति कुछ सुधारी है और वहां भूख से त्रस्त लोगों की संख्या 32.7 प्रतिशत से घटकर 24.8 प्रतिशत रह गई है। लेकिन इसे संतोषप्रद सुधार नहीं माना जा सकता। अलबत्ता दक्षिण पूर्वी एशिया की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। वहां 1990 की तुलना में भुखमरी की दर 31.1 प्रतिशत से घटकर 10.7 प्रतिशत रह गई है और सुधार की गति इसी तरह रही तो वहां शीघ्र ही भुखमरी की समाप्ति के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकेगा। पश्चिम एशिया की स्थिति खराब है। लेकिन पूर्वी एशिया तथा लैटिन अमेरिका में भूख से मरने वालों की संख्या में तेज़ी से कमी आ रही है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2015 तक भुखमरी समाप्त करने के लक्ष्य की दिशा में प्रयत्नशील 38 देशों की सराहना की है। इन देशों में बांग्लादेश, क्यूबा, फिजी, मालदीव और ब्राजील जैसे छोटे देश भी शामिल हैं, पर भारत का नाम नहीं है।

           यह दु:खद सत्य है कि स्वाधीनता के बाद भारत में गरीबी-उन्मूलन और भूख पर नियंत्रण हेतु सरकारों ने कई योजनाएं लागू की मगर अब तक भूख की समस्या व्याप्त है। भारत में खाद्यान्न की उपलब्धता बढ़ाने हेतु 1966 में हरित क्रांति की शुरूआत की गई। 1975 में इंदिरा गांधी की सरकार ने 'गरीबी हटाओ' का नारा देते हुए बीस सूत्रीय कार्यक्रम आरंभ किया। 1978 में समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम शुरू हुआ। 1955 में मध्यान्ह भोजन योजना विद्यालयों में चालू की गई ताकि निर्धन परिवारों को भूख से लड़ने में मदद मिल सके। 2000 में राजद सकरार ने गरीब परिवारों को प्रति माह 35 किलो अनाज देने के लिए अंत्योदय योजना लागू की। 2005 में यूपीए सरकार ने निर्धन ग्रामीणों को न्यूनतम रोजगार उपलब्ध कराने हेतु नरेगा की शुरूआत की। अब 213 में, हाल ही में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्यादेश लाया गया है जिसे राष्ट्रपति ने स्वीकृति दे दी है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना से भारत के 67 प्रतिशत लोगों यानी 80 करोड़ जनता को खाद्य सुरक्षा मिलेगी।

            ध्यान रहे कि भारत में भुखमरी असल मुद्दा नहीं है। असल मुद्दा है कुपोषण। भुखमरी कुपोषण का एक पहलू है जिसे हल करने के लिए खाद्य सुरक्षा विधोयक लाया गया है। मगर योजना आयोग की माने तो यहां गरीबी रेखा के नीचे मात्र 29.8 प्रतिशत लोग हैं। जबकि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ें को माने तो यहां 17.5 प्रतिशत लोग ही कुपोषण या भूख के शिकार हैं। ऐसे में एक दिलचस्प सवाल यह है कि सरकार मात्र 17.5 प्रतिशत या फिर 29.8 प्रतिशत जनता को भुखमरी से निज़ात नहीं दिलवा पायी और अब 67 प्रतिशत जनता को खाद्य सुरक्षा देने की बात की जा रही है तो क्या भारत में इतने लोग निर्धन हैं ? या फिर इतने लोगों को रियायती दर पर अन्न सुलभ कराकर प्रसन्न करना चाहती है ? जबकि खाद्य सब्सिडी पर केवल वर्ष 2013-14 का ही अनुमानित व्यय एक लाख चौबीस हजार करोड़ रुपये से अधिक आएगा।

           अगली बात, खाद्य सुरक्षा का आशय महज सस्ते अनाज की उपलब्धता नहीं, वरन् अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक संतुलित और पौष्टिक आहार की उपलब्धता है। भारत में बहुत कम लोगों को संतुलित आहार सुलभ है। आम जनता की थाली से दालें, दूधा, दूधा से बने पदार्थ, मेवे और फल कबके गायब हो चुके हैं। महंगाई की मार ने उन्हें मूंगफली जैसे सस्ते पौष्टिक मेवे, गुड़ और हरी सब्जियों तक से वंचित कर दिया है। केन्द्र और राज्य एकीकृत बाल विकास परियोजना के पूरक पोषण आहार कार्यक्रम का यह हाल है कि अकेले मध्यप्रदेश में 6 माह से 3 साल के बच्चों और गर्भवती माताओं के लिए सालाना लगभग 400 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। फिर भी यहां 15 लाख बच्चे कुपोषित और 1.19 लाख बच्चे अति कुपोषित हैं। केवल पांच वर्षों में दो हजार करोड़ रुपये फूंक दिए जाने के बावजूद अति कुपोषित बच्चों की बढ़ती तादाद बहुत चिंताजनक है। पोषण आहार संबंधी योजनाओं के ऐसे परिणाम से देश कैसे कुपोषण और भुखमरी के कलंक से मुक्त होगा ?

             भारत में खाद्यान्न की कमी नहीं है। भण्डारण का उचित प्रबंध न होने के कारण यहां लाखों टन अनाज हर साल सड़ जाता है। इसी कारण उच्चतम न्यायालय सरकार को गरीबों में अनाज मुफ्त बांटने की सलाह भी दे चुका है। ताकि बर्बाद होने की बजाय वह गरीबों के पेट में चला जाए। अकेले वर्ष 2011-12 में यहां 170 लाख टन अनाज की बर्बादी उचित भण्डारण व्यवस्था के अभाव में हो चुकी है। स्वच्छता, पोषण, स्वास्थ्य रक्षा, बुनियादी शिक्षा, जल आपूर्ति और आर्थिक सुरक्षा जैसे बिन्दु भी खाद्य सुरक्षा से जुड़े हैं। खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारणा । इसके अलावा किसानों की आत्मनिर्भरता हेतु सरकारी उपाय किए जाने भी आवश्यक हैं। क्योंकि खाद्य सुरक्षा का सीधा संबंधा कृषि से है। आज प्रतिदिन हजारों कृषक कृषि से विमुख हो रहे हैं क्योंकि खेती लाभ का सौदा नहीं रह गई है। परम्परागत बीज, खाद और अन्य संसाधानों के लिए किसान परावलम्बी हैं। सरकारी स्तर पर महंगई तकनीकों के प्रचार प्रसार ने भी खेती को महंगा सौदा बना दिया है। इसलिए किसान अब भूमिहीन मजदूर में तब्दील होते जा रहे हैं। यह चिंताजनक है। खेती का विनाश खाद्य सुरक्षा की राह में बहुत बड़ा संकट पैदा कर देगा। अतएव सरकार को चाहिए कि वह खाद्य उत्पादन के स्थायी आधार को नष्ट होने से बचाए। विदेशों से आयात खाद्य समस्या का स्थायी हल नहीं हो सकता। यह हमारी अर्थ व्यवस्था के लिए भी हानिकारक होगा।

           विश्व खाद्य दिवस के बहाने अपने देश की खाद्य सुरक्षा योजनाओं पर बात करते समय यह भी नितान्त आवश्यक प्रतीत होता है कि जनता अपने अधिकारों को जाने। यदि वह अपने लिए लागू की गई योजनाओं और अधिकारों से अवगत नहीं है तो बेईमानी का शिकार होती रहेगी। वैसे भी भारत की स्थिति भयावह है। यहां विश्व के एक चौथाई भूखे रहते हैं। यद्यपि अमेरिका और यूरोपीय देश भी भूख को खत्म करने में कठिनाइयों का सामना कर रहे है मगर संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2015 तक भुखमरी दूर करने का संकल्प ले लिया है। भारत में अब जाकर 2013 में खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया जा रहा है, उसमें भी विडम्बना यह कि स्पष्ट तौर पर कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया है। जैसे कि ब्राजील जैसे छोटे देश ने 2001 में 'जीरो हंगर' प्रोग्राम शुरू किया। इस प्रोग्राम के तहत वहां की 70 प्रतिशत जनता को भोजन मिलता है और 2015 तक वहां भूख का नामोनिशान नहीं रहेगा क्योंकि उसका लक्ष्य ही है वर्ष 2015 तक भूख का अंत कर देना। भारत जैसे विशाल देश को भी एक लक्ष्य निधर्ाारित कर आगे बढ़ना होगा, तभी भुखमरी और कुपोषण के कलंक से उसकी मुक्ति संभव होगी।

? डॉ. गीता गुप्त